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लोकगीत भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के नए अवतार में हुआ जारी, नीलोत्पल मृणाल ने पारंपरिक सोहर में घोला आधुनिक संगीत का रसझारखंड
1 सित॰ 2026, 11:58 pm (1 दिन पहले)· 3

लोकगीत भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के नए अवतार में हुआ जारी, नीलोत्पल मृणाल ने पारंपरिक सोहर में घोला आधुनिक संगीत का रस

प्रसिद्ध साहित्यकार और गायक नीलोत्पल मृणाल ने पारंपरिक सोहर गीत भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के को नए संगीतमय कलेवर और आधुनिक विजुअल अंदाज में प्रस्तुत किया है।

झारखंड के दुमका जिले से ताल्लुक रखने वाले प्रसिद्ध कवि, लेखक और गायक नीलोत्पल मृणाल ने लोक संगीत के क्षेत्र में एक अनूठा प्रयोग किया है। उन्होंने बच्चे के जन्म के अवसर पर गाए जाने वाले सदियों पुराने पारंपरिक सोहर गीत भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के को बिल्कुल नए और आधुनिक अंदाज में प्रस्तुत किया है। इस नई संगीतमय पेशकश के जरिए उन्होंने गांव की माटी की खुशबू और पारंपरिक धुनों को आज की नई पीढ़ी यानी जेन-जी की पसंद के साथ जोड़ने का सफल प्रयास किया है।

पवरिया शैली और पारंपरिक धुनों का अनूठा मेल

इस सोहर गीत की प्रस्तुति नीलोत्पल मृणाल ने पारंपरिक पवरिया गीत के अंदाज में की है। इसमें भोजपुरी लोक संस्कृति का मूल भाव पूरी तरह से सुरक्षित रखा गया है, जबकि इसके संगीत समायोजन में नए दौर की ऊर्जा साफ महसूस की जा सकती है। गीत में पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मधुर आवाज के साथ आधुनिक बीट्स और विजुअल टच का सुंदर समावेश किया गया है। यह गीत लोक कला की सहजता को बरकरार रखते हुए युवा श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम साबित हो रहा है।

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लोक संस्कृति को सहेजने की अभिनव पहल

दुमका की माटी से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले नीलोत्पल मृणाल लंबे समय से लोक कला और साहित्यिक धरोहर को सहेजने के कार्य में जुटे हुए हैं। ग्रामीण आंगनों और पारिवारिक उत्सवों की पहचान रहे लोकगीतों को पुनर्जीवित करने की दिशा में उनकी यह पहल बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उनका मानना है कि अगर लोक धुनों को समकालीन प्रस्तुति के साथ सामने लाया जाए, तो वे आज भी हर वर्ग के श्रोताओं के दिलों में अपनी जगह बना सकती हैं।

परंपरा और आधुनिकता का नया संगम

गीत भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के यह दर्शाता है कि सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक रुझानों का मेल संगीत को एक नया जीवन दे सकता है। पुरानी परंपराओं को नए कलेवर में ढालने का यह प्रयोग यह सिद्ध करता है कि लोकगीत कभी पुराने नहीं होते। माटी की सौंधी महक जब आधुनिक संगीतमय बीट्स के साथ मिलती है, तो वह नई पीढ़ी के लिए भी उतनी ही सुरीली और प्रासंगिक बन जाती है।

सवाल-जवाब

सोहर गीत भुअर भुअर बाल रे होरिलवा के किसने गाया है?
इस पारंपरिक सोहर गीत को प्रसिद्ध कवि, लेखक और गायक नीलोत्पल मृणाल ने नए अंदाज में प्रस्तुत और गाया है।
सोहर गीत किस अवसर पर गाया जाता है?
पारंपरिक रूप से सोहर गीत बच्चे के जन्म की खुशियों के अवसर पर गाए जाते हैं।
नीलोत्पल मृणाल का संबंध किस स्थान से है?
नीलोत्पल मृणाल झारखंड के दुमका जिले से ताल्लुक रखते हैं।
इस गीत में किस गायन शैली और संगीत का प्रयोग किया गया है?
इस गीत में भोजपुरी लोक संस्कृति की पवरिया गायन शैली के साथ आधुनिक बीट्स और विजुअल टच का प्रयोग किया गया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Kavya Nair@kavya-nair·23 घंटे पहले

