पारिवारिक रिश्तों और भावनाओं पर बनी फिल्में हर दौर में दर्शकों के दिल के सबसे करीब रही हैं. दिलचस्प बात यह है कि कई बार बुनियादी कहानी एक जैसी होने के बावजूद हर फिल्म अपनी अलग पहचान बना लेती है, क्योंकि उसे परदे पर उतारने का तरीका हर निर्देशक का अपना होता है. हिंदी और दक्षिण सिनेमा में पूरे 66 साल के लंबे अंतराल में चार ऐसी फिल्में बनीं, जिनकी मूल कहानी एक ही धागे से बुनी हुई थी. इनमें से तीन ने बॉक्स ऑफिस पर कमाई के रिकॉर्ड तोड़ दिए और एक तो ऑस्कर की दौड़ तक जा पहुंची. ये चार फिल्में थीं मदर इंडिया, फर्ज और कानून, शक्ति और जेलर.
मदर इंडिया: वह कहानी जिसने नींव रखी
इस सिलसिले की शुरुआत होती है महबूब खान की निर्देशित फिल्म मदर इंडिया से, जो 14 फरवरी 1957 को परदे पर आई थी. यह पूरी तरह नायिका प्रधान फिल्म थी. इसमें नरगिस, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और राजकुमार मुख्य भूमिकाओं में थे. सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार ने परदे पर नरगिस के बेटों का किरदार निभाया था. कम ही लोग जानते हैं कि यह कालजयी फिल्म दरअसल 1940 में आई फिल्म औरत का रीमेक थी.
कहानी राधा की है, जिसे नरगिस ने जिया. पति यानी राजकुमार की मौत के बाद गरीबी की मार झेलती राधा अपने दो बच्चों को किस तरह पालती है, जिंदगी की हर मुश्किल से कैसे जूझती है और सूदखोर सुक्खी लाला से अपनी इज्जत किस तरह बचाकर रखती है, यह सब परदे पर बेहद भावुक अंदाज में दिखाया गया.
फिल्म का आखिरी दृश्य आज भी सिनेमाप्रेमियों के जेहन में बसा है. गांव की इज्जत बचाने के लिए राधा अपने ही बेटे बिरजू को गोली मार देती है. इसके बाद वह फूट-फूटकर रोती है, बेटे को अपने सीने से लगाती है और बिरजू उसी की बाहों में दम तोड़ देता है. बिलखती हुई वह कहती है, 'बिरजू मेरे लाल मत जाओ.' उस दौर में इतने साहसी और भावनात्मक दृश्य की कल्पना महबूब खान जैसा निर्देशक ही कर सकता था.
महज 60 लाख के बजट में बनी मदर इंडिया ने 7 करोड़ से ज्यादा की कमाई की और ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर साबित हुई. इसे हिंदी की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का पुरस्कार मिला और 5 फिल्मफेयर अवॉर्ड इसके नाम रहे. सबसे बड़ी बात यह कि ऑस्कर के लिए नॉमिनेट होने वाली यह पहली हिंदी फिल्म थी. किस्मत का खेल देखिए, सिर्फ एक वोट से यह फिल्म ऑस्कर की दौड़ से बाहर हो गई.
फर्ज और कानून: वही कहानी, अलग अंजाम
मदर इंडिया के क्लाइमैक्स की छाया आगे आने वाली कई फिल्मों में नजर आई. 80 के दशक में जीतेंद्र, हेमा मालिनी और रति अग्निहोत्री की फिल्म फर्ज और कानून में भी यही कहानी एक नए रूप में सामने आई. यह फिल्म 6 अगस्त 1982 को रिलीज हुई थी और इसका निर्देशन के. राघवेंद्र राव ने किया था. यह एक तेलुगू फिल्म का रीमेक थी. इसके संवाद कादर खान ने लिखे, संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का था और गीत आनंद बख्शी ने लिखे.
हालांकि कहानी का अंत यहां बदल जाता है. फर्ज और कानून के क्लाइमैक्स में पिता अपने बेटे को गोली नहीं मारता, बल्कि बिगड़ा हुआ बेटा सुधर जाता है. जीतेंद्र इस फिल्म में दोहरी भूमिका में थे और उन्होंने इंस्पेक्टर पिता का किरदार भी निभाया. खास बात यह कि यह फिल्म सिर्फ डेढ़ माह में बनकर तैयार हो गई थी. इसकी रफ्तार बेहद चुस्त थी और यह पूरी तरह मसाला एंटरटेनर थी. फिल्म में राज किरन के अभिनय की खूब सराहना हुई और फर्ज और कानून सुपरहिट साबित हुई.
