मराठी और हिंदी सिनेमा में कई दशकों तक अपनी सशक्त अदाकारी की छाप छोड़ने वाले नाना पाटेकर के जाने से कला जगत में गहरा शोक है। पुणे के निकट डोंजे गांव में स्थित उनके निजी फार्महाउस ‘नानाची वाड़ी’ के पास आठ अक्टूबर की देर रात उनका अंतिम संस्कार किया गया। प्रशंसकों और सहकर्मियों को उम्मीद थी कि पार्थिव देह को सार्वजनिक दर्शन हेतु रखा जाएगा, मगर सूर्यास्त बीत जाने के बाद रात के वक्त ही सारी धार्मिक विधियां पूरी कर दी गईं। इसके चलते अनेक प्रशंसक और हस्तियां अंतिम विदाई देने नहीं पहुंच सके। बाद में उनके पुत्र मल्हार पाटेकर ने इस फैसले की वजह स्पष्ट की और पिता के साथ बिताए आखिरी पलों का विवरण साझा किया।
देर रात अंत्येष्टि करने का फैसला क्यों लेना पड़ा
सामान्य तौर पर हिंदू परंपरा के मुताबिक दिन ढलने अथवा सूर्यास्त होने के बाद दाह संस्कार नहीं किया जाता। इसी कारण रात के समय अंतिम संस्कार होने पर लोगों के मन में कई सवाल उठ रहे थे। मल्हार पाटेकर ने इस संदर्भ में जानकारी देते हुए बताया कि परिवार उस वक्त गोवा में मौजूद था, जहां से पार्थिव शरीर को पुणे के डोंजे गांव तक लाने में अनुमान से कहीं अधिक वक्त लग गया।
सड़क मार्ग से तय की गई लंबी दूरी की वजह से वाहन को पहुंचने में काफी विलंब हो गया था। मल्हार के अनुसार, सुबह ही उनके पिता का देहावसान हो चुका था, जिसके कारण घंटों का समय पहले ही निकल चुका था। ऐसी स्थिति में पार्थिव देह को अगली सुबह तक रोके रखना उचित और व्यावहारिक नहीं माना गया। इसी अपरिहार्य परिस्थिति के चलते परिजनों ने रात में ही मुखाग्नि देने का कठिन निर्णय लिया। पुत्र मल्हार ने नम आंखों से पिता के चरण स्पर्श किए और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पत्नी नीलकांति तथा अन्य नजदीकी लोगों की उपस्थिति में अंतिम क्रियाएं संपन्न की गईं।
काम और इंसानियत के जरिए हमेशा याद रहेंगे
मल्हार पाटेकर ने पिता के व्यक्तित्व को नमन करते हुए कहा कि नाना साहब जैसे समर्पित व्यक्तित्व कभी विदा नहीं होते, वे अपनी कृतियों और समाज कल्याण के जरिए लोगों के दिलों में हमेशा कायम रहते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि नाना पाटेकर हमेशा समाज में एकता, बंधुत्व और मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि मानते थे। उनका मानना था कि लोगों को व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर संसार को एक बेहतर जगह बनाने में अपना योगदान देना चाहिए।
अंतिम बातचीत में बेटे की बीमारी को लेकर चिंतित थे नाना
अस्पताल या जीवन के आखिरी पलों से पहले हुई बातचीत को याद करते हुए मल्हार भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि अपनी पीड़ा या बीमारी के बजाय नाना पाटेकर अपने बेटे की सेहत को लेकर अधिक परेशान थे। दरअसल कुछ समय से मल्हार का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था, जिसकी चिंता नाना के मन में लगातार बनी हुई थी।
मल्हार ने बताया कि अंतिम संवाद के दौरान पिता ने उनसे केवल एक ही आग्रह किया था कि वे अपनी तबीयत का पूरा ख्याल रखें। अपनी संजीदा छवि और कड़क मिजाज के लिए मशहूर अभिनेता का यह पिता स्वरूप बेहद संवेदनशील था, जहां उनके लिए अपनी तकलीफ से बढ़कर अपनी संतान की तंदुरुस्ती अहम थी।
नाम फाउंडेशन और सामाजिक प्रकल्पों को आगे बढ़ाने का संकल्प
नाना पाटेकर केवल रुपहले पर्दे तक सीमित नहीं थे, बल्कि उन्होंने नाम फाउंडेशन की स्थापना करके सूखाग्रस्त क्षेत्रों, जल संचयन, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किए। मल्हार पाटेकर ने यह स्पष्ट किया कि उनके पिता द्वारा शुरू किया गया कोई भी जनहितकारी मिशन बंद नहीं होगा। नाना साहब ने जीवनकाल में ही विभिन्न जिम्मेदारियों का विभाजन कर दिया था, ताकि प्रकल्प निर्बाध गति से चलते रहें।
मराठवाड़ा क्षेत्र में प्रस्तावित योजनाओं और सामाजिक विकास कार्यों को गति देने के लिए राज्य के मुख्यमंत्री से भी संवाद स्थापित किया गया है। वर्तमान में फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी गणेश थोरात के दिशा-निर्देशन में सभी राहत और विकास परियोजनाएं संचालित हो रही हैं। मल्हार ने संकल्प जताया कि पिता के अधूरे सपनों को पूरा करना और समाजसेवा के उस विशाल दायरे को आगे ले जाना अब पूरे परिवार और संगठन का प्राथमिक दायित्व है।



















