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ट्रेन के सफर में मिली शकील बदायूंनी की शायरी, बेगम अख्तर ने यूं अमर कर दी अपनी सदाबहार गजलबॉलीवुड
6 अक्तू॰ 2026, 10:28 pm (3 घंटे पहले)· 0

ट्रेन के सफर में मिली शकील बदायूंनी की शायरी, बेगम अख्तर ने यूं अमर कर दी अपनी सदाबहार गजल

मुंबई से लखनऊ जाते हुए भोपाल के करीब बेगम अख्तर ने शकील बदायूंनी की शायरी को धुन में पिरोया था, जिसने गजल की दुनिया में इतिहास रच दिया।

हिंदुस्तानी शास्त्रीय और सुगम संगीत की महफिलों में जब बेगम अख्तर अपनी रूहानी आवाज में तान छेड़ती थीं, तो सुनने वाले सिर्फ श्रोता नहीं रह जाते थे, बल्कि हर लफ्ज के दर्द को अपने सीने में महसूस करने लगते थे। उनकी सबसे लोकप्रिय गजल 'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया' आज भी गजल प्रेमियों के जेहन में उतनी ही शिद्दत से बसी हुई है। इस अमर गजल की पैदाइश किसी सजे-धजे रिकॉर्डिंग स्टूडियो में नहीं हुई थी, बल्कि यह सफर के दौरान ट्रेन के एक डिब्बे में रची गई थी, जब एक शायर ने रास्ते में अपनी रचना का पर्चा बेगम अख्तर को सौंपा था।

फैजाबाद से गजल साम्राज्ञी बनने का सफर

बेगम अख्तर का जन्म 7 अक्टूबर 1914 को फैजाबाद में हुआ था। दुनिया उन्हें बाद में बेगम अख्तर के नाम से जानने लगी, लेकिन उनका शुरुआती नाम अख्तरी बाई फैजाबादी था। बचपन के दिनों से ही उनके भीतर सुरों के प्रति गहरा लगाव था। बहुत छोटी उम्र में उन्होंने शास्त्रीय गायन की विधिवत तालीम हासिल करनी शुरू कर दी थी। रियाज और कुदरती प्रतिभा के दम पर उनकी आवाज की पहचान तेजी से संगीत जगत में बनने लगी। महज 14 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार सार्वजनिक मंच पर अपनी गायकी का प्रदर्शन किया और श्रोताओं को चकित कर दिया था। आगे चलकर यही आवाज ठुमरी, दादरा और गजल गायकी का सबसे बड़ा पर्याय बन गई।

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जिंदगी के उतार-चढ़ाव और संगीत में वापसी

उनकी गायकी का सबसे बड़ा हुनर यह था कि वह शायरी को केवल सुरों में नहीं ढालती थीं, बल्कि हर शेर के भाव को पहले खुद गहराई से महसूस करती थीं। वह शब्दों का चयन बहुत संजीदगी से करती थीं, क्योंकि उनका मानना था कि जब तक कोई रचना गायक के खुद के दिल को नहीं छूती, तब तक वह महफिल में बैठे लोगों के दिलों तक कभी नहीं उतर सकती। उनकी निजी जिंदगी भी आसान नहीं रही और कई व्यक्तिगत आघातों ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था। साल 1945 में उन्होंने बैरिस्टर इश्तियाक अहमद अब्बासी से निकाह किया। इसके बाद अपनी मां के इंतकाल के गहरे सदमे में आकर वह पूरी तरह टूट गईं और कुछ वक्त के लिए उन्होंने गाने से पूरी तरह दूरी बना ली थी। बाद में उनके शौहर के समझाने और हौसला अफजाई करने पर उन्होंने संगीत के मंच पर दोबारा कदम रखा। इस वापसी के बाद उनकी आवाज में दर्द, ठहराव और रूहानियत पहले से भी ज्यादा गहरा असर छोड़ने लगी।

