गयाजी में पिंडदान से सात पीढ़ियों का उद्धार: जानिए क्यों 2026 में पितृपक्ष के दौरान इस धाम का है विशेष महत्वफ्रिज के अंदर पानी टपकने की समस्या से हैं परेशान? सर्विसिंग मैकेनिक को बुलाने से पहले आजमाएं ये आसान घरेलू नुस्खेमध्य प्रदेश के बुरहानपुर में बारिश के दिनों में खूब पसंद की जाती है स्वादिष्ट उड़द की फल्ली की टिकिया, यहाँ जानिए इसकी आसान रेसिपीगणेश चतुर्थी 2026 पर पारंपरिक मराठी लुक के लिए बेहद खूबसूरत हैं ये नथ डिजाइन, हर कोई करेगा तारीफमुंबई के BKC में गायक कैलाश खेर ने बेचा अपना कमर्शियल ऑफिस, महज 10 महीनों में कमाया लाखों का मुनाफाअर्टिगा से बोलेरो तक, बड़ी फैमिली के लिए ये हैं शानदार माइलेज वाली 7-सीटर गाड़ियांहृदय रोगियों के लिए मसूड़ों की ब्लीडिंग हो सकती है खतरनाक, डेंटिस्ट ने दी तुरंत ओरल चेकअप कराने की सलाहपूर्व भारतीय तेज गेंदबाज एस. श्रीसंत के पिता वी. शांताकुमारन नायर का निधन, कोच्चि में ली अंतिम सांसब्रिक्स डिनर में मलेशियाई पीएम अनवर इब्राहिम ने बिखेरा सुरों का जादू, किशोर कुमार के सदाबहार गीतों से जीता सबका दिलहॉकी इंडिया ने महानिदेशक आर के श्रीवास्तव के सारे अधिकार छीने, जर्सी विवाद समेत लगे आठ गंभीर आरोप
दिल से.. रिव्यू (1998): 158 मिनट का थ्रिलर जो बॉक्स ऑफिस पर पिटकर बना कल्ट मास्टरपीसबॉलीवुड
22 अग॰ 2026, 7:57 am (22 दिन पहले)· 1

दिल से.. रिव्यू (1998): 158 मिनट का थ्रिलर जो बॉक्स ऑफिस पर पिटकर बना कल्ट मास्टरपीस

21 अगस्त 1998 को रिलीज हुई मणिरत्नम और शाहरुख खान की फिल्म 'दिल से..' बॉक्स ऑफिस पर भले ही असफल रही, लेकिन समय के साथ इसे भारतीय सिनेमा की सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ रचना माना गया।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी बहुत कम फिल्में हैं जिनकी असफलता भी कालजयी कलाकृति में बदल गई, और इस दिल से.. रिव्यू (1998) में हम उसी ऐतिहासिक यात्रा का विश्लेषण कर रहे हैं। जब निर्देशक मणिरत्नम और अभिनेता शाहरुख खान ने पहली बार एक साथ काम करने का फैसला किया था, तब पूरे फिल्म जगत में तहलका मच गया था। उस दौर में शाहरुख खान को रोमांस का निर्विवाद बादशाह माना जाता था और दर्शक किसी हल्की-फुल्की ब्लॉकबस्टर फिल्म की उम्मीद कर रहे थे। हालांकि, 21 अगस्त 1998 को सिनेमाघरों में उतरी 158 मिनट लंबी यह फिल्म अपनी उम्मीदों और प्रस्तुतीकरण के मामले में आम दर्शकों के लिए बहुत अलग साबित हुई। प्रेम और आतंकवाद जैसे संवेदनशील विषय के जटिल मेल के कारण यह घरेलू बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों को आकर्षित करने में पूरी तरह नाकाम रही, जिससे डिस्ट्रीब्यूटर्स को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा और व्यापारिक विशेषज्ञों ने इसे आधिकारिक तौर पर फ्लॉप घोषित कर दिया।

