भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ गीत ऐसे होते हैं जो समय की सीमाओं को लांघकर अमर हो जाते हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध गीत वर्ष 1997 में बड़े पर्दे पर देखने को मिला था, जिसे 29 साल बीत जाने के बाद भी श्रोता उतने ही चाव से सुनते हैं। इस कालजयी रचना को गायिका कविता कृष्णमूर्ति ने अपनी सुरीली आवाज में रिकॉर्ड किया था, जबकि परदे पर इसे प्रसिद्ध अभिनेत्री माधुरी दीक्षित के भावपूर्ण अभिनय से सजाया गया था। संगीतकार राजेश रोशन ने इसकी धुन तैयार की थी और गीतकार इंदीवर ने इसके बोल रचे थे। सिनेमाई परदे पर आने से पहले भी इस रचना की अपनी एक बेहद समृद्ध और ऐतिहासिक विरासत रही है, जिसका संबंध पारंपरिक भक्ति धारा से गहरा जुड़ा हुआ माना जाता है।
सिनेमाई पृष्ठभूमि और कहानी का महत्वपूर्ण मोड़
यह अमर गीत अभिनेता शाहरुख खान और अभिनेत्री माधुरी दीक्षित की फिल्म कोयला का हिस्सा था। कहानी के क्रम में यह दृश्य तब आता है जब खलनायक अमरीश पुरी धोखे से माधुरी दीक्षित के किरदार के साथ शादी रचा लेता है। इस सदमे और पीड़ा के बीच फिल्माया गया गाना सांसों की माला पे सिमरूं मैं पी का नाम आज भी अपने आध्यात्मिक खिंचाव और विरह के दर्द की वजह से लोगों के दिलों में ताजा है। इस रचना के पीछे भक्ति मार्ग और सूफी रंगत की एक दिलचस्प पृष्ठभूमि जुड़ी हुई है, जो इसे केवल एक फिल्मी गाना न रखकर एक सांस्कृतिक धरोहर बनाती है।
रचना के स्रोत और भक्ति तथा सूफी संगम की कहानी
इस गीत के उद्गम को लेकर कई दृष्टिकोण मौजूद हैं। आम धारणा के तहत इसे लंबे समय से संत मीराबाई की भक्ति परंपरा से जोड़कर देखा जाता रहा है। इसके साथ ही इस रचना के शब्द तुफैल होशियारपुरी के कलाम से भी जुड़े बताए जाते हैं। आगे चलकर यह सूफी रचना और मीराबाई की अनन्य कृष्ण भक्ति का प्रतीक बनकर उभरी। शब्दों की इसी समृद्ध और दोहरी विरासत की वजह से संगीत के जानकारों के बीच यह रचना हमेशा चर्चा और शोध का विषय बनी रही है।
कपूर परिवार के विवाह समारोह में नुसरत फतेह अली खान की प्रस्तुति
फिल्म कोयला के निर्माण से दशकों पहले भी सांसों की माला संगीत प्रेमियों के बीच अपनी खास पहचान रखता था। महान कव्वाल नुसरत फतेह अली खान ने अपने अनोखे और जादुई अंदाज में इसे प्रस्तुत कर दुनिया भर में मशहूर कर दिया था। वर्ष 1979 में जब नुसरत फतेह अली खान पहली बार भारत दौरे पर आए थे, तब उन्होंने अभिनेता ऋषि कपूर और अभिनेत्री नीतू कपूर के विवाह समारोह में इस गीत की महफिल सजाई थी। इस शानदार प्रस्तुति के बाद यह कलाम नुसरत फतेह अली खान की गायकी का पर्याय बन गया था और उनकी महफिलों की सबसे बड़ी पहचान माना जाने लगा।
सिनेमाई असफलता के बाद भी कालजयी बना संगीत
राकेश रोशन के निर्देशन में बनी फिल्म कोयला 18 अप्रैल 1997 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी। बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के लिहाज से यह फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही और फ्लॉप साबित हुई। इसके बावजूद, कविता कृष्णमूर्ति का गाया यह गीत संगीत प्रेमियों के बीच जबरदस्त हिट रहा। नब्बे के दशक के उस दौर में इस पारंपरिक सूफी और भक्ति रंगत को बॉलीवुड के ऑर्केस्ट्रा के साथ ढालने का प्रयोग बेहद पसंद किया गया था। आज लगभग तीन दशक बाद भी यह रचना एक कल्ट क्लासिक गीत के रूप में पूरे सम्मान के साथ सुनी और याद की जाती है।


















