इबोला को दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारियों में गिना जाता है। यदि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी भी अनियंत्रित हो जाए तो मरीज को संभलने का कुछ समय मिल जाता है, लेकिन इबोला के मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं होता। यह खतरनाक वायरस 85 प्रतिशत से अधिक संक्रमित मरीजों को मौत के मुंह में धकेल देता है। इस जानलेवा बीमारी पर लगाम कसने के लिए दुनियाभर के शोधकर्ता और वैज्ञानिक दिन-रात जुटे हुए हैं, और इसी कड़ी में अब एक बहुत बड़ी सफलता हाथ लगी है। वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किए गए दो अलग-अलग टीकों को शानदार परिणाम मिले हैं, जिसके बाद इनके अंतिम और निर्णायक परिणामों के लिए क्लिनिकल ट्रायल की शुरुआत कर दी गई है। सबसे अहम बात यह है कि इनमें से एक वैक्सीन भारत की प्रसिद्ध कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा तैयार की गई है, जिसे ChAdOx1 नाम दिया गया है। इस भारतीय टीके को सीरम ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर विकसित किया है, जबकि दूसरी वैक्सीन अमरीकी कंपनी मॉडर्ना की mRNA-1469 है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की हरी झंडी मिलने के बाद इन दोनों ही टीकों का परीक्षण डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में किया जा रहा है।
बुंडीबुग्यो वायरस से निपटने की तैयारी
इबोला की यह गंभीर बीमारी मुख्य रूप से बुंडीबुग्यो वायरस के कारण फैलती है। शरीर के भीतर इस घातक वायरस के प्रभाव को न्यूनतम करने के उद्देश्य से ही इन दोनों टीकों के परीक्षण को हरी झंडी दिखाई गई है। अब तक सामने आए चिकित्सा प्रमाणों और डेटा के आधार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के टेक्निकल एडवाइरी ग्रुप ऑन कैंडिडेट वैक्सीन प्रायोरिटाइजेशन ने इसी सप्ताह इन टीकों के आगामी क्लिनिकल परीक्षणों के लिए अपनी औपचारिक मंजूरी दे दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एडहानॉम गेब्रियेसस ने इस ऐतिहासिक कदम पर बात करते हुए कहा कि यह पिछले कई वर्षों के कड़े परिश्रम और वैश्विक वैज्ञानिक साझेदारी का ही जीवंत परिणाम है कि आज हम इस मुकाम पर पहुंचे हैं और परीक्षण के इस चरण में प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने दुनिया भर के तमाम वैज्ञानिकों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और वैक्सीन निर्माण में सहयोग देने वाले साझीदारों का हृदय से आभार व्यक्त किया है। उनका मानना है कि इन सबकी सक्रिय भागीदारी से भविष्य में लाखों लोगों की बहुमूल्य जिंदगियों को इस भयंकर संकट से सुरक्षित बचाया जा सकेगा और यह टीका इबोला के सफाए में एक बेहद अहम हथियार साबित होगा।
कांगो में महामारी का इतिहास और वैश्विक फैलाव
इबोला एक ऐसी जानलेवा बीमारी है जिसकी चपेट में आने वाले करीब आधे संक्रमित लोगों की मौत तय मानी जाती है। कुछ विशेष मामलों में अन्य जटिलताएं बढ़ने पर इबोला पीड़ितों की मृत्यु दर बढ़कर 90 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इस वायरस ने भयंकर तबाही मचा रखी है। देश के भीतर अब तक इबोला के 10,500 से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं और इस संक्रमण के कारण 5,300 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। कांगो के कुल 8 राज्य इस प्रकोप से सबसे अधिक बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। केवल कांगो ही नहीं, बल्कि इसके पड़ोसी देशों जैसे सूडान, युगांडा, केन्या, नाइजीरिया और यहां तक कि यूरोपीय देश फ्रांस में भी इबोला के मरीज सामने आ चुके हैं। इतिहास में सबसे पहले इस बीमारी की पहचान वर्ष 1976 में हुई थी। उस समय यह एक साथ सूडान और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में फैला था। कांगो के याम्बुक गांव में सबसे पहले एक इंसान इस संक्रमण का शिकार बना था। चूंकि यह गांव इबोला नदी के बिल्कुल पास स्थित था, इसलिए इस बीमारी का नाम इबोला पड़ गया। मूल रूप से यह वायरस चमगादड़ों के जरिए इंसानों के शरीर में दाखिल हुआ था।
इम्यून सिस्टम को पूरी तरह तबाह कर देता है वायरस
आम बोलचाल की भाषा में इस बीमारी को इबोला वायरस ही कहा जाता है और इसके कई अलग-अलग रूप या स्ट्रेन मौजूद हैं। इनमें जैरे इबोलावाइरस, बुंडिबुग्यो इबोलावाइरस, सूडान इबोलावाइरस और बॉम्बाली इबोलावाइरस प्रमुख हैं। इन सभी में बुंडिबुग्यो इबोलावाइरस सबसे ज्यादा खतरनाक माना जाता है, और इसी के खातिर नया टीका तैयार किया गया है। यह वायरस सिंगल स्ट्रैंडेड आरएनए से बना होता है जो बेहद सूक्ष्म और पतले धागे की तरह होता है। जैसे ही यह मानव शरीर में प्रवेश करता है, यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यून सिस्टम को पूरी तरह तहस-नहस कर देता है। यह वायरस रक्त वाहिकाओं यानी खून की नलियों की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचाने लगता है, जिसके परिणामस्वरूप खून में थक्का जमने की प्रक्रिया बंद हो जाती है और नलियां लीक होने लगती हैं। इस वजह से शरीर से बहुत अधिक मात्रा में खून बहता है और अंततः मल्टी ऑर्गन फेल्योर की स्थिति पैदा हो जाती है।
इबोला के लक्षण और बचाव की चुनौतियां
यदि किसी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में इबोला वायरस प्रवेश कर जाए तो संक्रमण के 2 से 21 दिनों के भीतर इसके लक्षण साफ तौर पर दिखाई देने लगते हैं। संक्रमण की शुरुआत में अचानक तेज बुखार चढ़ता है और बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस होने लगती है। इसके साथ ही पूरे शरीर में भारी थकान और मांसपेशियों में तीव्र दर्द की शिकायत होने लगती है। गले में खराश और तेज सिरदर्द भी इसके शुरुआती लक्षणों में शामिल हैं। जब यह बीमारी और अधिक गंभीर रूप ले लेती है तो पीड़ित को लगातार उल्टी और दस्त की समस्या होने लगती है और त्वचा पर चकत्ते उभर आते हैं। बहुत जल्द ही पीड़ित की किडनी और लिवर बुरी तरह डैमेज होने लगते हैं। नाक, मसूड़ों या मल के रास्ते खून आने लगता है और आंतरिक रक्तस्राव यानी इंटरनल ब्लीडिंग बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। अब तक चिकित्सा जगत में इस बीमारी का कोई अचूक इलाज उपलब्ध नहीं है। केवल लक्षणों को नियंत्रित करके और चिकित्सीय देखरेख के जरिए ही मरीज को ठीक करने के प्रयास किए जाते हैं।



















