वर्तमान समय में दुनिया भर की आबोहवा में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है, लेकिन इस मामले में भारत की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। देश की राजधानी दिल्ली और उसके आसपास का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी एनसीआर इस समय किसी गैस चैंबर की तरह तब्दील हो चुका है। वायु प्रदूषण के घातक प्रभावों को आमतौर पर फेफड़ों और हृदय संबंधी बीमारियों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन हाल ही में सामने आए एक नए वैज्ञानिक शोध में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस जहरीली हवा के संपर्क में आने से शरीर के अंदर मौजूद बोन मैरो यानी अस्थि मज्जा की आयु बहुत तेजी से बढ़ने लगती है। इसके परिणामस्वरूप बोन मैरो की दोबारा से ग्रोथ करने और खुद को विकसित करने की क्षमता काफी कम हो जाती है। इस पूरी प्रक्रिया का बुरा असर यह होता है कि हड्डियों और फैट के निर्माण के बीच का प्राकृतिक संतुलन पूरी तरह से बिगड़ जाता है। गौर करने वाली बात यह है कि शरीर का अधिकांश खून इसी बोन मैरो के भीतर बनता है।
शरीर में बोन मैरो की स्थिति और इसकी अहमियत को समझें तो यह मुख्य रूप से हड्डियों की पसलियों, रीढ़ की हड्डी, पेल्विस और खोपड़ी वाले हिस्से में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यदि किसी वजह से बोन मैरो के कामकाज में बाधा आती है या यह डैमेज होता है, तो शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण कम होने लगता है, जिसका सीधा मतलब है कि खून की कमी पैदा होने लगती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, खतरनाक पीएम 2.5 कण जब सांस के जरिए शरीर के भीतर प्रवेश करते हैं, तो वे अंदरूनी अंगों की कोशिकाओं को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाना शुरू कर देते हैं। इस विषय पर किए गए अध्ययन के मुताबिक, यह रिसर्च मुख्य तौर पर चूहों पर की गई है, जिसमें यह बात खुलकर सामने आई कि जिन चूहों में डायबिटीज या मेटाबोलिक डिसॉर्डर की समस्या पहले से मौजूद थी, उनके बोन मैरो में सामान्य चूहों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर क्षति देखी गई है।
हालांकि यह विशिष्ट अध्ययन अभी तक इंसानों पर आधिकारिक रूप से नहीं किया गया है, लेकिन इसके परिणाम इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि जो लोग पहले से ही डायबिटीज जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह जहरीला प्रदूषण और भी अधिक घातक साबित हो सकता है। यह महत्वपूर्ण अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ हैजार्डस मटेरियल्स में प्रकाशित हुआ है। दक्षिण कोरिया स्थित ज्योनबुक नेशनल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के दौरान डायबिटिक और नॉन-डायबिटिक दोनों तरह के चूहों को पीएम 2.5 यानी पार्टिकुलेट मैटर 2.5 के संपर्क में रखा। इसके बाद जब प्रयोगशाला में इनकी गहराई से जांच की गई, तो पता चला कि इन सभी चूहों के बोन मैरो की स्टेम कोशिकाओं के भीतर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बहुत अधिक मात्रा में मौजूद था। इस अत्यधिक ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण कोशिकाओं में सेलुलर एजिंग यानी समय से पहले कोशिकाओं की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस की वजह से कोशिकाओं के अंदर फ्री रेडिकल्स की मात्रा में भारी वृद्धि होती है, जो विभिन्न तरीकों से कोशिकाओं को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। इस व्यवधान के कारण कोशिकाओं का प्राकृतिक रूप से होने वाला विभाजन बाधित होने लगता है। जिन चूहों में डायबिटीज की समस्या थी, उनमें यह सेलुलर नुकसान बेहद गंभीर स्तर पर पाया गया। इस पूरे मामले को लेकर जब गुरुग्राम स्थित सी के बिड़ला अस्पताल में डायबिटीज, ओब्सिटी एंड मेटाबोलिक डिसॉर्डर विभाग के डायरेक्टर डॉ. पारस अग्रवाल से चर्चा की गई, तो उन्होंने विस्तार से बताया कि वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव मानव शरीर के लगभग हर एक अंग पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पड़ते हैं। आमतौर पर हम इसे केवल लंग्स और हार्ट के लिए ही बुरा मानते हैं, लेकिन वास्तव में यह डायबिटीज के मरीजों के लिए कई गुना ज्यादा खतरनाक हो सकता है।
डॉ. पारस अग्रवाल का मानना है कि यह हालिया रिसर्च आम जनता और विशेषकर मरीजों के लिए बेहद डराने वाली है। जब प्रदूषण के अति सूक्ष्म कण हमारे शरीर के अंदर प्रवेश करते हैं, तो वे कोशिकाओं के भीतर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को खतरनाक स्तर तक बढ़ा देते हैं। इस बढ़े हुए ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण शरीर का पहले से ही असंतुलित इंसुलिन रेजिस्टेंस और अधिक बिगड़ जाता है, जिसकी वजह से ब्लड शुगर का स्तर तेजी से ऊपर जा सकता है। यह गंभीर प्रदूषण शरीर में शुगर के स्तर को पूरी तरह अनियंत्रित कर सकता है। जो लोग पहले से डायबिटीज की बीमारी से पीड़ित होते हैं, उनके शरीर में वैसे ही हृदय रोगों का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में ज्यादा रहता है।
प्रदूषण के प्रभाव से डायबिटीज के मरीजों का खून धीरे-धीरे गाढ़ा होने लगता है, जो आगे चलकर अचानक बड़े हार्ट अटैक की मुख्य वजह बन सकता है। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक लगातार इस जहरीले प्रदूषण के बीच रहता है, तो इससे उसकी किडनी को अत्यंत गंभीर नुकसान पहुंच सकता है, और स्थिति बिगड़ने पर किडनी फेल होने तक का बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। इसके अलावा वायु प्रदूषण की वजह से सांस लेने में कठिनाई और अन्य श्वसन संबंधी परेशानियां होना तो आम बात है। इन सभी तथ्यों का कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकलता है कि जो लोग डायबेटिक हैं, उन्हें इस खतरनाक प्रदूषण से अपने आपको पूरी तरह बचाकर रखना चाहिए।
डॉ. पारस अग्रवाल ने डायबिटीज के मरीजों को सलाह देते हुए कहा है कि उन्हें जितना संभव हो सके, इस दूषित वातावरण से बचना चाहिए। सबसे पहले तो मरीजों को अपने संबंधित डॉक्टरों की सलाह के अनुसार निर्धारित दवाइयों के सेवन में किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए और दवाइयां कभी मिस नहीं करनी चाहिए। उन्हें अपने घर से बाहर निकलने की आवाजाही को न्यूनतम रखना चाहिए। यदि किसी जरूरी काम की वजह से बाहर जाना ही पड़े, तो शरीर को पूरी तरह ढकने वाले कपड़े पहनकर और चेहरे पर अच्छी गुणवत्ता वाला मास्क लगाकर ही घर से बाहर कदम रखें। अपने रोजमर्रा के व्यायाम और फिजिकल एक्टिविटी घर के भीतर ही करें।
यदि बाहर जाने की आवश्यकता महसूस हो भी, तो बेहतर होगा कि धूप निकलने के बाद यानी दोपहर के समय बाहर जाएं। अपने घर के अंदर हवा के आवागमन यानी वेंटिलेशन का विशेष ध्यान रखें। नियमित अंतराल पर अपने ब्लड शुगर की जांच करते रहें और अपने खान-पान पर कड़ा नियंत्रण रखें। डॉक्टर ने जिस प्रकार का डाइट चार्ट बताया है, ठीक उसी का सख्ती से पालन करें। मानसिक तनाव से हरसंभव दूरी बनाकर रहें। अगर आपकी आर्थिक स्थिति इसकी अनुमति देती है, तो अपने घर के भीतर अच्छी क्षमता वाले एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें। यदि संभव हो सके, तो जब तक आपके शहर में प्रदूषण का स्तर अत्यधिक खतरनाक श्रेणी में बना हुआ है, तब तक कुछ समय के लिए किसी दूसरे शहर या कम प्रदूषण वाले स्थान पर चले जाना ही समझदारी होगी।


















