लोक आस्था और सूर्य उपासना के महापर्व छठ की गूंज इन दिनों समकालीन हिंदी सिनेमा में काफी मजबूती से सुनाई दे रही है। आगामी बॉलीवुड प्रोजेक्ट्स में इस पावन अनुष्ठान को कहानी के केंद्र में रखकर फिल्माया जा रहा है, जिससे दर्शकों के बीच पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियां ताजा हो गई हैं। हालांकि, सिल्वर स्क्रीन पर सूप, नारियल और अर्घ्य की यह धार्मिक परंपरा हालिया दौर की उपज नहीं है। इस सांस्कृतिक विरासत को छह दशक से भी पहले, वर्ष 1961 में पहली बार सेल्युलाइड के जरिए देश भर के दर्शकों तक पहुंचाया गया था।
फानी मजूमदार का वह ऐतिहासिक सिनेमाई प्रयोग
साल 1961 में नालंदा चित्र प्रतिष्ठान के बैनर तले एक अनूठा सिनेमाई प्रोजेक्ट तैयार हुआ था, जिसका शीर्षक था भैया। इस सामाजिक ड्रामा की कमान उस जमाने के प्रतिष्ठित फिल्मकार फानी मजूमदार के हाथों में थी। उन्होंने इस प्रोजेक्ट के जरिए भारतीय सिनेमा के इतिहास में पहली बार छठ महापर्व के विधि-विधान, पारंपरिक घाटों और गहरी आस्था को दृश्य माध्यम में पिरोया।
तकनीकी तौर पर भैया मूल रूप से मगही जुबान में रची गई थी, लेकिन संवादों और कथानक का ताना-बाना इतना सहज रखा गया था कि गैर-मगही और आम हिंदी भाषी दर्शक भी इसकी भावना से सीधे जुड़ गए। इस ऐतिहासिक फिल्म के कलाकारों की फेहरिस्त भी काफी प्रभावशाली थी। पर्दे पर तरुण बोस, अचला सचदेव, विजय चौधरी, पद्मा खन्ना, हेलेन, शुभा खोटे और रामायण तिवारी जैसे मंझे हुए चेहरों ने ग्रामीण आबोहवा और पारिवारिक बंधनों को जीवंत कर दिया था।
उषा मंगेशकर का वह कालजयी छठ गीत जो आज भी गूंजता है
फिल्म भैया की सबसे अनमोल धरोहर इसका भक्ति संगीत साबित हुआ। फिल्म में शामिल छठ गीत सूपवे नरियरवे बजली मूरी मइया ने आस्था के नए मानक स्थापित किए। सुर कोकिला लता मंगेशकर की अनुजा उषा मंगेशकर ने अपनी भावपूर्ण आवाज में इस रचना को गाया था। वहीं, प्रख्यात संगीतकार चित्रगुप्त ने पारंपरिक वाद्यों और सादगी भरे सुरों से इसकी धुन तैयार की थी, जिसमें नदी तट की शांति और भक्ति का गहरा संगम झलकता था।
इस पारंपरिक रचना के बोल विद्यावशिनी देवी और प्रेम धवन की कलम से निकले थे। शब्दों में मिट्टी की खुशबू, लोक परंपरा और छठी मैया के प्रति निश्छल समर्पण साफ झलकता था। छह दशक से अधिक का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी यह रचना कालजयी बनी हुई है। आज भी जब कार्तिक मास में छठ का आगमन होता है, तो बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांव-कस्बों के घाटों पर लाउडस्पीकरों से यही पारंपरिक धुन वातावरण को भक्तिमय बनाती है।
क्षेत्रीय संस्कृति को मुख्यधारा में शामिल करने की नई राह
जिस दौर में भैया रिलीज हुई थी, उस समय व्यावसायिक हिंदी सिनेमा मुख्य रूप से शहरी विलासिता, पश्चिमी प्रभावों या फिर भव्य स्टूडियो सेटों पर केंद्रित हुआ करता था। उस वातावरण में फानी मजूमदार ने ठेठ ग्रामीण जीवन, लोक मान्यताओं और स्थानीय धार्मिक पर्व को कथा के केंद्र में रखकर एक साहसिक कदम उठाया था। इस कदम ने फिल्म जगत के रूढ़िवादी विचारकों को यह सिखाया कि यदि संवेदनशीलता और प्रामाणिकता के साथ पेश किया जाए, तो दर्शक अपनी जड़ों से जुड़ी कहानियों को सिर-आंखों पर बिठाते हैं।
भैया की इस सफलता ने आने वाले वर्षों में आंचलिक सिनेमा और लोक परंपराओं पर आधारित कई कालजयी फिल्मों का मार्ग प्रशस्त किया। इसके बाद के दौर में नदिया के पार और लागी नाहीं छूटे रामा जैसी कालजयी कृतियां सामने आईं, जिनमें ग्रामीण भारतीय समाज, रिश्ते-नाते और देसी उत्सवों को बिना किसी बनावट के परदे पर प्रमुखता दी गई।
द वन और ये प्रेम मोल लिया में छठ की नई झलक
वर्तमान समय में बॉलीवुड एक बार फिर अपनी जड़ों और सांस्कृतिक पर्वों की ओर लौटता दिख रहा है। सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया के अभिनय से सजी फिल्म द वन में छठ पर्व को अत्यंत भव्य रूप में दर्शाया गया है। फिल्म का विशेष ट्रैक छठी मैया इसी आस्था को समर्पित है। अभिनेत्री तमन्ना भाटिया ने इस हिस्से के फिल्मांकन के दौरान पारंपरिक अनुष्ठानों और व्रत के नियमों को गहराई से महसूस करने का अपना अनुभव साझा किया है। यह फिल्म 25 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में दस्तक देने जा रही है।
इसी तरह निर्देशक सूरज आर. बड़जात्या की पारिवारिक फिल्म ये प्रेम मोल लिया में भी छठ का खूबसूरत दृश्य शामिल किया गया है। इसमें आयुष्मान खुराना और शरवरी मुख्य किरदारों में नजर आएंगे। बीते 21 सितंबर 2026 को जारी हुए फिल्म के शीर्षक गीत में विवाह और मांगलिक रिवाजों के साथ-साथ छठ पूजा के अर्घ्य की भावनात्मक झलक पेश की गई है। पारिवारिक मूल्यों पर आधारित यह सिनेमाई पेशकश 27 नवंबर 2026 को बड़े पर्दे पर रिलीज होगी।



