शक्ति: दो दिग्गजों का टकराव
फर्ज और कानून के ठीक दो महीने बाद अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार की फिल्म शक्ति परदे पर आई, जिसमें एक बार फिर मदर इंडिया वाली कहानी दोहराई गई. शक्ति 1 अक्टूबर 1982 को रिलीज हुई थी. इसकी कहानी सलीम-जावेद की जोड़ी ने लिखी और निर्देशन रमेश सिप्पी ने किया, वही रमेश सिप्पी जिन्होंने शोले जैसी फिल्म बनाई थी.
फिल्म में अमिताभ बच्चन, राखी गुलजार, दिलीप कुमार, स्मिता पाटिल, कुलभूषण खरबंदा और अमरीश पुरी ने जोरदार अभिनय किया. दिलचस्प यह रहा कि उन दिनों राखी खुद लीड रोल किया करती थीं, फिर भी उन्होंने दिलीप कुमार की पत्नी की भूमिका स्वीकार की. संगीत आरडी बर्मन का था और इसके 'मांगी जो दुआ, वो कुबूल हो गई', 'हमने सनम को खत लिखा, खत में लिखा' और 'जाने कैसे कब कहां इकरार हो गया' जैसे गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं.
अमिताभ बच्चन कई इंटरव्यू में यह बात दोहरा चुके हैं कि वे हमेशा से दिलीप कुमार को अपना आदर्श मानते आए हैं और शक्ति दिलीप कुमार के साथ उनकी पहली फिल्म थी. यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तो नाकाम रही, मगर वक्त के साथ दर्शकों ने इसकी गहराई को समझा. एक बड़ी वजह यह भी रही कि जीतेंद्र की फर्ज और कानून ठीक दो महीने पहले उसी कहानी के साथ आ चुकी थी, जिसका सीधा नुकसान शक्ति को उठाना पड़ा. इस फिल्म में भी मदर इंडिया जैसा ही अंत देखने को मिला, जहां दिलीप कुमार अपने बेटे, यानी अमिताभ बच्चन को गोली मार देते हैं. सदी के दो दिग्गज दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन के संजीदा अभिनय वाली यह फिल्म आगे चलकर हिंदी सिनेमा के लिए एक पाठशाला साबित हुई. इसके लिए दिलीप कुमार को बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला.
जेलर: एक पुरानी कहानी का आधुनिक रूप
इस फेहरिस्त में सबसे नया नाम रजनीकांत की फिल्म जेलर का है, जो 10 अगस्त 2023 को रिलीज हुई. इसका निर्देशन नेल्सन ने किया था, जिन्होंने कहानी भी खुद ही लिखी, और इसके प्रोड्यूसर कलानिधि मारन थे. यह मूल रूप से तमिल फिल्म थी, जिसे हिंदी में डब करके भी रिलीज किया गया. यह एक एक्शन-कॉमेडी फिल्म थी. इसमें रजनीकांत, मोहनलाल, शिव राजकुमार, राम्या कृष्णन, विनायकान, तमन्ना भाटिया, जैकी श्रॉफ, वसंत रवि और योगी बाबू अहम किरदारों में नजर आए.
फिल्म में रजनीकांत एक रिटायर लेकिन बेहद सख्त जेलर मुथुवेल पांडियन की भूमिका में हैं. अपने बेटे अर्जुन को बचाने और मूर्ति तस्करों के गिरोह से लड़ने के लिए वे एक बार फिर मैदान में उतरते हैं. कहानी का बड़ा हिस्सा बाप और बेटे के भावनात्मक रिश्ते के इर्द-गिर्द घूमता है. रजनीकांत के बेटे का किरदार वसंत रवि ने निभाया, जो एक ईमानदार पुलिस अफसर होता है. उसका अपहरण होते ही कहानी नया मोड़ ले लेती है.
शुरुआत में रजनीकांत एकदम शरीफ और सीधे-सादे इंसान नजर आते हैं, मगर जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उनका खतरनाक रूप दर्शकों के सामने खुलता जाता है. फिल्म का क्लाइमैक्स भी चौंकाने वाला है, जहां बेटा जिंदा बाहर निकल आता है. कई मायनों में फिल्म का अंत मदर इंडिया की याद दिलाता है और यह कहना गलत नहीं होगा कि जेलर उसी कहानी का आधुनिक संस्करण थी. करीब 240 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने दुनियाभर में 600 करोड़ से ज्यादा का कलेक्शन किया और ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर साबित हुई.













