बॉलीवुड में जब भी ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन की जोड़ी की चर्चा होती है, तो सिनेप्रेमियों के जेहन में 'गुरु', 'सरकार राज', 'सरकार' और 'उमराव जान' जैसी फिल्में तुरंत उभर आती हैं। मणिरत्नम की फिल्म 'गुरु' के सेट से ही दोनों की असल जिंदगी की प्रेम कहानी की शुरुआत मानी जाती है, जिसे लेकर आज भी दर्शक बेहद दिलचस्पी दिखाते हैं। इसके बावजूद बहुत कम सिनेमा प्रेमी इस बात से वाकिफ हैं कि बड़े पर्दे पर दोनों की पहली मुलाकात इस चर्चित फिल्म से काफी पहले ही हो चुकी थी। करीब 26 साल पहले रिलीज हुई फिल्म 'ढाई अक्षर प्रेम के' में यह जोड़ी पहली बार सिल्वर स्क्रीन पर एक साथ नजर आई थी, जहां दोनों के बीच केवल एक सामान्य और पेशेवर दोस्ती की शुरुआत हुई थी, जबकि उस वक्त प्यार जैसा कोई पहलू मौजूद नहीं था।
साल 2000 में बड़े अरमानों के साथ रिलीज हुआ था यह रोमांटिक ड्रामा
फिल्म 'ढाई अक्षर प्रेम के' साल 2000 में सिनेमाघरों में प्रदर्शित की गई थी। इस फिल्म की कमान जाने-माने फिल्म निर्देशक राज कंवर के हाथों में थी। राज कंवर के निर्देशन और अभिषेक तथा ऐश्वर्या की बिल्कुल नई जोड़ी के कारण दर्शकों के साथ-साथ पूरी फिल्म इंडस्ट्री को इस प्रोजेक्ट से बेपनाह उम्मीदें थीं। हर किसी को लग रहा था कि यह नया फिल्मी सफर बॉक्स ऑफिस पर एक नया रिकॉर्ड कायम करेगा। हालांकि, सिनेमाघरों में पहुंचने के बाद इस रोमांटिक ड्रामा का जो अंजाम देखने को मिला, वह फिल्म के निर्माताओं और प्रशंसकों दोनों के लिए किसी गहरे सदमे जैसा साबित हुआ। उम्मीदों के भारी बोझ तले दबी यह कहानी टिकट खिड़की पर दर्शकों को बांध कर रखने में पूरी तरह विफल रही।
साहिबा और करण की अनूठी मजबूरी से शुरू हुई थी दर्दभरी दास्तान
कहानी का ताना-बाना साहिबा नाम की एक युवती के इर्द-गिर्द बुना गया था, जिसका किरदार ऐश्वर्या राय ने निभाया था। साहिबा का परिवार उसकी रजामंदी के बगैर जबरन उसका विवाह किसी और से तय कर देता है। इस घुटन और दबाव से तंग आकर वह अपने घर की चौखट लांघकर भाग निकलने का फैसला करती है। सफर के दौरान उसकी राह में भारतीय सेना के एक जांबाज अफसर करण ग्रेवाल की एंट्री होती है, जिसे अभिषेक बच्चन ने पर्दे पर साकार किया था। करण एक नेक इंसान की तरह साहिबा की हिफाजत करता है और तमाम मुश्किलों के बीच उसे सुरक्षित उसके परिवार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाता है।
गलतफहमी का जाल और नकली पति-पत्नी का नाटक
कहानी में मुख्य नाटकीय मोड़ तब आता है जब साहिबा के परिजन एक बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं। वे करण को ही साहिबा का असली पति मान बैठते हैं। घर के हालात और दबाव ऐसा मोड़ ले लेते हैं कि सच सामने लाने की जगह करण और साहिबा को कुछ वक्त के लिए सबके सामने पति-पत्नी होने का झूठा ढोंग करना पड़ता है। इस बनावटी और मजबूर रिश्ते की आड़ में रहते हुए दोनों के बीच धीरे-धीरे जज्बात बदलने लगते हैं। दोनों एक-दूसरे के करीब आने लगते हैं और उनके दिलों में एकतरफा मोहब्बत का एहसास करवट लेने लगता है। यही भावनात्मक द्वंद्व इस प्रेम कहानी का मुख्य केंद्र बिंदु बनता है।
जतिन-ललित का संगीत और 9 गानों की सजी हुई महफिल
राज कंवर के निर्देशन में सजी इस फिल्म का सबसे मजबूत और यादगार पहलू इसका संगीत था। इस पूरे प्रोजेक्ट को 9 बेहद कर्णप्रिय रोमांटिक ट्रैक्स से सजाया गया था। संगीतकार जोड़ी जतिन-ललित ने इन धुनों को तैयार किया था, जिन्होंने अपनी मधुर धुनों से उस दौर के चार्टबस्टर्स पर राज किया था। इन गानों में अनुराधा पौडवाल और बाबुल सुप्रियो जैसे दिग्गज गायकों ने अपनी आवाज का जादू बिखेरा था। इनके अलावा मशहूर गायक केके ने भी अनुराधा पौडवाल के साथ मिलकर कई रोमांटिक नगमों को अपनी आवाज देकर सदाबहार बना दिया।
गानों की जबर्दस्त लोकप्रियता भी नहीं टाल सकी फिल्म की विफलता
फिल्म के भीतर ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन पर कई भावुक और रोमांटिक गाने फिल्माए गए थे। इनमें 'दो लफ्जों', 'ओ रे रब्बा', 'कोई ताजा हवा' और 'कोई माही बड़ा सोणा है' जैसे गीतों ने संगीत प्रेमियों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई। इन ट्रैक्स को श्रोताओं की ओर से बेहद शानदार और सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली और ये गाने आज भी पुराने गानों के शौकीनों के बीच काफी लोकप्रिय बने हुए हैं। मगर संगीत की इस जबर्दस्त कामयाबी के विपरीत, जब कहानी और पटकथा की बात आई तो फिल्म दर्शकों को बांधने में बुरी तरह नाकाम रही और अंततः इसे बेहद कमजोर और खराब फिल्म करार दिया गया।


















