दक्षिण कोरियाई सीमा पर उत्तर कोरिया की हलचल, तोपों की तैनाती से बढ़ा तनावरणबीर कपूर की 'रामायण' के खौफ से टली अंशुमान झा की 'लकड़बग्घा 2', जानिए अब कब आएगी फिल्मसावन पुत्रदा एकादशी 5 अगस्त को, संतान प्राप्ति के लिए इस शुभ योग में करें पूजामैक्सिकन पेसो में हालिया तेज गिरावट अब सीमित रहने के आसार, कमर्जबैंक का आकलनफर्रुखाबाद के इस प्राचीन शिव मंदिर में एक साथ होते हैं बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन, महाभारत काल से जुड़ा है गहरा इतिहासअमेरिकी डॉलर के मुकाबले मेक्सिको का पेसो फिसला, 18.60 का स्तर पार करने के बाद कैरी ट्रेड का आकर्षण घटापुणे प्लांट में बनने लगी लैंड रोवर डिफेंडर, कीमतों में 34 लाख रुपये तक की भारी कटौतीसावन में बेलपत्र चढ़ाने का सही नियम क्या है, एक गलती से बेकार हो सकती है पूजाचक्रवाती तूफान अर्नब की आहट से सहमा रेल यातायात, 6 राज्यों में दर्जनों एक्सप्रेस व पैसेंजर ट्रेनें रद्दआर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्टॉक्स में गिरावट और एंथ्रोपिक के आईपीओ से बिटकॉइन पर गहराया दबाव
आईडीबीआई बैंक हिस्सेदारी बिक्री पर वित्त मंत्रालय ने साफ की कानूनी स्थिति, बताया क्यों वैध है विनिवेशव्यापार
18 अक्तू॰ 2026, 2:33 am (10 दिन पहले)· 1

आईडीबीआई बैंक हिस्सेदारी बिक्री पर वित्त मंत्रालय ने साफ की कानूनी स्थिति, बताया क्यों वैध है विनिवेश

वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि आईडीबीआई बैंक में सरकारी हिस्सेदारी कम करने पर कोई वैधानिक रोक नहीं है और 2003 के संसदीय बयानों से सरकार बंधी हुई नहीं है।

आईडीबीआई बैंक में सरकारी इक्विटी घटाने को लेकर हाल के दिनों में उपजी चर्चाओं के बीच केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय ने पूरी कानूनी और ऐतिहासिक स्थिति स्पष्ट कर दी है। मंत्रालय ने उन सभी धारणाओं को सिरे से खारिज किया है जिनमें दावा किया जा रहा था कि वर्ष 2003 के विधायी घटनाक्रम या संसद में हुई चर्चाएं सरकार को बैंक में अपनी हिस्सेदारी बेचने से रोकती हैं। सरकार ने साफ किया है कि मौजूदा कानून में हिस्सेदारी कम करने या निजीकरण पर किसी भी तरह का कानूनी प्रतिबंध नहीं है, और इस विषय पर पहले ही न्यायिक मुहर लग चुकी है।

संसदीय बहसों और 2003 के निरसन अधिनियम की स्थिति

वित्त मंत्रालय के अनुसार, मीडिया के कुछ हलकों में वर्ष 2003 के दौरान संसद में रखे गए विचारों का हवाला देकर यह दावा किया जा रहा था कि सरकार आईडीबीआई में अपनी हिस्सेदारी नहीं घटा सकती। इस पर स्पष्टीकरण देते हुए मंत्रालय ने रेखांकित किया कि केंद्रीय बजट 2003 पर चर्चा और आईडीबीआई (निरसन) अधिनियम, 2003 के निर्माण के दौरान एक संशोधन पेश करने का प्रयास हुआ था। उस प्रस्तावित संशोधन का मुख्य उद्देश्य सरकारी हिस्सेदारी को नीचे जाने से रोकना था। हालांकि, गहन विचार-विमर्श के बाद संसद ने उस संशोधन को पूरी तरह खारिज कर दिया था। संसद द्वारा पारित अंतिम अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान शामिल नहीं किया गया, जिससे यह साफ होता है कि विधायिका का इरादा सरकार के हाथों को बांधने का बिल्कुल नहीं था।

