सिनेमा जगत में कई ऐसे कलाकार और निर्देशक हैं जो लाइमलाइट से दूर रहकर भी वैश्विक स्तर पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। पार्थो सेन गुप्ता एक ऐसे ही फिल्मकार हैं जिन्होंने हिंदी सिनेमा को दुनिया भर में अलग पहचान और सम्मान दिलाया है। उनका जन्म 2 सितंबर 1965 को मुंबई में हुआ था। कला और निर्देशन के प्रति उनके गहरे लगाव ने उन्हें फ्रांस की राजधानी पेरिस पहुँचाया, जहाँ उन्होंने प्रसिद्ध फिल्म स्कूल ला फेमिस से फिल्म निर्देशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री पूरी की। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने देश लौटकर अपनी रचनात्मक यात्रा की नींव रखी।
शुरुआती संघर्ष और कला निर्देशन में सफर
पार्थो सेन गुप्ता ने अपने करियर की शुरुआत बेहद कम उम्र में की। महज 17 साल की आयु में उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में एक ट्रेनी के तौर पर कदम रखा। उन्होंने फीचर फिल्मों, टेलीविजन सीरियल्स और विज्ञापनों में ट्रेनी आर्ट डायरेक्टर और ट्रेनी प्रोडक्शन डिजाइनर के रूप में अपनी सेवाएं दीं। इस दौरान उन्हें सागर और मिस्टर इंडिया जैसी बड़ी बजट और लोकप्रिय फिल्मों में काम करने का अवसर मिला, जहाँ उन्होंने जाने-माने आर्ट डायरेक्टर बिजन दासगुप्ता के साथ काम किया। इस शुरुआती अनुभव ने उन्हें सेट डिजाइनिंग और विजुअल स्पेस की बारीकियों को समझने में बहुत मदद की।
पहली फिल्म और पहला बड़ा सम्मान
कुछ वर्षों तक ट्रेनी के रूप में काम करने के बाद वे सहायक कला निर्देशक के पद पर पहुँचे। साल 1988 में सुधीर मिश्रा द्वारा निर्देशित फिल्म मैं जिंदा हूं के जरिए उन्हें बतौर कला निर्देशक और प्रोडक्शन डिजाइनर स्वतंत्र रूप से काम करने का पहला मौका मिला। इसके बाद उन्होंने अपना खुद का डिजाइन स्टूडियो स्थापित किया और कई विज्ञापन फिल्मों तथा कलात्मक प्रोजेक्ट्स पर काम किया। इस दौर में तैयार किए गए उनके सेट और कला निर्देशन को इतनी सराहना मिली कि उन्हें साल 1989 में बेस्ट आर्ट डायरेक्टर के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
पार्थो सेन गुप्ता के निर्देशन का सफर उनकी पहली ही फीचर फिल्म के साथ ऐतिहासिक बन गया। हवा आने दे उनकी पहली फीचर फिल्म थी, जिसका भव्य प्रीमियर बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में किया गया था। इस फिल्म ने अपनी अनूठी कहानी और निर्देशन के दम पर डर्बन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म का खिताब जीता। इसके अलावा इस कृति को बीबीसी ऑडियंस अवॉर्ड के लिए भी काफी पहचान मिली, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी धाक जम गई।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सराहना और अन्य प्रोजेक्ट्स
उनकी दूसरी फीचर फिल्म सनराइज का प्रीमियर बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हुआ था। इस फिल्म को केवल एशिया तक सीमित नहीं रखा गया बल्कि ट्रिबेका, सिटजेस, बीएफआई लंदन और म्यूनिख जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक फिल्म फेस्टिवल्स में भी प्रदर्शित और सराहा गया। साल 2015 में इस फिल्म को डरबन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म और बेस्ट सिनेमैटोग्राफी के दो महत्वपूर्ण पुरस्कार मिले।
साल 2019 में उनकी तीसरी फीचर फिल्म स्लम आई, जिसकी शूटिंग विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया में की गई थी। इस फिल्म का ग्लोबल प्रीमियर टालिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल की आधिकारिक चयन प्रतियोगिता के तहत हुआ था। इसके अतिरिक्त इसे रॉटरडैम इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और बर्लिन को-प्रोडक्शन मार्केट के लिए भी चुना गया था। अपने लंबे और समृद्ध करियर के दौरान उन्होंने कई शॉर्ट फिल्मों और फीचर फिल्मों का निर्माण तथा निर्देशन किया है। अपनी कला यात्रा को आगे बढ़ाते हुए पार्थो सेन गुप्ता फिलहाल सिडनी में निवास कर रहे हैं और वैश्विक स्तर पर सिनेमा से जुड़े हुए हैं।
















