हिंदी सिनेमा के इतिहास में नब्बे का दशक कर्णप्रिय धुनों और जज्बातों से भरे गीतों का स्वर्णिम काल माना जाता है। उस दौर के कई नगमे ऐसे हैं जो वक्त की सीमाओं को लांघकर तीन दशक बाद भी संगीत प्रेमियों की जुबान पर ताजा हैं। ऐसा ही एक यादगार उदाहरण साल 1993 की रोमांटिक ड्रामा फिल्म बलमा का मशहूर ट्रैक अगर जिंदगी हो है। टिकट खिड़की पर फिल्म की असफलता के बावजूद इस विशेष रचना ने संगीत प्रेमियों के दिलों में अपनी मुकम्मल जगह बनाई और दो चाहने वालों के गहरे आत्मिक रिश्ते का प्रतीक बन गई।
शानदार गायकी और धुन का अनूठा संगम
इस मेलोडी की सबसे बड़ी ताकत इसकी गायकी और रचना रही। संगीत जगत के दो दिग्गज गायकों कुमार सानू और आशा भोसले ने इसे अपना स्वर दिया था। दोनों फनकारों के सुरों की जुगलबंदी ने हर पंक्ति में समर्पण और अपनापन घोल दिया। उस जमाने में चार्टबस्टर एल्बम देने वाली नदीम-श्रवण की संगीतकार जोड़ी ने इसकी धुन तैयार की थी, जिनका नाम उस दौर में हिट गानों का पर्याय समझा जाता था। वहीं गीतकार समीर अनजान ने अपने कलम के जादू से ऐसे भावनात्मक बोल रचे, जो सच्चे प्रेम, आपसी विश्वास और अटूट वफादारी के अहसास को सहजता से बयां करते हैं।
पर्दे पर आयशा जुल्का और अविनाश वाधवन की जोड़ी
फिल्म में मुख्य भूमिकाओं के जरिए अभिनेत्री आयशा जुल्का और अभिनेता अविनाश वाधवन की जोड़ी दर्शकों के सामने आई थी। अपनी मासूमियत और सहज अभिनय के लिए पहचानी जाने वाली आयशा जुल्का ने इस प्रेम कहानी में संजीदगी भरी, जबकि चॉकलेटी छवि वाले अविनाश वाधवन ने केंद्रीय नायक के संघर्ष को पर्दे पर उतारा। इस मुख्य जोड़ी के अलावा फिल्म में मजबूत सहायक कलाकारों की मौजूदगी थी, जिनमें सईद जाफरी, अंजना मुमताज और अवतार गिल शामिल थे। इन अनुभवी कलाकारों के शानदार अभिनय के बाद भी यह रोमांटिक ड्रामा दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में नाकाम रहा और बॉक्स ऑफिस पर पिछड़ गया।
पारिवारिक संघर्ष और नोकझोंक से पनपी मोहब्बत
फिल्म की पटकथा मूल रूप से गलतफहमियों, पारिवारिक खींचतान और आर्थिक तंगी के बीच पनपते रिश्ते के ताने-बाने पर आधारित थी। नायक विशाल, जिसे अविनाश वाधवन ने निभाया, एक शिक्षित लेकिन बेरोजगार युवक है जो अपनी बीमार मां की तीमारदारी में जुटा है। कई जतन करने के बाद भी जब उसे रोजगार नहीं मिलता, तब उसकी मुलाकात मधु यानी आयशा जुल्का से होती है। मधु एक संपन्न घराने की मनमौजी और जिद्दी युवती है, जो शादी के पारंपरिक बंधन से बचने के लिए अजीबोगरीब व्यवहार करती है और किसी गंभीर जीवनसाथी के पक्ष में नहीं होती।
विज्ञापनों की उलझन से उपजा सच्चा प्यार
कहानी में नया मोड़ तब आता है जब विशाल समाचार पत्र में मधु के परिवार की तरफ से दिया गया वैवाहिक विज्ञापन पढ़ता है। किसी भी तरह नौकरी और आजीविका की तलाश में भटकता विशाल वहां पहुंच जाता है। इसके बाद मधु उसे तरह-तरह की कठिन परीक्षाओं में डालकर परेशान करती है। लगातार होने वाली तकरार और नोकझोंक के बीच हालात ऐसा रुख लेते हैं कि दोनों एक-दूसरे के व्यक्तित्व को समझने लगते हैं और उनके बीच सच्चा आकर्षण पैदा हो जाता है। आगे चलकर कहानी कई उतार-चढ़ावों और भावनात्मक मोड़ों से गुजरती है। भले ही पूरी फिल्म दर्शकों की कसौटी पर खरी न उतरी हो, लेकिन इसका संगीत अपने दौर की सबसे बड़ी सफलताओं में गिना गया।
















