भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी आती हैं जो न केवल दर्शकों का दिल जीतती हैं, बल्कि बॉक्स ऑफिस के बने-बनाए ढर्रे को भी पूरी तरह बदल देती हैं। वर्ष 2012 में रिलीज हुई सस्पेंस थ्रिलर फिल्म 'कहानी' एक ऐसा ही शानदार उदाहरण साबित हुई। उस दौर में जब 100 करोड़ रुपये का कलेक्शन करने के लिए बड़े मेल एक्टर्स या खान सुपरस्टार्स का होना जरूरी समझा जाता था, तब इस फिल्म ने बिना किसी पारंपरिक मेल लीड के सफलता का एक नया इतिहास लिख दिया। महज 8 करोड़ रुपये के सीमित बजट में तैयार हुई इस महिला केंद्रित फिल्म ने पूरी दुनिया में 104 करोड़ रुपये से ज्यादा का ग्रॉस कलेक्शन करके ट्रेड एनालिस्ट्स को हैरान कर दिया था।
कोलकाता शहर बना कहानी का अहम किरदार
फिल्म 'कहानी' की सबसे बड़ी खासियत इसका बैकग्राउंड और स्क्रीनप्ले था। निर्देशक सुजॉय घोष ने पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर को सिर्फ एक शूटिंग लोकेशन के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि उसे पूरी कहानी में एक जिंदा किरदार की तरह पिरोया। फिल्म का मुख्य ताना-बाना एक गर्भवती महिला विद्या बागची के इर्द-गिर्द बुना गया था, जो अपने लापता पति अर्नब बागची को ढूंढने के लिए अकेले लंदन से कोलकाता पहुंचती है। दुर्गा पूजा के पावन त्यौहार के दौरान कोलकाता की तंग और पुरानी गलियों, पीली टैक्सियों, भीड़भाड़ वाले पुलिस स्टेशनों और ऐतिहासिक इमारतों के बीच भटकती एक बेबस महिला की तलाश ने दर्शकों को शुरुआत से ही बांधकर रखा। शहर की सांस्कृतिक झलक और रहस्यमयी माहौल ने सस्पेंस को कई गुना बढ़ा दिया था।
सुपरस्टार संस्कृति को चुनौती और मुख्य कलाकारों की भूमिका
2010 के दशक की शुरुआती वर्षों में हिंदी फिल्म उद्योग में यह धारणा बहुत गहरी थी कि 100 करोड़ रुपये के क्लब में प्रवेश पाने के लिए किसी नामचीन एक्शन हीरो या बड़े स्टार की मौजूदगी अनिवार्य है। हालांकि, विद्या बालन ने अपनी अद्भुत अभिनय क्षमता से इस स्थापित सोच को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। उन्होंने बिना किसी बड़े पुरुष स्टार के सहारे पूरी फिल्म का भार अकेले अपने मजबूत कंधों पर उठाया। फिल्म में उन्हें परमब्रत चटर्जी का साथ मिला, जिन्होंने एक पुलिस अधिकारी राणा का किरदार बहुत सादगी और संवेदनशीलता के साथ निभाया। वहीं नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने आईबी अफसर खान की सख्त और रोबदार भूमिका निभाकर फिल्म के थ्रिल और सस्पेंस में चार चांद लगा दिए।
सहायक पात्रों का असरदार अभिनय और बॉब बिस्वास का खौफ
'कहानी' की अपार सफलता में इसके सहायक कलाकारों का योगदान भी बेहद महत्वपूर्ण रहा। फिल्म में एलआईसी एजेंट और कांट्रैक्ट किलर 'बॉब बिस्वास' की भूमिका में नजर आए अभिनेता शाश्वत चटर्जी के अभिनय ने हर किसी को चौंका दिया। चेहरे पर एक मासूम लेकिन ठंडी और डरावनी मुस्कान लिए लोगों की हत्या करने वाले बॉब बिस्वास के किरदार ने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए थे। उनका यह छोटा सा रोल भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित और यादगार खलनायकों में शुमार हो गया। इसी तरह नवाजुद्दीन सिद्दीकी के सख्त और बेबाक रवैये ने पुलिस जांच और खुफिया एजेंसी के बीच के तनाव को पर्दे पर बहुत ही जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।
सिंदूर खेल का ऐतिहासिक क्लाइमैक्स और माउथ पब्लिसिटी
इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी और जान इसका आखिरी 15 मिनट का क्लाइमैक्स था। सुजॉय घोष ने फिल्म के अंत में एक ऐसा अप्रत्याशित ट्विस्ट दिया, जिसकी उम्मीद सिनेमाघर में बैठा कोई भी दर्शक नहीं कर रहा था। दुर्गा पूजा के अवसर पर महिलाओं द्वारा खेले जाने वाले सिंदूर खेल के बीच विद्या बागची की असली पहचान का खुलासा और उनका मास्टर प्लान दर्शकों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव बन गया। इस चौंकाने वाले क्लाइमैक्स की वजह से सिनेमाघरों से बाहर निकले दर्शकों ने जमकर इसकी तारीफ की। इस जबरदस्त माउथ पब्लिसिटी का असर यह हुआ कि शुरुआती धीमी शुरुआत के बाद कई हफ्तों तक देश भर के सिनेमाघरों के बाहर 'हाउसफुल' के बोर्ड लटके रहे।
कम बजट में 104 करोड़ का कलेक्शन और दीर्घकालिक प्रभाव
अगर आर्थिक आंकड़ों पर नजर डालें तो 'कहानी' का कुल प्रोडक्शन और प्रमोशन बजट मात्र 8 करोड़ रुपये के आसपास था। रिलीज के पहले दिन भले ही टिकट खिड़की पर रफ्तार थोड़ी धीमी रही, लेकिन दर्शकों से मिले शानदार रिस्पॉन्स और सकारात्मक समीक्षाओं के दम पर इसकी कमाई का ग्राफ लगातार बढ़ता चला गया। फिल्म ने अकेले भारत में 75 करोड़ रुपये से अधिक का बिजनेस किया, जबकि विदेशी बाजारों से हुई कमाई को मिलाकर इसका कुल वर्ल्डवाइड कलेक्शन 104 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच गया। रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट यानी निवेश पर रिटर्न के मामले में यह उस साल की सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली फिल्म बनी और इसे 'ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर' का दर्जा दिया गया। आज 14 साल बीत जाने के बाद भी, महिला केंद्रित सिनेमा और कंटेंट आधारित फिल्मों के लिए यह एक मिसाल बनी हुई है।



