ये भी पढ़ें

दिल्ली उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय और वचनबद्धता का सिद्धांत

इस पूरे मामले की वैधानिक स्थिति पहले ही अदालत की कसौटी पर परखी जा चुकी है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 'ऑल इंडिया आईडीबीआई ऑफिसर्स एसोसिएशन बनाम भारत संघ व अन्य' के मामले में 17 दिसंबर 2018 को अपना अंतिम फैसला सुनाया था। अदालत ने एसोसिएशन की रिट याचिका खारिज करते हुए साफ किया था कि संसद में दशकों पहले दिए गए बयानों के दम पर सरकार को आईडीबीआई लिमिटेड में अपनी इक्विटी कम करने से रोका नहीं जा सकता।

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले के पैराग्राफ 41 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था कि संसद में दिए गए पुराने बयानों के आधार पर केंद्र सरकार के नीतिगत निर्णयों पर रोक लगाना कानून सम्मत नहीं है। अदालत ने माना कि जिस संशोधन को संसद ने स्वयं अस्वीकार कर दिया था, उसे पीछे के रास्ते से लागू नहीं माना जा सकता। संसद में कही गई बातें वैधानिक रूप से पारित कानून का स्थान नहीं ले सकती हैं। इसके अलावा, अदालत ने यह भी व्यवस्था दी कि संसद के बयानों से किसी पक्ष का अहित होने का तर्क देकर वचनबद्धता के सिद्धांत यानी प्रॉमिसरी एस्टॉपेल का सहारा नहीं लिया जा सकता।

फैसले के पैराग्राफ 42 में उच्च न्यायालय ने कानून की भाषा का विश्लेषण करते हुए लिखा कि आईडीबीआई (निरसन) अधिनियम, 2003 पूरी तरह से स्पष्ट है और इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है। कानून में ऐसा एक भी शब्द नहीं है जो केंद्र सरकार को आईडीबीआई में अपनी शेयरधारिता बेचने या कम करने से रोकता हो। वित्त मंत्रालय ने दोहराया कि जब कानून में कोई बंदिश नहीं है, तो प्रॉमिसरी एस्टॉपेल का तर्क देकर विनिवेश प्रक्रिया को चुनौती नहीं दी जा सकती।

केंद्रीय बजट भाषणों में लगातार दोहराई गई नीति

बैंक के पुनर्गठन और रणनीतिक विनिवेश को लेकर केंद्र सरकार की नीति अचानक लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि यह संसद के पटल पर कई वर्षों से लगातार रखी जाती रही है। वित्त मंत्रालय ने पूर्व में पेश किए गए कई केंद्रीय बजट भाषणों का संदर्भ देते हुए बताया कि सरकार की मंशा हमेशा से पारदर्शी रही है।

केंद्रीय बजट 2016-17 प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद को संबोधित करते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों को मजबूत और प्रतिस्पर्धी बनाने की रूपरेखा रखी थी। उन्होंने अपने भाषण के पैराग्राफ 93 में कहा था कि बैंकों के एकीकरण के लिए रोडमैप तैयार किया जाएगा और बैंक बोर्ड ब्यूरो कार्यशील होगा। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट रूप से घोषणा की थी कि आईडीबीआई बैंक में कायाकल्प की प्रक्रिया पहले ही आरंभ हो चुकी है, जिसे आगे बढ़ाते हुए सरकार अपनी शेयरधारिता को 50 प्रतिशत से नीचे लाने के विकल्प पर भी विचार करेगी।

