भारतीय सस्पेंस सिनेमा के इतिहास में कुछ किरदार ऐसे दर्ज हो जाते हैं, जिनकी मौजूदगी स्क्रीन पर भले ही सीमित पलों की हो, मगर उनका साया पूरी दास्तान पर वर्षों तक मंडराता रहता है। साल 2015 में बड़े पर्दे पर पेश किए गए सनसनीखेज हत्याकांड के केंद्र में एक ऐसा ही किरदार था, जिसका नाम समीर देशमुख उर्फ सैम रखा गया था। पर्दे पर इस लड़के के अचानक गायब होने और फिर रहस्यमयी मौत ने विजय सालगांवकर तथा उनके पूरे कुनबे को कानूनी चक्रव्यूह में उलझा दिया था। वह दास्तान करीब 11 सालों तक दर्शकों के जेहन में कौतूहल पैदा करती रही और हाल ही में 'दृश्यम: द कन्क्लूजन' के साथ उस लंबे अध्याय का मुकम्मल समापन हुआ। इस पूरे ताने-बाने को अपनी खलनायकी और दुस्साहस से शुरू करने वाले कलाकार ऋषभ चड्ढा अब सिनेमाई चकाचौंध से दूर एक बिल्कुल नए रास्ते पर कदम बढ़ा चुके हैं।
थ्रिलर का वह निर्णायक मोड़ जिसने खड़ा किया कानूनी बवंडर
समीर देशमुख का किरदार कोई साधारण नौजवान नहीं था, बल्कि वह गोवा के एक रसूखदार और ताकतवर घराने का बिगड़ा हुआ लड़का था। उसकी मां पुलिस विभाग की शीर्ष अधिकारी थीं और पिता एक नामी हस्ती, जिनका रोल रजत कपूर और तब्बू ने अदा किया था। इसी घमंड में चूर होकर वह कॉलेज की एक सैरगाह के दौरान विजय की बड़ी बेटी अंजू और अन्य युवतियों के साथ बदतमीजी पर उतर आया था। बात सिर्फ फब्तियां कसने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने अंजू का एक आपत्तिजनक वीडियो छिपकर रिकॉर्ड कर लिया। उस क्लिप के सहारे ब्लैकमेल करते हुए वह आधी रात को सालगांवकर परिवार के आंगन तक जा पहुंचा, जहां उसने सारी सीमाएं लांघ दीं।
उसी खींचातानी और हाथापाई के दौरान अंजू के हाथों अनजाने में उसके सिर पर घातक चोट लग गई, जिससे मौके पर ही उसकी सांसें थम गईं। इसके बाद परिवार के मुखिया विजय ने अपने परिजनों को सलाखों के पीछे जाने से बचाने के लिए 2 और 3 अक्टूबर के झूठे बयानों, टिकटों और बिलों का ऐसा अभेद्य जाल बुना जिसे पुलिस महकमा वर्षों तक सुलझाने में नाकाम रहा। खाकी वर्दीधारी बार-बार सालगांवकर परिवार पर शिकंजा कसने की कोशिश करते रहे, मगर लाश की गैरमौजूदगी ने इस केस को सिनेमाई इतिहास का सबसे बड़ा अनसुलझा पहेली बना दिया।
मलयालम की मूल कहानी से हिंदी स्क्रीन तक का सफर
यह कहानी दरअसल मलयालम फिल्मकार जीतू जोसेफ की मौलिक रचना का आधिकारिक हिंदी रूपांतरण थी। मूल मलयालम फिल्म में दिग्गज अभिनेता मोहनलाल ने मुख्य भूमिका निभाई थी, जबकि वहां इस मारे गए लड़के का नाम वरुण प्रभाकर था और उस रोल को रोशन बशीर ने निभाया था। जब इस कहानी को हिंदी में रीमेक किया गया, तब ऋषभ चड्ढा ने सैम के किरदार में अपनी खास छाप छोड़ी। उनका सख्त रवैया, चेहरे की बेपरवाही और आंखों की ढिठाई ने इस किरदार को दर्शकों के मन में हमेशा के लिए नफरत और कौतूहल का प्रतीक बना दिया।
