अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई जोड़कर आशियाना बनाना या जमीन खरीदना हर किसी की जिंदगी का बड़ा सपना होता है. दिल्ली से सटे फरीदाबाद जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहरों में प्रॉपर्टी की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ ही रियल एस्टेट बाजार में ठगी और फर्जीवाड़े के मामले भी सामने आ रहे हैं. कई बार लोग सिर्फ विक्रेता या प्रॉपर्टी डीलर की बातों पर भरोसा करके बिना सोचे-समझे पैसे लगा देते हैं और बाद में कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़ते हैं. अचल संपत्ति की खरीद-फरोख्त में जरा सी चूक जीवनभर की जमा-पूंजी को खतरे में डाल सकती है. ऐसे में किसी भी जमीन, प्लॉट या फ्लैट का सौदा पक्का करने से पहले उसके मालिकाना हक और कानूनी दस्तावेजों की बारीकी से जांच करना बेहद आवश्यक हो जाता है.
फरीदाबाद सेक्टर 12 स्थित डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन कोर्ट में पिछले 25 वर्षों से वकालत कर रहे एडवोकेट कुणाल कांत शर्मा के अनुसार, प्रॉपर्टी के कागजात असली हैं या नकली, इसकी पहचान के लिए खरीदार को कुछ बुनियादी कानूनी प्रक्रियाओं की खुद पड़ताल करनी चाहिए. उन्होंने बताया कि आज के डिजिटल दौर में सिर्फ कागज देखकर संतुष्ट हो जाना सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है. इसलिए सौदे की बातचीत शुरू होते ही विक्रेता से मूल दस्तावेज यानी ओरिजिनल पेपर देखने की मांग करनी चाहिए. इसके साथ ही दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपि लेकर उस संबंधित तहसील और सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में सरकारी रिकॉर्ड का मिलान करना पहला और सबसे बुनियादी कदम है.
कंप्यूटर जनरेटेड स्टांप पेपर और नकल का नया खेल
दस्तावेजों में धोखाधड़ी के तौर-तरीकों को समझाते हुए एडवोकेट कुणाल कांत शर्मा बताते हैं कि पहले के समय में स्टांप पेपर सरकारी मुद्रणालय से प्रिंट होकर आते थे, जिन पर 25 हजार रुपये, 15 हजार रुपये या 5 हजार रुपये का स्पष्ट मूल्य छपा होता था. उन पारंपरिक स्टांप पेपरों की प्रामाणिकता उनके भौतिक रूप से ही झलकती थी. इसके विपरीत, मौजूदा व्यवस्था में कंप्यूटर जनरेटेड ई-स्टांप पेपर जारी किए जाते हैं. इस डिजिटल सिस्टम की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि 1 रुपये का ई-स्टांप भी देखने में बिल्कुल वैसा ही प्रतीत होता है जैसा कि 1 करोड़ रुपये की संपत्ति के लिए निकाला गया ई-स्टांप पेपर होता है.
आम खरीदार अक्सर इस बात को नहीं समझ पाते कि कंप्यूटर से निकले प्रिंटआउट पर सरकार की कोई अलग से उभरी हुई मोहर नहीं होती. स्टांप वेंडर सरकारी पोर्टल पर खरीदार और विक्रेता का विवरण दर्ज करते हैं और सीधे सादे कागज पर प्रिंटआउट दे देते हैं. इसमें तकनीकी जानकारी रखने वाले शातिर लोग हेरफेर कर सकते हैं. यदि खरीदार ने केवल विक्रेता द्वारा थमाए गए प्रिंटआउट या फोटोकॉपी को देखकर यकीन कर लिया, तो वह बड़ी ठगी का शिकार बन सकता है. असली और नकली स्टांप पेपर के बीच का फर्क सिर्फ आंखों से देखकर पकड़ना मुश्किल होता है, जिसके लिए आधिकारिक पुष्टि अनिवार्य है.
सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में रिकॉर्ड की सीधी पड़ताल
इस तरह के जालसाजी से बचने का सबसे सटीक और कानूनी तरीका सब-रजिस्ट्रार कार्यालय की मदद लेना है. एडवोकेट कुणाल कांत शर्मा का कहना है कि जिस तहसील के अधिकार क्षेत्र में वह संपत्ति स्थित है, खरीदार को सीधे उसी तहसील के सब-रजिस्ट्रार ऑफिस जाना चाहिए. वहां निर्धारित सरकारी फीस जमा करके संपत्ति के पुराने रिकॉर्ड का मुआयना करने का आवेदन देना चाहिए. कानूनन जब भी किसी संपत्ति की रजिस्ट्री होती है, तो उसके दो सेट तैयार किए जाते हैं. एक मूल दस्तावेज खरीदार को सौंपा जाता है, जबकि दूसरा दस्तावेज संबंधित सब-रजिस्ट्रार कार्यालय के रिकॉर्ड रूम में सुरक्षित रख लिया जाता है.
तहसील के रिकॉर्ड रूम में मौजूद प्रतिलिपि की जांच करने से यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि जो सेल डीड विक्रेता दिखा रहा है, ठीक वैसी ही कॉपी सरकारी बहीखाते में दर्ज है या नहीं. अगर विक्रेता के दिए कागज और सरकारी रिकॉर्ड की लिखावट, पेज संख्या या शर्तों में कोई भी विसंगति मिलती है, तो फौरन सतर्क हो जाना चाहिए. यह पड़ताल किसी बिचौलिए पर छोड़ने के बजाय खरीदार को खुद या अपने स्वतंत्र कानूनी सलाहकार के माध्यम से करानी चाहिए.
विक्रेता के वास्तविक मालिकाना हक की तस्दीक
सौदे में यह सुनिश्चित करना भी बेहद अहम है कि सामने खड़ा व्यक्ति ही संपत्ति का कानूनी मालिक है. एडवोकेट कुणाल कांत शर्मा स्पष्ट करते हैं कि सेल डीड में दर्ज नाम को विक्रेता के आधार कार्ड से अक्षर-दर-अक्षर मिलाना चाहिए. रजिस्ट्री के समय दस्तावेजों पर दो तरह की तस्वीरें लगती हैं, एक भौतिक रूप से चिपकाई गई फोटो और दूसरी बायोमेट्रिक प्रक्रिया के दौरान सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में खींची गई कंप्यूटर जनरेटेड फोटो. जब खरीदार सब-रजिस्ट्रार ऑफिस से रिकॉर्ड का प्रिंटआउट निकलवाता है, तो उसमें वास्तविक मालिक की तस्वीर स्पष्ट रूप से सामने आ जाती है. इस सरकारी फोटो से वर्तमान विक्रेता के चेहरे का मिलान करके फर्जी पहचान के जरिए होने वाली बिक्री को पकड़ा जा सकता है.
अदालती स्टे और कानूनी विवादों की जानकारी कैसे जुटाएं
प्रॉपर्टी पर किसी अदालत का स्टे या विवाद चल रहा है या नहीं, यह जानना खरीदार के लिए बेहद संवेदनशील मामला है. एडवोकेट शर्मा के मुताबिक, हालांकि कुछ राज्यों में विवादों की स्थिति ऑनलाइन पोर्टलों पर भी देखी जा सकती है, लेकिन जमीनी हकीकत जानने का सबसे पुख्ता जरिया सब-रजिस्ट्रार ऑफिस ही है. यदि किसी व्यक्ति ने उस जमीन पर निचली अदालत, हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से किसी प्रकार का स्टे ऑर्डर हासिल किया होता है, तो वह इसकी सूचना लिखित रूप में तहसील और सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में दर्ज करवाता है ताकि कोई अन्य व्यक्ति उस विवादित संपत्ति को बेच न सके.
यदि किसी व्यक्ति ने संपत्ति पर कोर्ट से स्टे ले रखा है और उसने सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में आवेदन देकर इसे दर्ज कराया है, तो वहां के रिकॉर्ड से इसका तुरंत पता चल जाता है. इसके अतिरिक्त खरीदार को सुरक्षा के लिहाज से विक्रेता से एक अलग कानूनी एफिडेविट यानी शपथ पत्र लेना चाहिए. इस शपथ पत्र में स्पष्ट घोषणा होनी चाहिए कि संपत्ति पर किसी भी अदालत में कोई मुकदमा लंबित नहीं है, इसे किसी व्यक्ति या संस्था के पास गिरवी या मॉर्गेज नहीं रखा गया है, और संपत्ति सभी प्रकार के कानूनी भारों से मुक्त है.
मूल दस्तावेज न मिलने का मतलब: बैंक लोन और मॉर्गेज का खतरा
प्रॉपर्टी पर किसी तरह का बैंक लोन या बकाया है या नहीं, इसकी पहचान का सीधा पैमाना मूल दस्तावेजों की उपलब्धता है. एडवोकेट कुणाल कांत शर्मा बताते हैं कि जब भी कोई संपत्ति मालिक किसी वित्तीय संस्थान या बैंक से ऋण लेता है, तो बैंक प्रॉपर्टी को मॉर्गेज यानी बंधक बनाता है. इस प्रक्रिया के तहत बैंक उस संपत्ति के वर्तमान मालिक के सारे मूल कागजात और उससे पहले के पुराने मालिकों की पूरी टाइटल चेन यानी पिछली कड़ियों के ओरिजिनल पेपर अपने लॉकर में जमा रख लेता है.
यदि सौदा तय करते समय विक्रेता मूल दस्तावेज दिखाने में टालमटोल करे, बहाने बनाए या केवल फोटोकॉपी थमाकर काम चलाने की कोशिश करे, तो समझ लेना चाहिए कि वह संपत्ति किसी बैंक या वित्तीय संस्था के पास गिरवी रखी हुई है. विक्रेता अगर फोटोकॉपी देने से भी कतराए, तो खरीदार को सीधे डॉक्यूमेंट का रजिस्ट्रेशन नंबर और विक्रेता का आधार नंबर नोट करके सब-रजिस्ट्रार ऑफिस के रिकॉर्ड रूम से पड़ताल करनी चाहिए, क्योंकि वहां हर रजिस्ट्री का स्थायी लेखा-जोखा मौजूद होता है.
बढ़ती कीमतों के दौर में जागरूकता ही बचाव
रियल एस्टेट में बढ़ते फर्जीवाड़े के सामाजिक कारणों पर बात करते हुए एडवोकेट कुणाल कांत शर्मा ने कहा कि हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है और शहर फैल रहे हैं. शहरों के विस्तार के साथ ही जमीन की कीमतों में भारी उछाल आया है. जो संपत्ति आज खरीदी जाती है, अगले 6 महीने में उसके भाव काफी बढ़ जाते हैं. मुनाफे के इस लालच के चलते कुछ लोगों में धोखाधड़ी की प्रवृत्ति भी बढ़ी है. इसलिए किसी भी संपत्ति में निवेश करने से पहले हर स्तर पर सावधानी बरतना जरूरी है. उन्होंने यह भी जोड़ा कि लोग इस विषय पर उनसे संपर्क कर सकते हैं और वे जमीन-जायदाद से जुड़ी कानूनी सलाह पूरी तरह निःशुल्क प्रदान करेंगे.





















