पौराणिक गाथाओं में लंकापति के सबसे विनाशकारी योद्धा की छवि जितनी भीषण रही है, परदे पर उसे साकार करने का रोमांच भी उतना ही बड़ा होता है। नितेश तिवारी के निर्देशन में बनी भव्य कृति में जब रावण के ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद का आगमन होता है, तो पूरा माहौल एक सन्नाटे और खौफ से भर जाता है। इस जटिल और मायावी किरदार को निभाने का जिम्मा उठाया है राघव जुयाल ने, जिन्होंने अपने शुरुआती दृश्यों में ही दर्शकों को स्तब्ध कर दिया है। फिल्म के सामने आते ही हर तरफ इस बात की चर्चा छिड़ गई है कि कैसे एक कलाकार ने बिना किसी संवाद के, केवल अपनी देहभाषा और आंखों की ज्वाला से इंद्रजीत की भयावह शक्ति को स्थापित कर दिया।
जटायु की चेतावनी और महायज्ञ की रहस्यमयी शुरुआत
कथा के प्रवाह में मेघनाद का परिचय अत्यंत नाटकीय और गंभीर मोड़ पर घटित होता है। पक्षीराज जटायु जब अपने अंतिम क्षणों में श्रीराम को सचेत करते हैं, तो वे साफ शब्दों में स्पष्ट कर देते हैं कि लंका के राजकुमार का बाहुबल स्वयं दशानन जितना ही प्रचंड है। इस पूर्वसूचना के तुरंत बाद परदे पर राघव जुयाल की प्रविष्टि होती है। कृष्ण वर्ण के वस्त्र धारण किए वे एक महायज्ञ की वेदी के समीप आहुतियां देते दिखाई पड़ते हैं। इस पूरे दृश्य खंड में उनके मुख से एक भी शब्द नहीं निकलता, मगर उनकी भंगिमाएं, आक्रामकता और तीव्र एकाग्रता यह सिद्ध कर देती हैं कि वे लंका के सैन्य तंत्र की सबसे घातक रीढ़ हैं। मूक रहकर भी उन्होंने अपने युद्धोन्माद से पूरे दृश्य को अपने नाम कर लिया।
दिग्गज सितारों के जमघट के बीच इंद्रजीत का भारी प्रभाव
इस वृहद सिनेमाई संसार में भारतीय सिनेमा के कई बड़े चेहरे आमने-सामने हैं। जहां श्रीराम के पावन स्वरूप में रणबीर कपूर मर्यादा और संयम की मिसाल बने हैं, वहीं माता जानकी के संवेदनशील भावों को साई पल्लवी ने जीवंत किया है। दूसरी ओर, सोने की लंका के अधिपति के तौर पर यश अपने महाकाय व्यक्तित्व के साथ खड़े हैं। इतने सशक्त सितारों के केंद्रीय टकराव के मध्य मेघनाद का उभरना कहानी को अभूतपूर्व तनाव प्रदान करता है। हालांकि उनका यह परिचय आने वाले विनाशकारी संग्राम की महज एक बानगी भर है। लंका के मैदान में जब श्रीराम की सेना पहुंचेगी, तब कथा के अगले अध्याय में राघव जुयाल का यह योद्धा रूप अपनी संपूर्ण आक्रामकता और मायावी अस्त्रों के साथ रणभूमि में प्रलय लाएगा।
देहरादून के मंचों से महाकाव्य के रणक्षेत्र तक का कठिन सफर
राघव जुयाल का अभिनय के इस शीर्ष मुकाम तक पहुंचना उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण है। उत्तराखंड की वादियों में स्थित देहरादून से निकलकर उन्होंने अपनी पहली राष्ट्रीय पहचान लय और ताल के अनोखे तालमेल से बनाई थी। 'डांस इंडिया डांस' के मंच पर उनके धीमे कदम और सहज हास्य ने उन्हें घर-घर का चहेता बना दिया था। इसके बाद छोटे परदे पर लोकप्रियता बटोरते हुए उन्होंने सिनेमाई जगत की ओर रुख किया, जहां 'एबीसीडी 2' और 'स्ट्रीट डांसर 3डी' जैसी फिल्मों ने उनके नर्तक स्वरूप को बड़े परदे पर फैलाया। बाद में वे 'किसी का भाई किसी की जान' में भी एक खास भूमिका में दिखे।
चॉकलेट छवि को तोड़कर गढ़ा क्रूर खलनायक का नया पैमाना
उनकी अभिनय यात्रा का सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब एक्शन थ्रिलर 'किल' रिलीज हुई। इस फिल्म में एक बेरहम और सनकी हत्यारे का किरदार निभाकर उन्होंने समीक्षकों की सारी पुरानी धारणाएं ध्वस्त कर दीं। उनकी आंखों में दिखने वाले पाशविक भाव ने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए थे। इस गहरे प्रभाव के बाद उन्होंने 'ग्यारा ग्यारा' और 'बैड्स ऑफ बॉलीवुड' में भी अपनी अभिनय क्षमता की विविधता को बखूबी साबित किया। अब महाकाव्य के सबसे जटिल योद्धा मेघनाद के रूप में उनका चयन यह दिखाता है कि वे किसी भी लीक में बंधने को तैयार नहीं हैं। आने वाले दूसरे भाग में जब इंद्रजीत और श्रीराम के अनुज के बीच घनघोर युद्ध छिड़ेगा, तब राघव का यह आक्रामक अभिनय भारतीय सिनेमा में खलनायकी का एक नया मानक स्थापित कर सकता है।



















