फिल्म ‘सहिया’ की रिलीज का रास्ता सेंसर बोर्ड की आपत्तियों की वजह से लगातार उलझता जा रहा है। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने इस फिल्म को दूसरी बार सर्टिफिकेट जारी करने से इनकार कर दिया है। इस फैसले के बाद फिल्म के निर्माता और निर्देशक संजय शर्मा ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उनका कहना है कि बोर्ड की आपत्तियां पूरी तरह बेबुनियाद, अतार्किक और सिनेमाई अभिव्यक्ति के खिलाफ हैं। उन्होंने साफ तौर पर पूछा कि एक सीधी सादी प्रेम कहानी से देश की सुरक्षा व्यवस्था को किस तरह का खतरा पैदा हो सकता है।
मानवीय संवेदना और प्रेम पर आधारित कहानी
निर्देशक संजय शर्मा ने इस बात पर जोर दिया कि ‘सहिया’ किसी भी प्रकार के राजनीतिक एजेंडे या विचारधारा को आगे बढ़ाने का जरिया नहीं है। यह विशुद्ध रूप से प्रेम, मानवीय भावनाओं और संवेदनशीलता को दर्शाने वाला सिनेमा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कहानी में न तो नक्सलवाद की पैरवी की गई है और न ही किसी भी प्रकार के हिंसक समूह का गुणगान किया गया है। उनके मुताबिक, फिल्म का केंद्रीय संदेश ही हिंसा की निंदा करना और इंसानी जिंदगी के महत्व को रेखांकित करना है।
संजय शर्मा के अनुसार, वे दर्शकों के अनुभव को बनाए रखने के लिए कहानी के मोड़ या रहस्यों को पहले से सार्वजनिक नहीं करना चाहते। उनका उद्देश्य है कि लोग सिनेमाघरों में बैठकर इस जज्बाती प्रेम कहानी को खुद महसूस करें। उन्होंने कहा कि यह फिल्म हथियारों और खून-खराबे का कतई समर्थन नहीं करती, बल्कि यह साबित करती है कि प्रेम की ताकत हर तरह की नफरत से बड़ी होती है। निर्देशक ने निराशा जताते हुए सवाल किया कि जब उन्होंने दर्शकों को भावुक करने और सोचने पर मजबूर करने वाली मानवीय कहानी तैयार की है, तो उसमें बोर्ड को आपत्तिजनक क्या नजर आ रहा है।
प्रमाणन प्रक्रिया और आदेश में गड़बड़ी
इस पूरे मामले में प्रमाणन बोर्ड की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। फिल्म के लिए प्रमाण पत्र का औपचारिक आवेदन 30 मई 2026 को जमा किया गया था। लगभग दो महीने बाद, 20 जुलाई को एग्जामिनिंग कमेटी ने फिल्म की स्क्रीनिंग की। इसके बाद मामला आगे बढ़कर रिवाइजिंग कमेटी के पास पहुंचा, जहां 12 अगस्त को इस पर सुनवाई आयोजित की गई। आखिरकार 27 अगस्त को बोर्ड ने औपचारिक रूप से प्रमाण पत्र जारी करने से मना कर दिया।
निर्माता की तरफ से दिए गए कानूनी पक्ष में यह बात सामने आई कि बोर्ड के उस आदेश में किसी भी विशिष्ट दृश्य या संवाद का उल्लेख तक नहीं किया गया था जिसे हटाया जाना हो। इससे भी बड़ी लापरवाही यह रही कि सेंसर बोर्ड के आधिकारिक आदेश पत्र में फिल्म ‘सहिया’ का नाम तक गलत दर्ज कर दिया गया और उसे ‘साहित्य’ लिख दिया गया था।
अदालती दखल और नई आपत्तियों का दौर
सेंसर बोर्ड के इस अस्पष्ट और मनमाने रवैये के खिलाफ फिल्म निर्माता ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत में चली कानूनी प्रक्रिया के बाद, 27 अक्टूबर को रिवाइजिंग कमेटी ने एक बार फिर से फिल्म को देखा। लेकिन दोबारा देखने के बाद बोर्ड ने जो नई सिफारिशें रखीं, उनमें अस्वीकृति के आधार ही पूरी तरह बदल दिए गए।
निर्माता के अनुसार, अब बोर्ड ने फिल्म की मुख्य पटकथा, कुछ चुनिंदा संवादों, सुरक्षा बलों की छवि और आदिवासी महिलाओं से जुड़े दृश्यों को लेकर नए सिरे से आपत्तियां खड़ी कर दी हैं। इन लगातार बदलते रुख ने फिल्म के प्रदर्शन पर अनिश्चितता के बादल गहरा दिए हैं।



















