मध्य पूर्व में कूटनीतिक स्तर पर एक बड़ी पहल शुरू हुई है, जिसका उद्देश्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही को बहाल करना है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और ओमान के विदेश मंत्री बदर अल-बूसैदी के बीच एक अस्थायी ढांचे को लेकर विस्तृत बातचीत हुई है। इस वार्ता का मुख्य मकसद होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए मर्चेंट शिपिंग को दोबारा चालू करना और जलमार्ग में सुरक्षा जोखिमों को कम करना है।
अस्थायी समुद्री गलियारा और बारूदी सुरंगें हटाने की योजना
ईरान और ओमान के बीच हुई इस द्विपक्षीय वार्ता का प्राथमिक बिंदु एक अस्थायी संयुक्त समुद्री गलियारा स्थापित करना है। आधिकारिक कूटनीतिक बयानों के अनुसार, इस अस्थायी व्यवस्था का उद्देश्य फारस की खाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों के लिए सुरक्षित मार्ग तैयार करना है। इस शुरुआती योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जलमार्ग में बिछी बारूदी सुरंगों को हटाने की संयुक्त परियोजना है, ताकि पानी के भीतर मौजूद खतरों को समाप्त कर जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जा सके।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है, क्योंकि दुनिया भर में समुद्री रास्ते से भेजे जाने वाले कच्चे तेल का एक बड़ा हिस्सा रोजाना इसी संकरे जलमार्ग से गुजरता है। मस्कट और तेहरान के साझा प्रयासों का उद्देश्य समन्वित सुरक्षा उपायों के माध्यम से क्षेत्र में तनाव कम करना और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों का भरोसा बहाल करना है।
स्थायी समुद्री मार्ग के लिए 30 से 60 दिनों की समय सीमा
अस्थायी व्यवस्था के साथ-साथ दीर्घकालिक समुद्री स्थिरता के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं। ईरान के उप विदेश मंत्री काज़ेम ग़रीबाबादी ने इस संबंध में आगे का रोडमैप साझा किया है। काज़ेम ग़रीबाबादी ने बताया कि ईरान और ओमान के अधिकारी इस महत्वपूर्ण जलमार्ग से जहाजों की आवाजाही के लिए एक नए स्थायी मार्ग को अंतिम रूप देने के वास्ते आगे की बातचीत करेंगे।
कूटनीतिक वार्ता का यह अगला चरण 30 से 60 दिनों की अवधि के भीतर आयोजित किया जाएगा। हालांकि इन तकनीकी वार्ताओं के अगले चरण की सटीक तारीखों की घोषणा अभी नहीं की गई है, लेकिन घोषित समय सीमा से साफ है कि दोनों देश अस्थायी सुरक्षा गलियारे से एक औपचारिक और स्थायी नौवहन समझौते की ओर बढ़ने के लिए चरणबद्ध तरीके से काम कर रहे हैं।
ग्लोबल ऑयल मार्केट पर असर, कच्चे तेल के दाम टूटे
ईरान और ओमान के बीच शुरू हुई इस बातचीत का असर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और कमोडिटी बाजारों पर तुरंत देखने को मिला। फारस की खाड़ी में आपूर्ति बाधित होने की आशंकाएं कम होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई।
बातचीत की खबर सामने आने के बाद वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड ऑयल में 4.71% की बड़ी गिरावट आई और इसकी कीमत गिरकर $80.60 प्रति बैरल पर पहुंच गई। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित मार्ग खुलने की उम्मीद से वैश्विक ऊर्जा बाजार में आपूर्ति की किल्लत का जोखिम कम हुआ है, जिससे कीमतों में यह नरमी आई है।
क्या है WTI क्रूड ऑयल और इसके मानक?
वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट, जिसे आमतौर पर WTI के नाम से जाना जाता है, अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजार में कच्चे तेल की बेंचमार्क दरों को तय करने वाला प्रमुख मानक है। वैश्विक तेल व्यापार में WTI के अलावा ब्रेंट क्रूड और दुबई क्रूड को प्रमुख बेंचमार्क माना जाता है। WTI मुख्य रूप से अमेरिका में निकाला जाता है और इसका वितरण ओकलाहोमा के कुशिंग हब के माध्यम से होता है। कुशिंग हब में पाइपलाइनों का बहुत बड़ा नेटवर्क मौजूद है, इसी कारण इसे वैश्विक तेल उद्योग में द पाइपलाइन क्रॉसरोड्स ऑफ द वर्ल्ड के नाम से जाना जाता है।
गुणवत्ता के मामले में WTI क्रूड को हल्का और मीठा कच्चा तेल माना जाता है। इसे हल्का इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका घनत्व और API ग्रेविटी कम होती है, जिससे इसका प्रसंस्करण आसान हो जाता है। वहीं इसे मीठा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें सल्फर की मात्रा काफी कम होती है। इन रासायनिक विशेषताओं के कारण रिफाइनरियों के लिए WTI से पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन जैसे उच्च मूल्य वाले उत्पाद तैयार करना बहुत आसान और किफायती होता है।
कच्चे तेल की कीमतों को तय करने वाले मुख्य कारक
WTI क्रूड ऑयल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग और आपूर्ति के बुनियादी सिद्धांतों से तय होती हैं। वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर इसका एक बड़ा कारक है; जब दुनिया भर में आर्थिक गतिविधियां तेज होती हैं तो ऊर्जा की मांग बढ़ती है और कीमतें ऊपर जाती हैं। इसके विपरीत, आर्थिक सुस्ती या मंदी के समय मांग घटने से कीमतों में गिरावट आती है।
राजनीतिक अस्थिरता, सैन्य संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध भी तेल की कीमतों को सीधे प्रभावित करते हैं। युद्ध या तनाव की स्थिति में आपूर्ति रुकने का खतरा बन जाता है, जिससे कीमतें अचानक उछल जाती हैं। इसके अलावा मुद्रा का प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का कारोबार अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर की मजबूती या कमजोरी तेल की कीमतों पर असर डालती है। डॉलर कमजोर होने पर विदेशी खरीदारों के लिए तेल सस्ता हो जाता है, जिससे मांग बढ़ती है, जबकि डॉलर मजबूत होने पर तेल महंगा हो जाता है।
API और EIA की साप्ताहिक इन्वेंट्री रिपोर्ट का महत्व
तेल बाजार में अमेरिका के भीतर कच्चे तेल के स्टॉक का आकलन करने के लिए साप्ताहिक इन्वेंट्री रिपोर्टों पर पैनी नजर रखी जाती है। ये रिपोर्टें दो संस्थाओं अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट (API) और एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) द्वारा जारी की जाती हैं।
API अपनी अनुमानित इन्वेंट्री रिपोर्ट हर मंगलवार को जारी करता है, जबकि अमेरिकी ऊर्जा विभाग की सरकारी एजेंसी EIA अपनी आधिकारिक रिपोर्ट बुधवार को जारी करती है। यदि इन्वेंट्री में गिरावट आती है तो यह संकेत होता है कि मांग बढ़ रही है या आपूर्ति कम हो रही है, जिससे WTI की कीमतें ऊपर जाती हैं। इसके विपरीत, यदि इन्वेंट्री में बढ़ोतरी होती है तो यह बाजार में जरूरत से ज्यादा आपूर्ति या कमजोर मांग को दर्शाता है, जिससे कीमतें नीचे आती हैं।
आंकड़ों के अनुसार, 75% मामलों में API और EIA की रिपोर्ट के परिणाम 1% की सीमा के भीतर एक दूसरे से मेल खाते हैं। हालांकि, सरकारी एजेंसी होने के कारण बाजार के कारोबारी EIA के आंकड़ों को अधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक मानते हैं।
ओपेक और ओपेक प्लस का बाजार पर नियंत्रण
ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज यानी ओपेक (OPEC) दुनिया भर में तेल की आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रित करने वाला सबसे शक्तिशाली संगठन है। 12 तेल उत्पादक देशों का यह समूह साल में दो बार बैठक करके अपने सदस्य देशों के लिए तेल उत्पादन का कोटा तय करता है।
जब ओपेक बैठक में उत्पादन कोटा घटाने का फैसला लिया जाता है, तो बाजार में आपूर्ति सीमित हो जाती है और WTI क्रूड की कीमतें बढ़ने लगती हैं। इसके विपरीत, जब संगठन उत्पादन बढ़ाने का निर्णय लेता है तो बाजार में आपूर्ति बढ़ जाती है और कीमतें नीचे आ जाती हैं। वैश्विक तेल बाजार पर अपना प्रभाव और बढ़ाने के लिए ओपेक ने 10 गैर-ओपेक उत्पादक देशों के साथ मिलकर ओपेक प्लस (OPEC+) का गठन किया है, जिसमें रूस सबसे प्रमुख भागीदार देश है।



