स्क्रीन पर बहुत कम वक्त मिलने के बावजूद यह किरदार पूरी फ्रेंचाइजी का सबसे ताकतवर धुरी साबित हुआ। विजय की हर चाल, हर झूठ, पुलिस की हर पूछताछ और परिवार का हर डर सीधे-सीधे सैम की उस रात हुई मौत से ही बंधा हुआ था।
बाल कलाकार से लेकर वेब सीरीज तक लंबा सफर
ऋषभ चड्ढा के लिए यह सफलता रातोंरात नहीं आई थी। मुंबई की आबोहवा में पले-बढ़े इस कलाकार ने साल 2007 के आसपास ही कैमरे के सामने अपनी पारी शुरू कर दी थी। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत में बतौर बाल कलाकार और किशोर अभिनेता कई विज्ञापनों, धारावाहिकों और फिल्मों में अपनी प्रतिभा दिखाई। इस बड़ी थ्रिलर में नजर आने से पहले वह सोनम कपूर और फवाद खान के साथ रोमांटिक कॉमेडी 'खूबसूरत' में भी एक किरदार निभा चुके थे।
टेलीविजन की दुनिया में भी उन्होंने बच्चों और युवाओं के लोकप्रिय शोज में लगातार काम किया। डिज्नी के मशहूर सिटकॉम 'द सुइट लाइफ ऑफ करण एंड कबीर' और 'बेस्ट ऑफ लक निक्की' में उनके निभाए किरदारों को खूब पसंद किया गया। इसके बाद वह कॉमेडी धारावाहिक 'आदत से मजबूर' में भी नजर आए। साल 2018 में उन्होंने रहस्यमयी और डरावनी फिल्म 'लुप्त' में काम किया। समय के साथ जब मनोरंजन का दायरा डिजिटल प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ा, तब उन्होंने वेब सीरीज 'डिवोर्स के लिए कुछ भी करेगा' में मुख्य किरदार निभाकर अपनी अदाकारी की एक अलग परत दर्शकों के सामने पेश की।
बॉलीवुड से ब्रेक लेकर लाइव स्टेज पर बनाई नई दुनिया
बीते करीब दो सालों से ऋषभ चड्ढा ने फिल्मी पर्दे और धारावाहिकों से पूरी तरह किनारा कर रखा है। इस दौरान उन्होंने किसी नए अभिनय प्रोजेक्ट के लिए कोई अनुबंध साइन नहीं किया और हिंदी सिनेमा की आपाधापी से एक सोची-समझी दूरी बना ली। हालांकि, रचनात्मकता के प्रति उनका लगाव जरा भी कम नहीं हुआ है। कैमरे की जगह अब उन्होंने सीधे दर्शकों के रूबरू होने का मंच चुना है।
वर्तमान में वह लाइव दर्शकों के सामने किस्सागोई और शायरी पेश करने में पूरी शिद्दत से जुटे हैं। उनका विशेष एकल मंच प्रस्तुतिकरण 'मॉडर्न मजनू' के नाम से विभिन्न शहरों में आयोजित किया जा रहा है। इस शो के माध्यम से वह अपनी लिखी नज्में, गजलें और रोजमर्रा के अहसासों से जुड़ी कहानियां लोगों को सुनाते हैं। दर्शक अलग-अलग तारीखों पर होने वाले इन आयोजनों के लिए डिजिटल माध्यमों से टिकट खरीदकर उनके फन का आनंद ले रहे हैं। कैमरे के लेंस के पीछे छिपने के बजाय सीधे लोगों की आंखों में झांककर अपनी दास्तान बयां करने का यह अंदाज उन्हें एक बिल्कुल नए मुकाम पर ले जा रहा है।



















