हिंदी और मराठी सिनेमा को कई यादगार फिल्में देने वाले निशिकांत कामत एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने निर्देशन, लेखन और अभिनय, तीनों मोर्चों पर अपनी छाप छोड़ी। ‘दृश्यम’, ‘मदारी’, ‘मुंबई मेरी जान’ और ‘फोर्स’ जैसी फिल्मों के साथ उन्होंने दर्शकों के बीच एक भरोसेमंद नाम बना लिया था। उनकी कहानियों की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि वे मनोरंजन के पर्दे के पीछे समाज की हकीकत और आम इंसान की उलझनों को भी सामने रख देती थीं। फिर भी उनके करियर में एक ख्वाहिश आखिर तक अधूरी रही, और वह थी अमिताभ बच्चन को अपने कैमरे के सामने निर्देशित करने की।
दादर के एक फिल्मी दीवाने का सफर
निशिकांत कामत का जन्म 17 जून 1970 को महाराष्ट्र के दादर में हुआ। फिल्मों से उनका लगाव बचपन से ही गहरा था और अमिताभ बच्चन तो जैसे उनके लिए सिनेमा की परिभाषा बन गए थे। बिग बी की लगभग हर फिल्म वह बड़ी शिद्दत से देखते थे। स्कूल और कॉलेज के दिनों में उनका झुकाव रंगमंच की ओर हुआ। मजेदार बात यह रही कि एक दिन वह सिर्फ एक नाटक की रिहर्सल देखने गए थे, मगर उसी मौके पर उन्हें मंच पर अभिनय करने का अवसर मिल गया। बस यहीं से उनका थिएटर का सफर शुरू हुआ और जो शुरुआत में महज शौक था, वह आगे चलकर उनका जुनून बन गया।
22 की उम्र में एडिटर, 24 में निर्देशक
रंगमंच पर काम करते हुए धीरे-धीरे उनकी रुचि फिल्म बनाने की प्रक्रिया में बढ़ने लगी। पेशेवर सफर की शुरुआत उन्होंने दूरदर्शन के एक मराठी धारावाहिक में सहायक के रूप में की। इसी दौर में उन्होंने एडिटिंग का हुनर सीखा और सिर्फ 22 साल की उम्र में बतौर एडिटर पहचान बना ली। कुछ साल संपादन की मेज पर बिताने के बाद 24 साल की उम्र में उन्हें पहली बार निर्देशन की कमान संभालने का मौका मिला। बाद में उन्होंने टेलीविजन की दुनिया को अलविदा कहकर लेखन की राह पकड़ी और कई वर्षों तक स्क्रिप्ट लिखने में लगे रहे।
‘डोम्बीवली फास्ट’ और राष्ट्रीय पुरस्कार
साल 2005 उनके लिए निर्णायक साबित हुआ, जब उन्होंने मराठी फिल्म ‘डोम्बीवली फास्ट’ का निर्देशन किया। यह फिल्म जबरदस्त हिट रही और इसे राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा गया। इस कामयाबी ने उन्हें मराठी सिनेमा के सबसे चर्चित निर्देशकों की कतार में ला खड़ा किया। मराठी फिल्मों में नाम कमाने के बाद उन्होंने हिंदी सिनेमा का रुख किया। साल 2008 में आई ‘मुंबई मेरी जान’ ने 2006 के मुंबई ट्रेन ब्लास्ट के बाद आम लोगों की जिंदगी पर पड़े गहरे असर को बेहद संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारा। इसके बाद ‘फोर्स’, ‘दृश्यम’, ‘रॉकी हैंडसम’ और ‘मदारी’ जैसी फिल्मों की कमान उन्होंने संभाली। इन सबमें ‘दृश्यम’ ने उन्हें पूरे देश में एक नई पहचान दी और यह उनके करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में गिनी जाने लगी।
कैमरे के पीछे ही नहीं, पर्दे पर भी छाए
निशिकांत कामत सिर्फ एक माहिर निर्देशक नहीं थे, अभिनय में भी उनका हाथ खूब चलता था। उन्होंने ‘404’, ‘रॉकी हैंडसम’, ‘डैडी’, ‘जूली 2’ और ‘भावेश जोशी’ जैसी फिल्मों में किरदार निभाए। ‘रॉकी हैंडसम’ में उनके निभाए खलनायक को दर्शकों ने खासा पसंद किया। इतना नाम और इतनी सफलता बटोरने के बावजूद उनके मन में एक अरमान हमेशा सुलगता रहा। वह अमिताभ बच्चन को अपनी फिल्म में निर्देशित करना चाहते थे, उसी कलाकार को जिनकी फिल्में देखते हुए उन्होंने सिनेमा की बारीकियां समझी थीं। मगर यह सपना हकीकत में कभी नहीं बदल पाया। लंबे समय तक लिवर की बीमारी से जूझने के बाद 17 अगस्त 2020 को निशिकांत कामत ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। महज 50 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। हालांकि उनकी फिल्में और उनका काम आज भी उन्हें दर्शकों के दिलों में जिंदा रखे हुए हैं।













