भारतीय पैरेलल सिनेमा के इतिहास में अपनी पहली और इकलौती फिल्म से गहरी छाप छोड़ने वाले फिल्ममेकर अवतार कौल के जीवन पर लिखी गई नई किताब सामने आई है। भारत सरकार के पब्लिकेशन डिवीजन की ओर से प्रकाशित इस किताब का नाम 'अवतार कौल – द (इन)कम्पलीट स्टोरी' रखा गया है। इस किताब का औपचारिक विमोचन 5 नवंबर 2026 को फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) के परिसर में आयोजित एक विशेष समारोह के दौरान किया जाएगा। यह पूरा आयोजन फिल्ममेकर अवतार कृष्ण कौल के जीवन, उनके अद्वितीय काम और उनकी विरासत को समर्पित रहेगा।
एफटीआईआई में होगा विमोचन और विशेष स्क्रीनिंग
इस पुस्तक विमोचन समारोह में एफटीआईआई के वाइस-चांसलर धीरज सिंह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। संस्थान के इस विशेष मंच पर फिल्म उद्योग के कई जाने-माने चेहरे, एफटीआईआई के पूर्व छात्र, शिक्षक, वर्तमान विद्यार्थी और सिनेमा प्रेमी एक साथ मौजूद रहेंगे। इस कार्यक्रम के जरिए उस फिल्मकार को श्रद्धांजलि दी जाएगी, जिनका रचनात्मक सफर बेहद असामयिक रूप से थम गया था। नई पीढ़ी के फिल्ममेकर्स और सिनेमा के छात्रों के सामने अवतार कौल के विजन को प्रस्तुत करने के लिहाज से यह आयोजन काफी अहम माना जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य फिल्म इतिहास के इस अनूठे अध्याय को सामने लाना है ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके शिल्प से प्रेरणा ले सकें। विमोचन कार्यक्रम के तुरंत बाद अवतार कौल की कालजयी कृति '27 डाउन' की विशेष स्क्रीनिंग भी रखी गई है, जिससे दर्शकों को बड़े पर्दे पर उनके काम को फिर से महसूस करने का अवसर मिलेगा।
भतीजे विनोद कौल ने सहेजी हैं अनसुनी यादें
इस जीवनी को अवतार कौल के भतीजे विनोद कौल ने कलमबद्ध किया है। पुस्तक में अवतार कौल के संपूर्ण जीवन, उनकी रचनात्मक यात्रा और भारतीय सिनेमा में उनके खास योगदान का विस्तृत ब्यौरा दर्ज किया गया है। किताब को तैयार करने के लिए दुर्लभ आर्काइव सामग्री, अप्रकाशित तस्वीरों, पारिवारिक संस्मरणों और उनके करीबियों के व्यक्तिगत अनुभवों का सहारा लिया गया है। इस दस्तावेज का मकसद एक ऐसे जीनियस फिल्म निर्माता की कलात्मक विरासत को दोबारा चर्चा के केंद्र में लाना है, जिसे आधुनिक दौर में नए सिरे से पहचाने और सराहे जाने की आवश्यकता है।
'27 डाउन' और दो राष्ट्रीय पुरस्कारों का सफर
अवतार कौल की बनाई इकलौती फिल्म '27 डाउन' आज भी भारतीय न्यू वेव और पैरेलल सिनेमा की प्रतिनिधि रचनाओं में शुमार की जाती है। यह फिल्म जाने-माने लेखक रमेश बख्शी के उपन्यास 'अठारह सूरज के पौधे' पर आधारित थी। फिल्म की कहानी एक ऐसे युवा के आंतरिक संघर्ष और मनोवैज्ञानिक द्वंद्व को दर्शाती है, जो अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं, कठोर सामाजिक वास्तविकताओं और अपनी पहचान की खोज के बीच फंसा हुआ है। इस क्लासिक फिल्म को 'बेस्ट हिंदी फीचर फिल्म' और 'बेस्ट ब्लैक-एंड-व्हाइट सिनेमैटोग्राफी' के लिए दो प्रतिष्ठित नेशनल अवॉर्ड हासिल हुए थे। घरेलू स्तर के साथ-साथ इस फिल्म को वैश्विक मंचों पर भी खूब सराहना और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली थी।



















