बॉलीवुड अभिनेता पंकज त्रिपाठी इन दिनों अपनी आगामी फिल्म ‘पारिवारिक मनोरंजन’ के चलते सुर्खियों में बने हुए हैं। अपनी सादगी और बेहतरीन अदाकारी के लिए खास पहचान रखने वाले पंकज का मानना है कि पर्दे पर किसी खास किरदार को जीना कुछ हफ्तों की मेहनत का परिणाम हो सकता है, लेकिन एक उम्दा कलाकार बनने के लिए लंबे वर्षों की तपस्या और साधना की आवश्यकता होती है। उनके अनुसार अभिनय केवल किसी भूमिका को समझ लेना भर नहीं है, बल्कि यह जीवनभर चलने वाली सीखने और ढलने की एक लंबी प्रक्रिया है।
अभिनय और बढ़ई की कला में समानता
मुंबई के गोरेगांव ईस्ट इलाके में अपनी सह-कलाकार अदिति राव हैदरी के साथ एक विशेष बातचीत के दौरान पंकज त्रिपाठी ने अभिनय की तैयारी को लेकर अपना अनूठा दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी फिल्म में कोई किरदार निभाने के लिए एक कलाकार को आमतौर पर एक, दो या तीन सप्ताह का समय मिल जाता है। इस सीमित समयावधि में वह स्क्रिप्ट पढ़ता है और अपनी भूमिका को आत्मसात करने का प्रयास करता है। हालांकि, एक परिपक्व अभिनेता के रूप में खुद को पूरी तरह तैयार करने में कई साल बीत जाते हैं।
अपनी इस बात को और अधिक स्पष्ट करने के लिए उन्होंने एक बढ़ई का उदाहरण दिया। अभिनेता ने समझाया कि एक कुर्सी का निर्माण करने में भले ही केवल चार दिन का समय लगे, लेकिन उस बढ़ई को वह कुर्सी उतनी ही कुशलता से बनाना सीखने में चार साल की मेहनत लगती है। इसी प्रकार, किसी एक किरदार की तैयारी तो चंद हफ्तों में पूरी हो सकती है, लेकिन एक संपूर्ण अभिनेता के रूप में उभरने के पीछे करीब 15 से 20 साल की लंबी साधना छिपी होती है।
व्यक्तिगत पसंद और फिल्मों का मूल्यांकन
इस बातचीत के दौरान पंकज त्रिपाठी ने दर्शकों की पसंद और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फिल्मों को लेकर मिलने वाली प्रतिक्रियाओं पर भी खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि अक्सर ऐसा देखा जाता है कि कलाकार और फिल्म निर्माता इस असमंजस में रहते हैं कि आखिर दर्शक पर्दे पर देखना क्या पसंद करते हैं। उनके मुताबिक, यदि किसी इंसान को कोई विशेष व्यंजन पसंद नहीं आता है, तो इसका यह अर्थ कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि वह भोजन खराब है। यह केवल उस व्यक्ति की अपनी व्यक्तिगत पसंद या नापसंद का मामला हो सकता है।
अभिनेता ने आगे कहा कि इंटरनेट और सोशल मीडिया की दुनिया में भी अमूमन ऐसा ही रवैया देखने को मिलता है। यदि किसी यूजर या दर्शक को कोई विशेष कहानी पसंद नहीं आती है, तो वह तुरंत उसे बेकार करार दे देता है। जबकि हकीकत यह होती है कि मु मुमकिन है कि कुछ समय बीतने के बाद उसी कहानी या शैली में उस व्यक्ति की रुचि विकसित हो जाए।
‘पारिवारिक मनोरंजन’ और घर के खाने सी सादगी
अपनी आने वाली फिल्म ‘पारिवारिक मनोरंजन’ के बारे में चर्चा करते हुए पंकज त्रिपाठी ने इसे घर पर बने सादे भोजन की तरह बताया। उन्होंने कहा कि यह एक बेहद साफ-सुथरी और सहज फिल्म है, जिसे दर्शक अपने पूरे परिवार के साथ बैठकर बिना किसी झिझक के देख सकते हैं। आज के दौर में फिल्मों की बेहद तेज एडिटिंग और दर्शकों के तेजी से घटते ध्यान को ध्यान में रखते हुए इस फिल्म का अंदाज काफी अलग और सुकून देने वाला है।

















