भारतीय कला और सिनेमा जगत ने एक ऐसा सितारा खो दिया है जिसकी भरपाई संभव नहीं दिखती। हिंदी फिल्मों में अपने सशक्त किरदारों से अलग छाप छोड़ने वाले दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के देहांत के बाद हर तरफ गम का माहौल है। अभिनय की दुनिया ही नहीं, बल्कि संगीत और संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े लोग भी इस क्षति पर स्तब्ध हैं। विख्यात सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान ने अभिनेता के निधन पर गहरा शोक जताते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नाना पाटेकर का पर्दे पर दिखने वाला अंदाज पूरी तरह अनोखा था और उनकी खाली हुई जगह को कोई दूसरा कलाकार कभी भर नहीं सकता।
कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति
उस्ताद अमजद अली खान ने अभिनेता के योगदान पर चर्चा करते हुए कहा कि नाना पाटेकर का जाना समूचे सांस्कृतिक संसार के लिए एक बहुत बड़ा आघात है। वह खुद अभिनेता के काम के मुरीद रहे हैं और उन्होंने उनकी अनेक कृतियां देखी हैं। उस्ताद के अनुसार, नाना पाटेकर जिस शिद्दत से संवाद बोलते थे और अपने पात्रों में जान फूंकते थे, वह सिनेमा प्रेमियों के जेहन में स्थायी रूप से बस जाता था। सरोद वादक ने भावुक होते हुए कहा,
"आज सबसे बड़ा दुख है कि हमारे लीजेंडरी नाना पाटेकर जी नहीं रहे।"उन्होंने जोर देकर कहा कि वह स्वयं उनके बहुत बड़े प्रशंसक हैं। नाना पाटेकर ने जिस मौलिक शिल्प से अपनी पहचान बनाई, वही बात उन्हें समकालीन कलाकारों की भीड़ से बिल्कुल जुदा करती थी। इस दौरान सरोद वादक की धर्मपत्नी सुभलक्ष्मी बरुआ खान भी उपस्थित थीं और उन्होंने भी अभिनेता के इस तरह चले जाने को अत्यंत दुखद बताया।
एकल मुलाकात और शास्त्रीय संगीत का लगाव
नाना पाटेकर के साथ बीते पलों को साझा करते हुए उस्ताद अमजद अली खान ने बताया कि उन्हें जीवन में केवल एक मर्तबा अभिनेता से व्यक्तिगत रूप से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। उसी संक्षिप्त बैठक के दौरान उन्हें यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि पर्दे पर बेहद तीखे और यथार्थवादी किरदार निभाने वाले नाना पाटेकर शास्त्रीय संगीत के प्रति भी गहरा लगाव रखते थे। संगीतज्ञ के अनुसार, नाना का संवेदनशील व्यक्तित्व और राग-रागिनियों के प्रति उनकी समझ उन्हें एक साधारण अभिनेता से कहीं ऊंचा दर्जा देती थी। हालांकि दोनों के बीच दोबारा आमना-सामना नहीं हो सका, मगर उस अकेली मुलाकात की स्मृति आज भी संगीतकार के जेहन में ताजा है। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि दिवंगत आत्मा को चिर शांति और मोक्ष मिले। उनका मानना है कि नाना पाटेकर अपनी कालजयी फिल्मों और संवादों के माध्यम से सदैव दर्शकों के दिलों में जीवित रहेंगे।
गोवा आवास पर रात में बिगड़े थे हालात
नाना पाटेकर का देहावसान 8 अक्टूबर की सुबह गोवा स्थित उनके निजी निवास पर अचानक तबीयत नासाज होने की वजह से हुआ। मणिपाल अस्पताल के ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. शेखर सालकर ने इस पूरे घटनाक्रम का विवरण साझा किया। उन्होंने बताया कि रात के समय अभिनेता को अचानक अस्वस्थता महसूस हुई थी। लगभग 2:30 बजे नाना पाटेकर ने अपने एक करीबी दोस्त को संदेश भेजकर अवगत कराया था कि उनकी हालत ठीक नहीं लग रही है। हालांकि आधी रात का वक्त होने के कारण मित्र उस संदेश को तुरंत नहीं देख पाए। जब कुछ समय बाद उन्होंने संदेश पढ़ा, तो तुरंत अभिनेता को फोन मिलाया और सुबह करीब 4:00 बजे सीधे उनके बंगले पर जा पहुंचे।
घर के भीतर का दृश्य देखकर मित्र दंग रह गए, क्योंकि नाना पाटेकर अत्यधिक पसीने से भीगे हुए थे और उनकी शारीरिक स्थिति बहुत तेजी से गिर रही थी। अभिनेता की चेतना धीरे-धीरे लुप्त हो रही थी। आपातकालीन परिस्थिति को भांपते हुए फौरन उनके केयरटेकर को अस्पताल की तरफ दौड़ाया गया और साथ ही एंबुलेंस को तुरंत मौके पर पहुंचने के लिए फोन किया गया।
चिकित्सकों के तमाम प्रयासों के बाद भी नहीं बची जान
डॉ. शेखर सालकर के अनुसार, एंबुलेंस के साथ पहुंची इमरजेंसी मेडिकल टीम ने अभिनेता को घर से रवाना करते समय ही जरूरी जीवनरक्षक कदम उठाने शुरू कर दिए थे। रास्ते में ही कार्डियक मसाज और पुनर्जीवन के अन्य तकनीकी प्रोटोकॉल लागू किए गए। नाना पाटेकर को सुबह करीब 4:20 से 4:30 बजे के बीच मणिपाल अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में पहुंचाया गया था।
अस्पताल परिसर में वरिष्ठ डॉक्टरों के दल ने लगभग 45 मिनट से एक घंटे तक लगातार उन्हें होश में लाने और हृदय गति को सामान्य करने की भरसक कोशिश की। आधुनिक उपकरणों और गहन चिकित्सा के बावजूद अभिनेता के शरीर ने कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी। आखिरकार सुबह लगभग 5:30 बजे डॉक्टरों ने उन्हें आधिकारिक तौर पर मृत घोषित कर दिया। इसके पश्चात 8 अक्टूबर की देर रात राजकीय सम्मान की औपचारिकताएं पूरी करते हुए उनका अंतिम संस्कार संपन्न किया गया।



