समय से आगे की सोच और सात चरणों वाला प्रेम

व्यापारिक विफलता के कारणों पर नजर डालें तो इस फिल्म की सबसे बड़ी कमी या खूबी यही थी कि यह अपने दौर से बहुत आगे की सिनेमाई सोच रखती थी। नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में भारतीय दर्शक 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' और 'कुछ कुछ होता है' जैसी रंगीन, मनोरंजक और आसान प्रेम कहानियों को देखना पसंद करते थे। इसके विपरीत मणिरत्नम ने ऑल इंडिया रेडियो के पत्रकार अमरकांत वर्मा और पूर्वोत्तर भारत की आत्मघाती हमलावर मेघना के बीच एक बेहद डार्क, तनावपूर्ण और जुनूनी रिश्ते की कहानी बुनी। अरबी काव्य परंपरा में वर्णित प्रेम के सात चरणों पर आधारित यह मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक ड्रामा उस दौर के आम सिनेमाप्रेमियों के लिए पचा पाना आसान नहीं था। आकर्षण से शुरू होकर मौत पर खत्म होने वाला यह सफर दर्शकों को राहत देने के बजाय परेशान करता था।

ये भी पढ़ें

संगीत और तकनीकी उत्कृष्टता की मिसाल

भले ही यह फिल्म टिकट खिड़की पर कमाई के कीर्तिमान न बना सकी हो, लेकिन एआर रहमान द्वारा तैयार किया गया इसका संगीत एल्बम भारतीय संगीत इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बन गया। गीतकार गुलजार के लिखे कालजयी बोलों और एआर रहमान की जादुई धुनों ने मिलकर ऐसा माहौल रचा जो आज भी उतना ही तरोताजा महसूस होता है। 'छैय्या छैय्या', 'दिल से रे', 'ऐ अजनबी' और 'जिया जले' जैसे नगमें आज भी संगीत प्रेमियों की पसंदीदा सूची में शीर्ष पर बने हुए हैं। तकनीकी दृष्टि से भी यह बॉलीवुड की सबसे बेहतरीन कृतियों में शामिल है। कैमरामैन संतोष सिवन की सिनेमैटोग्राफी ने लद्दाख के बर्फीले पहाड़ों, केरल के बैकवाटर्स और दिल्ली की ऐतिहासिक सड़कों को कैमरे में किसी कविता की तरह उतारा। मणिरत्नम का कसा हुआ निर्देशन हर दृश्य में सौंदर्य और तनाव का अनूठा संतुलन पेश करता है।

अभिनय और सिनेमाई विरासत

अमरकांत के किरदार में शाहरुख खान ने अपने करियर का सबसे निडर और जोखिम भरा अभिनय दिया, जिसमें उन्होंने अपने स्थापित रोमांटिक नायक के सांचे को पूरी तरह तोड़ दिया। दूसरी ओर, मनीषा कोइराला की रहस्यमयी और वेदना से भरी आंखों ने उनके किरदार को अमर बना दिया, जबकि नवोदित अभिनेत्री प्रीति जिंटा की मासूमियत ने फिल्म में एक ताजगी भरा पहलू जोड़ा। समय बीतने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसे अपार प्रशंसा मिली और यह प्रतिष्ठित बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सम्मानित होने वाली पहली हिंदी फीचर फिल्म बनी। डिजिटल और OTT के आधुनिक दौर में 'दिल से..' को एक उत्कृष्ट कलाकृति माना जाता है। फिल्म का अंतिम दृश्य, जहां अमर और मेघना बम विस्फोट के बीच एक-दूसरे को गले लगाते हैं, हिंदी सिनेमा का सबसे भावुक और यादगार क्षण माना जाता है, जो साबित करता है कि महान कला बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से परे होती है।

सवाल-जवाब

क्या दिल से.. देखने लायक है?
हां, अगर आप मणिरत्नम के बेहतरीन निर्देशन, एआर रहमान के कालजयी संगीत और शानदार अभिनय से सजी एक गंभीर राजनीतिक प्रेम कहानी देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए।
दिल से.. जैसी कौन सी फिल्में हैं?
90 के दशक की 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' और 'कुछ कुछ होता है' जैसी हल्की-फुल्की फिल्मों के विपरीत, 'दिल से..' मणिरत्नम की आतंकवाद ट्रिलॉजी की 'रोजा' और 'बॉम्बे' जैसी गंभीर फिल्मों से मेल खाती है।
फिल्म दिल से.. का कुल ड्यूरेशन कितना है?
यह फिल्म 21 अगस्त 1998 को रिलीज हुई थी और इसका कुल रनटाइम 158 मिनट है।
बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में कौन सी उपलब्धि मिली थी?
यह फिल्म बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सम्मानित होने वाली पहली हिंदी फीचर फिल्म बनी थी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR