झारखंड के दुमका जिले से ताल्लुक रखने वाले प्रसिद्ध कवि, लेखक और गायक नीलोत्पल मृणाल ने लोक संगीत के क्षेत्र में एक अनूठा प्रयोग किया है। उन्होंने बच्चे के जन्म के अवसर पर गाए जाने वाले सदियों पुराने पारंपरिक सोहर गीत भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के को बिल्कुल नए और आधुनिक अंदाज में प्रस्तुत किया है। इस नई संगीतमय पेशकश के जरिए उन्होंने गांव की माटी की खुशबू और पारंपरिक धुनों को आज की नई पीढ़ी यानी जेन-जी की पसंद के साथ जोड़ने का सफल प्रयास किया है।
पवरिया शैली और पारंपरिक धुनों का अनूठा मेल
इस सोहर गीत की प्रस्तुति नीलोत्पल मृणाल ने पारंपरिक पवरिया गीत के अंदाज में की है। इसमें भोजपुरी लोक संस्कृति का मूल भाव पूरी तरह से सुरक्षित रखा गया है, जबकि इसके संगीत समायोजन में नए दौर की ऊर्जा साफ महसूस की जा सकती है। गीत में पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मधुर आवाज के साथ आधुनिक बीट्स और विजुअल टच का सुंदर समावेश किया गया है। यह गीत लोक कला की सहजता को बरकरार रखते हुए युवा श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम साबित हो रहा है।
लोक संस्कृति को सहेजने की अभिनव पहल
दुमका की माटी से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले नीलोत्पल मृणाल लंबे समय से लोक कला और साहित्यिक धरोहर को सहेजने के कार्य में जुटे हुए हैं। ग्रामीण आंगनों और पारिवारिक उत्सवों की पहचान रहे लोकगीतों को पुनर्जीवित करने की दिशा में उनकी यह पहल बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उनका मानना है कि अगर लोक धुनों को समकालीन प्रस्तुति के साथ सामने लाया जाए, तो वे आज भी हर वर्ग के श्रोताओं के दिलों में अपनी जगह बना सकती हैं।
परंपरा और आधुनिकता का नया संगम
गीत भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के यह दर्शाता है कि सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक रुझानों का मेल संगीत को एक नया जीवन दे सकता है। पुरानी परंपराओं को नए कलेवर में ढालने का यह प्रयोग यह सिद्ध करता है कि लोकगीत कभी पुराने नहीं होते। माटी की सौंधी महक जब आधुनिक संगीतमय बीट्स के साथ मिलती है, तो वह नई पीढ़ी के लिए भी उतनी ही सुरीली और प्रासंगिक बन जाती है।
























