सिनेमाघर के बड़े पर्दे पर जब कोई फिल्म रिलीज होती है और सितारे जगमगाते हैं, तो दर्शक केवल मुख्य कलाकारों और निर्देशक की प्रतिभा को देखते हैं। हालांकि, उस शानदार दृश्य को तैयार करने के पीछे अनगिनत तकनीशियनों की कड़ी मेहनत शामिल होती है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं लाइटमैन, जो सुबह का उजाला होने से बहुत पहले शूटिंग सेट पर पहुंच जाते हैं। उनका काम हर एक दृश्य को सही रोशनी देना होता है ताकि कैमरे में सब कुछ बेहतरीन नजर आए। इसके बावजूद, भारी-भरकम बजट वाली फिल्मों में काम करने वाले ये बैकस्टेज कार्यकर्ता आज भी अपनी आजीविका के लिए कठिन संघर्ष करने पर मजबूर हैं।
लंबी ड्यूटी और अनिश्चित कार्य समय की चुनौती
फिल्म निर्माण के दौरान लाइटमैन के काम करने के घंटे तय नहीं होते हैं। शूटिंग के समय के अनुसार उन्हें तड़के ही काम पर पहुंचना पड़ता है। स्वतंत्र रूप से काम करने वाले तकनीशियन दिनेश भारती ने इस संबंध में बताया कि इस पेशे में समय की कोई पाबंदी नहीं होती है। कई बार काम सुबह 2 बजे शुरू करना पड़ता है, तो कभी सुबह 5 बजे का समय तय होता है। फिल्म जगत में सबसे ज्यादा शारीरिक मेहनत करने के बावजूद, काम के अनुपात में उन्हें सबसे कम पारिश्रमिक दिया जाता है।
इसी तरह, दिल्ली में वाइड लाइट संस्था का संचालन करने वाले सूरज गौतम ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनकी टीम की दिनचर्या रात के आखिरी पहर में ही शुरू हो जाती है। सेट पर कैमरा चलने से पहले पूरी लाइटिंग व्यवस्था को स्थापित करना लाइटमैन का उत्तरदायित्व होता है। इस वजह से कई बार कर्मचारियों को रात 3 बजे तक सेट पर पहुंचने का निर्देश दिया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया शूटिंग शुरू होने से काफी पहले पूरी करनी पड़ती है।
कम दिहाड़ी और ओवरटाइम न मिलने की समस्या
लाइटमैन की दैनिक कमाई और काम के घंटों के बीच बड़ा अंतर देखने को मिलता है। तकनीशियनों के अनुसार, वर्तमान में एक दिन का सामान्य मेहनताना लगभग 1,800 रुपये तय है। इसके बदले उनसे अक्सर 16 से 18 घंटे तक लगातार काम लिया जाता है। इसके बावजूद, नियमित ड्यूटी से कुछ घंटे अधिक काम करने पर अतिरिक्त ओवरमटाइम भुगतान नहीं दिया जाता है।
श्रमिकों का कहना है कि जब शिफ्ट बहुत अधिक लंबी हो जाती है, केवल तभी अतिरिक्त राशि दी जाती है। वर्तमान समय में बढ़ती महंगाई को देखते हुए तकनीशियनों ने अपनी दैनिक मजदूरी को बढ़ाकर 2,000 रुपये करने की मांग रखी है। इसके अतिरिक्त, सेट पर बुनियादी सुविधाओं की कमी भी उनके कार्यस्थल की बड़ी समस्याओं में शामिल है।
डिजिटल दौर में महीनों लंबा इंतजार
कम पारिश्रमिक के अलावा, समय पर भुगतान न मिलना भी इन कर्मियों के लिए एक बड़ी वित्तीय चुनौती बन चुका है। स्वतंत्र तकनीशियन अमर सिंह ने बताया कि पहले के समय में शूटिंग समाप्त होते ही नकद भुगतान कर दिया जाता था। हालांकि, डिजिटल लेनदेन और ऑनलाइन ट्रांसफर का दौर आने के बाद स्थिति बदल गई है। अब काम पूरा होने के बाद भी अपने पैसों के लिए दो से तीन महीने तक इंतजार करना पड़ता है।
सूरज गौतम का भी आरोप है कि जब लाइटमैन या स्पॉट बॉय जैसे निचले स्तर के कर्मचारियों को भुगतान करने का समय आता है, तो कई निर्माण संस्थान वित्तीय तंगी का हवाला देने लगते हैं। काम तुरंत करवा लिया जाता है, लेकिन मेहनताने के समय बजट की कमी की बात कही जाती है। इससे कई बार इन कार्यकर्ताओं के सामने दो समय के भोजन की भी समस्या पैदा हो जाती है।
डॉक्यू-सीरीज से सामने आई सच्चाई
फिल्म निर्माण प्रक्रिया में रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले इन तकनीशियनों के मुद्दों पर आमतौर पर सार्वजनिक रूप से बहुत कम चर्चा होती है। हाल ही में रील्जेन क्रिएटिव नामक प्रोडक्शन हाउस द्वारा जारी एक डॉक्यू-सीरीज में दिल्ली के कई लाइटमैन ने अपने कामकाजी जीवन की इन कड़वी वास्तविकताओं को उजागर किया है। उन्होंने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि चमक-धमक वाली फिल्म इंडस्ट्री के पीछे वे किस प्रकार बुनियादी अधिकारों और समयबद्ध भुगतान के लिए संघर्ष कर रहे हैं।



