ट्रेन का सफर और भोपाल के पास तैयार हुई धुन

'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया' की रचना का किस्सा भी बेहद दिलचस्प है। एक बार जब बेगम अख्तर मुंबई से वापस लखनऊ लौट रही थीं, तब रास्ते में उनसे एक शायर की मुलाकात हुई। उस शायर ने अदब के साथ दरख्वास्त की कि बेगम साहिबा उनकी लिखी पंक्तियों को अपनी आवाज बख्शें। शायर ने अपनी शायरी एक सादे कागज के टुकड़े पर लिखकर बेगम अख्तर के हाथ में थमा दी। उस वक्त उन्होंने उस कागज को बहुत सलीके से संभालकर अपने पर्स में रख लिया। रेलगाड़ी अपनी मंजिल की ओर बढ़ती रही और जब वह भोपाल के आसपास पहुंची, तो सफर के सन्नाटे में बेगम अख्तर को अचानक उस कागज की याद आई। उन्होंने अपना हारमोनियम निकाला और उन अल्फाजों को सुरों की चाशनी में घोलने लगीं। ट्रेन के सफर में ही सुर और ताल की ऐसी जुगलबंदी बैठी कि एक ऐसी सदाबहार रचना तैयार हो गई, जो आज भी संगीत रसिकों की आंखों को नम कर देती है।

शकील बदायूंनी के लफ्ज और नाना पाटेकर का संस्मरण

इस गजल के मख्ते में शायर का तखल्लुस 'शकील' आता है, जो दरअसल जाने-माने शायर शकील बदायूंनी थे। शकील बदायूंनी के लिखे कलाम को बेगम अख्तर के सुरों ने हमेशा के लिए अमर कर दिया। फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर ने एक बार बेगम अख्तर से जुड़ा एक यादगार किस्सा साझा किया था। उन्होंने बताया कि एक जलसे में जब बेगम अख्तर ने अपनी गजल की आखिरी तान पूरी की, तो हाल में सन्नाटा पसर गया और किसी ने ताली नहीं बजाई। अमूमन उनकी प्रस्तुति खत्म होते ही महफिल में जोरदार तालियों की गूंज हुआ करती थी, लेकिन उस दिन श्रोता मानो किसी गहरे ध्यान में डूब गए थे। जब किसी ने उनसे इस पर सवाल किया, तो बेगम अख्तर ने बेहद सादगी भरी मुस्कान के साथ जवाब दिया कि एक फनकार इसी सन्नाटे के लिए जीता है, क्योंकि सुनने वाला यह भी भूल गया कि उसे तालियां बजानी थीं। 30 अक्टूबर 1974 को बेगम अख्तर इस फानी दुनिया को अलविदा कह गईं, मगर उनकी आवाज का जादू आज भी महफिलों में उसी तरह जिंदा है।

सवाल-जवाब

बेगम अख्तर का जन्म कब और कहां हुआ था?
बेगम अख्तर का जन्म 7 अक्टूबर 1914 को फैजाबाद में हुआ था और उनका असली नाम अख्तरी बाई फैजाबादी था।
'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया' गजल की धुन कहां तैयार की गई थी?
यह धुन मुंबई से लखनऊ लौटते समय ट्रेन के सफर के दौरान भोपाल के पास हारमोनियम पर तैयार की गई थी।
इस प्रसिद्ध गजल के मूल रचनाकार कौन थे?
इस गजल के रचनाकार मशहूर शायर शकील बदायूंनी थे, जिनका तखल्लुस गजल के अंत में आता है।
बेगम अख्तर ने गायकी की शुरुआत किस उम्र में की थी?
उन्होंने महज 14 साल की उम्र में सार्वजनिक रूप से मंच पर गायकी की शुरुआत कर अपनी पहचान बनाई थी।
बेगम अख्तर का निकाह किससे और कब हुआ था?
बेगम अख्तर का निकाह साल 1945 में बैरिस्टर इश्तियाक अहमद अब्बासी से हुआ था।
नाना पाटेकर ने बेगम अख्तर के बारे में कौन सा संस्मरण बताया था?
नाना पाटेकर ने बताया कि एक महफिल में गजल खत्म होने पर तालियों की जगह सन्नाटा छा गया था, जिस पर बेगम अख्तर ने कहा था कि एक कलाकार इसी सन्नाटे के लिए जीता है।
बेगम अख्तर का निधन कब हुआ था?
बेगम अख्तर का निधन 30 अक्टूबर 1974 को हुआ था।
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