लगान की 'गौरी' से ब्रह्माकुमारी तक: ग्रेसी सिंह का चमक से सुकून तक का सफरबॉलीवुड
4 घंटे पहले· 0

लगान की 'गौरी' से ब्रह्माकुमारी तक: ग्रेसी सिंह का चमक से सुकून तक का सफर

ऑस्कर तक पहुंची 'लगान' से रातोंरात स्टार बनीं ग्रेसी सिंह ने लगातार फ्लॉप फिल्मों के बाद बॉलीवुड को अलविदा कह दिया और अब आध्यात्म की राह पर सुकून तलाश रही हैं।

एक दौर था जब ग्रेसी सिंह का नाम बॉलीवुड की सबसे चहेती हीरोइनों में लिया जाता था। आमिर खान की सुपरहिट फिल्म 'लगान' में गौरी के किरदार ने उन्हें घर-घर पहचान दिलाई और इसी पहचान के दम पर उन्हें इंडस्ट्री में मजबूती से कदम जमाने का मौका मिला। इसके बाद अजय देवगन, संजय दत्त और अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गज सितारों के साथ उनकी जोड़ी पर्दे पर नजर आई।

एक डांसर से अभिनेत्री बनने तक

दिलचस्प बात यह है कि ग्रेसी ने अपने सफर की शुरुआत अभिनय से नहीं, बल्कि नृत्य से की थी। वह 'The Planets' नाम के एक डांस ग्रुप के साथ टूर किया करती थीं। नृत्य से धीरे-धीरे रुझान अभिनय की ओर मुड़ा और साल 1997 में उन्होंने मशहूर टीवी सीरियल 'अमानत' से छोटे पर्दे पर डेब्यू किया। लेकिन उन्हें असली शोहरत साल 2001 में आशुतोष गोवारिकर की कालजयी फिल्म 'लगान' से मिली।

'लगान' ने बदली किस्मत

पीरियड स्पोर्ट्स ड्रामा 'लगान' का लेखन और निर्देशन आशुतोष गोवारिकर ने किया था, जबकि इसके निर्माता खुद आमिर खान थे। इस फिल्म में अपनी सादगी और मासूमियत के दम पर ग्रेसी ने दर्शकों के दिल में खास जगह बना ली। फिल्म सुपरहिट साबित हुई और साल 2001 में ऑस्कर के लिए नामांकित भी हुई। वैश्विक स्तर पर इसने जो धूम मचाई, उसने ग्रेसी को रातोंरात स्टार बना दिया। खास बात यह रही कि 'मदर इंडिया' और 'सलाम बॉम्बे' के बाद ऑस्कर की बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म कैटेगरी में जगह बनाने वाली यह तीसरी भारतीय फिल्म बनी।

कामयाबी का सिलसिला और फिर ढलान

'लगान' की ऐतिहासिक सफलता के बाद ग्रेसी ने 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' और 'गंगाजल' जैसी एक के बाद एक हिट फिल्में दीं। इन फिल्मों में उनके सादगी भरे किरदार और बेहतरीन अभिनय को दर्शकों ने खूब सराहा। लेकिन इतनी सफल फिल्में देने के बावजूद वह इस ऊंचाई को लंबे समय तक थामे नहीं रख सकीं। आगे चलकर उन्होंने 'अरमान' में अनिल कपूर और अमिताभ बच्चन जैसे बड़े सितारों के साथ काम किया, मगर यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह नाकाम रही। इसके बाद 'चंचल', 'देशद्रोही' और 'देख भाई देख' जैसी फिल्मों में उन्होंने लीड भूमिकाएं निभाईं, लेकिन ये सभी दर्शकों को लुभाने में नाकाम रहीं और बॉक्स ऑफिस पर डिजास्टर साबित हुईं।

रीजनल सिनेमा और बड़े पर्दे से दूरी

बॉलीवुड में लगातार फ्लॉप फिल्मों के बाद ग्रेसी ने रीजनल सिनेमा का रुख किया। उन्होंने तमिल, तेलुगु, मलयालम, गुजराती, पंजाबी और बंगाली भाषाओं की फिल्मों में अपने लिए नई संभावनाएं तलाशीं। लेकिन जब इन प्रयासों से भी करियर को कोई खास सहारा नहीं मिला, तो उन्होंने बड़े पर्दे से दूरी बना लेने का फैसला कर लिया।

टीवी पर वापसी और आध्यात्म की ओर रुख

ग्रेसी हमेशा खुलकर यह स्वीकार करती रही हैं कि अभिनय कभी भी उनकी जिंदगी का आखिरी मकसद नहीं था और न ही वह बॉलीवुड की बड़ी स्टार बनने की अंधी होड़ का हिस्सा बनना चाहती थीं। साल 2015 में उन्होंने टीवी सीरियल 'संतोषी मां' से छोटे पर्दे पर जोरदार वापसी की और मां संतोषी के किरदार में नई पीढ़ी के दर्शकों का दिल जीत लिया। फिल्मी चकाचौंध से दूर होने के बाद बीते कुछ सालों में वह आध्यात्मिक संस्था Brahma Kumaris से गहराई से जुड़ गईं और अक्सर कई मंचों पर इस अनुभव को साझा करती हैं। उनका मानना है कि नाम, शोहरत और अभिनय की दुनिया से बहुत आगे निकलकर आध्यात्मिक राह पर चलते हुए उन्हें अपनी जिंदगी का असली सुकून और आत्मसंतुष्टि मिल गई है।

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