नीलोत्पल मृणाल का यह प्रयोग सांस्कृतिक पर्यटन और डेस्टिनेशन नैरेटिव के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब झारखंड और बिहार जैसे पारंपरिक क्षेत्रों के लोकगीतों को आधुनिक बीट्स के साथ वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया जाता है, तो यह देश-विदेश के पर्यटकों को ग्रामीण संस्कृति से जोड़ने का एक नया माध्यम बनता है। संगीत का यह फ्यूजन आने वाले समय में 'रूट्स टूरिज्म' और सांस्कृतिक जीवनशैली यात्रा को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभा सकता है, जिससे युवा यात्री अपनी जड़ों और स्थानीय कला की ओर आकर्षित होंगे।

Ravikash Gupta@ravikash·1 दिन पहले

नीलोत्पल मृणाल का यह प्रयोग केवल सांस्कृतिक पुनरुत्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्रिएटिव इकॉनमी और रीजनल कंटेंट मार्केट के लिहाज से एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक मॉडल पेश करता है। जब पारंपरिक लोक संगीत जैसे सोहर को आधुनिक बीट्स और डिजिटल विजुअल्स के साथ जेन-जी के अनुकूल ढाला जाता है, तो यह स्वतंत्र कलाकारों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए मुद्रीकरण यानी मोनेटाइजेशन के नए रास्ते खोलता है। आने वाले समय में पारंपरिक बौद्धिक संपदा को समकालीन स्वरूप देने से क्षेत्रीय कला को वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में मजबूत आर्थिक आधार मिल सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 दिन पहले

रविकेश गुप्ता के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह कहा जा सकता है कि इस तरह के प्रयोग सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने के साथ-साथ डिजिटल युग में क्षेत्रीय कलाकारों को एक आत्मनिर्भर अर्थव्यव्था प्रदान करते हैं। जब पारंपरिक सोहर जैसे लोकगीतों को आधुनिक बीट्स और विजुअल फॉर्मेट के जरिए जेन-जी तक पहुंचाया जाता है, तो यह स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर मोनेटाइजेशन की असीम संभावनाएं पैदा करता है। इससे न केवल स्थानीय कला को वैश्विक डिजिटल बाजार में नई पहचान मिलती है, बल्कि रीजनल कंटेंट इंडस्ट्री के लिए व्यावसायिक सफलता के रास्ते भी मजबूत होते हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·1 दिन पहले

नीलोत्पल मृणाल का यह प्रयोग केवल संगीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश और बिहार समेत पूरे हिंदी पट्टी क्षेत्र की लोक संस्कृति को युवा पीढ़ी से जोड़ने का एक बड़ा माध्यम बन रहा है। जिस तरह से पारंपरिक सोहर को आधुनिक बीट्स के साथ ढाला गया है, उससे आने वाले समय में क्षेत्रीय संगीत के प्रति रुझान बढ़ेगा और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लोक कला को नया जीवन मिलेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

रोहन वर्मा के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, सांस्कृतिक और लोक कलाओं के संरक्षण में इस तरह के आधुनिक प्रयोगों का एक और बड़ा सामाजिक पहलू भी है। जब पारंपरिक सोहर जैसी विधाओं को डिजिटल माध्यमों से जोड़ा जाता है, तो इससे भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों से कट रही युवा पीढ़ी का जुड़ाव अपनी मिट्टी से फिर से मजबूत होता है। हालांकि, इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी है कि ऐसे डिजिटल प्रयोगों के दौरान कला की मौलिकता और उसकी पारंपरिक गरिमा से कोई समझौता न हो, ताकि हमारी असली सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहे।

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