इसके बाद केंद्रीय बजट 2021-22 में तत्कालीन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण के पैराग्राफ 84 में रणनीतिक विनिवेश के एजेंडे को और विस्तार दिया। उन्होंने वैश्विक महामारी की चुनौतियों के बावजूद विनिवेश पहलों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई। उस बजट में उन्होंने कई प्रमुख सार्वजनिक उपक्रमों और वित्तीय संस्थानों के नाम गिनाए थे, जिनमें बीपीसीएल, एयर इंडिया, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, आईडीबीआई बैंक, बीईएमएल, पवन हंस और नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड शामिल थे। इसके अलावा उन्होंने दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और एक साधारण बीमा कंपनी के निजीकरण के लिए विधायी संशोधन लाने का प्रस्ताव भी संसद के समक्ष रखा था।

मंत्रिमंडल की मंजूरी और फेयरफैक्स के साथ सौदे की रूपरेखा

इस पूरी विनियामक और विधायी पृष्ठभूमि के बीच, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार, 14 अक्टूबर को आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश से जुड़े बड़े प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी। इस फैसले के तहत कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स लिमिटेड को बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की स्वीकृति दी गई है। यह संपूर्ण वित्तीय सौदा 52,878.08 करोड़ रुपये के मूल्यांकन पर तय हुआ है।

इस विनिवेश सौदे में केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम दोनों की हिस्सेदारी शामिल है। कुल 60.72 प्रतिशत की बिक्री में केंद्र सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगी, जबकि भारतीय जीवन बीमा निगम अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी स्थानांतरित करेगा। इस रणनीतिक हिस्सेदारी बिक्री के पूरा हो जाने के बाद भी बैंक में घरेलू सार्वजनिक हिस्सेदारी पूरी तरह खत्म नहीं होगी। नए शेयरधारिता ढांचे के तहत आईडीबीआई बैंक में भारत सरकार के पास 15 प्रतिशत और भारतीय जीवन बीमा निगम के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी बनी रहेगी, जिससे बैंक में सार्वजनिक क्षेत्र की कुल मौजूदगी 34 प्रतिशत पर सुरक्षित रहेगी।

सवाल-जवाब

वित्त मंत्रालय ने आईडीबीआई बैंक को लेकर क्या स्पष्टीकरण दिया है?
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि 2003 के संसदीय बयानों से सरकार बंधी नहीं है और कानून में आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी बेचने पर कोई रोक नहीं है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2018 में क्या निर्णय दिया था?
अदालत ने रिट याचिका खारिज करते हुए कहा था कि पुराने बयानों के आधार पर सरकार को हिस्सेदारी घटाने से नहीं रोका जा सकता और कानून में ऐसी कोई रोक नहीं है।
आईडीबीआई बैंक की कितनी हिस्सेदारी और किसे बेची जा रही है?
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को 52,878.08 करोड़ रुपये में 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की मंजूरी दी है।
इस सौदे में सरकार और एलआईसी की कितनी हिस्सेदारी शामिल है?
इसमें केंद्र सरकार की 30.48 प्रतिशत और एलआईसी की 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी शामिल है।
बिक्री के बाद बैंक में सरकार और एलआईसी के पास कितनी हिस्सेदारी बचेगी?
लेन-देन पूरा होने के बाद भारत सरकार के पास 15 प्रतिशत और एलआईसी के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी शेष रहेगी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Ravikash Gupta@ravikash·10 दिन पहले

सरकार लंबे समय से आईडीबीआई बैंक के विनिवेश पर टकटकी लगाए बैठी थी, और अदालती मुहर लगने के बाद अब निवेशकों का भरोसा और बढ़ेगा। बैंकिंग शेयरों में इस हलचल का असर बाजार पर साफ दिखेगा।

Michael Anderson@michael-anderson·10 दिन पहले

रविकेश जी, बात कानूनी तौर पर भले साफ हो, पर बाजार का भरोसा सिर्फ अदालती फैसले से नहीं लौटता। विनिवेश की असल राह अभी भी लंबी है।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp