सिनेमाघरों में रिलीज हुई नई फिल्म को लेकर सामने आया यह विस्तृत हैवान रिव्यू यह साबित करता है कि दिग्गज फिल्मकार प्रियदर्शन केवल हल्की-फुल्की कॉमेडी ही नहीं, बल्कि रोंगटे खड़े कर देने वाले सस्पेंस सिनेमा में भी बेजोड़ महारत रखते हैं। अपने शानदार करियर की 98वीं फीचर फिल्म के साथ निर्देशक ने बॉलीवुड को एक ऐसा मनोवैज्ञानिक थ्रिलर दिया है जो बिना किसी गैर-जरूरी मेलोड्रामा के दर्शकों को शुरू से अंत तक कुर्सी की पेटी बांधे रखने पर मजबूर करता है। अक्षय कुमार और सैफ अली खान की लोकप्रिय जोड़ी को एक लंबे अरसे बाद आमने-सामने लाना इस कहानी का सबसे रोमांचक पहलू है। दोनों कलाकारों के बीच स्क्रीन पर जो द्वंद्व और दिमागी खेल रचा गया है, वह डार्क शेड्स, भावनात्मक गहराई और बेहतरीन अदाकारी का एक संतुलित संगम बनकर उभरता है।
माइंड गेम्स और अप्रत्याशित मोड़ों से बुनी गई कहानी
फिल्म की पटकथा एक बेहद पेचीदा और अप्रत्याशित टकराव के इर्द-गिर्द ताना-बाना बुनती है। शुरुआत से ही कहानी एक गहरा सन्नाटा और बेचैनी पैदा करती है, जहां दर्शक लगातार यह सोचने पर मजबूर रहते हैं कि अगले पल क्या अनहोनी होने वाली है। निर्देशक अपनी कहानी के पत्ते बहुत तेजी से खोलने के बजाय परत-दर-परत रहस्य से पर्दा हटाते हैं। कहानी का एक सिरा बेहद खतरनाक, शातिर और अप्रत्याशित अपराधी परशुराम के हाथ में है, जिसकी भूमिका अक्षय कुमार ने निभाई है। वहीं दूसरी तरफ कहानी का दूसरा सिरा श्याम नाम के एक दृष्टिहीन व्यक्ति पर केंद्रित है, जिसे सैफ अली खान ने जीवंत किया है।
श्याम आंखों से भले ही देख नहीं सकता, लेकिन अपनी शारीरिक अक्षमता के आगे घुटने टेकने के बजाय वह अपनी बाकी इंद्रियों को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लेता है। सुनने की असाधारण क्षमता, तेज दिमाग और अदम्य साहस के दम पर वह परशुराम के खौफ का मुकाबला करता है। फिल्म का असली रोमांच उस वक्त चरम पर पहुंचता है जब दोनों के बीच चूहे-बिल्ली का मनोवैज्ञानिक खेल शुरू होता है। हर उस मोड़ पर जहां दर्शकों को लगता है कि बाजी किसी एक के पक्ष में झुक चुकी है, कहानी फौरन एक नया और चौंकाने वाला मोड़ ले लेती है, जिससे दर्शकों की उत्सुकता लगातार बनी रहती है।
अभिनय का स्तर: अक्षय का खूंखार रूप और सैफ का धैर्य
इस थ्रिलर की सबसे बड़ी ताकत इसकी मुख्य स्टार कास्ट की सधी हुई परफॉर्मेंस है। अक्षय कुमार को परशुराम के नेगेटिव किरदार में देखना उनके प्रशंसकों के लिए एक सुखद और बड़ा सरप्राइज है। उन्होंने इस नकारात्मक भूमिका को निभाते हुए किसी तरह की लाउड एक्टिंग या बेवजह की चीख-पुकार का सहारा नहीं लिया है। उनके चेहरे का ठंडापन, खामोशी और आंखों में दिखने वाला अजीब सा ठहराव ही दर्शक के मन में डर पैदा करने के लिए काफी है। दर्शक कभी भी यह भांप नहीं पाते कि परशुराम का अगला कदम क्या होगा।
दूसरी ओर, सैफ अली खान ने श्याम के किरदार के जरिए फिल्म को एक बहुत जरूरी भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक संतुलन दिया है। एक दृष्टिहीन व्यक्ति के रूप में सैफ ने केवल दर्शकों की सहानुभूति बटोरने की सस्ती कोशिश नहीं की है। उनका किरदार डरा हुआ और मानसिक दबाव में होने के बावजूद अपनी बौद्धिक कुशाग्रता और हाजिरजवाबी के कारण बेहद मजबूत नजर आता है। सैफ ने लंबे संवादों के बजाय अपनी बॉडी लैंग्वेज और सूक्ष्म भावों से मुश्किल दृश्यों को संभाला है। अक्षय के आक्रामक और अप्रत्याशित रवैये के सामने सैफ का संयम स्क्रीन पर जबरदस्त तनाव पैदा करता है।
सपोर्टिंग कास्ट का मजबूत आधार
मुख्य अभिनेताओं के अलावा फिल्म के सहायक कलाकारों ने भी कहानी को मजबूती दी है। पहल चौधरी ने नंदिनी के रूप में कहानी में बिना किसी बनावट के जरूरी मानवीय संवेदनाएं जोड़ी हैं। शारिब हाशमी एक जांच अधिकारी के रूप में बेहद स्वाभाविक लगे हैं और उनकी मौजूदगी पूरी तहकीकात को विश्वसनीय बनाती है। इसके साथ ही बोमन ईरानी, सैयामी खेर और श्रिया पिलगांवकर ने अपने सीमित दृश्यों में भी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई है। दिग्गज अभिनेता असरानी को इस फिल्म में देखना दर्शकों के लिए एक बेहद भावुक और यादगार क्षण बन जाता है, जहां उनका अभिनय दिल को छू लेता है।
निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी का तकनीकी तालमेल
निर्देशक प्रियदर्शन का दशकों का अनुभव फिल्म के हर दृश्य में साफ झलकता है। अपनी 98वीं फिल्म में उन्होंने साबित कर दिया है कि थ्रिलर जॉनर पर उनकी पकड़ आज भी उतनी ही पैनी है। उन्होंने कमर्शियल सिनेमा के जरूरी तत्वों, गंभीर सस्पेंस और मानवीय भावनाओं को बहुत ही करीने से तराशा है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी कहानी के मिजाज से पूरी तरह मेल खाती है। कैमरे का काम एक डार्क, रहस्यमयी और तनावपूर्ण माहौल गढ़ने में पूरी तरह कामयाब रहा है। लाइट और शैडो का बुद्धिमानी भरा इस्तेमाल, क्लोज-अप फ्रेमिंग और दोनों मुख्य किरदारों के टकराव को फिल्माने का तरीका दर्शकों को सिनेमाई दुनिया में पूरी तरह खींच लेता है।
बैकग्राउंड स्कोर और संगीत का योगदान
किसी भी सस्पेंस फिल्म की धड़कन उसका साउंड डिजाइन होता है। इस फिल्म में बैकग्राउंड स्कोर तनाव को कई गुना बढ़ाने का काम करता है। जब भी परशुराम का आगमन होता है या श्याम किसी खतरे में घिरता है, संगीत दर्शकों की धड़कनें तेज कर देता है। फिल्म का संगीत प्रीतम ने तैयार किया है। अक्सर थ्रिलर फिल्मों में गानों की वजह से कहानी की रफ्तार टूट जाती है, लेकिन यहां निर्देशक और संगीतकार ने यह सुनिश्चित किया है कि गाने कहानी के प्रवाह में रुकावट न बनें बल्कि भावनात्मक जुड़ाव को और गहरा करें।
कुछ कमजोर कड़ियां और संपादन की गुंजाइश
तमाम खूबियों के बावजूद फिल्म में कुछ कमियां भी साफ नजर आती हैं। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका रनटाइम है। 2 घंटे 44 मिनट की अवधि आज के आधुनिक थ्रिलर सिनेमा के लिहाज से थोड़ी लंबी लगती है। खासकर दूसरे हाफ के कुछ हिस्सों में, जहां पुलिस इन्वेस्टिगेशन का ट्रैक आगे बढ़ता है, कहानी की गति थोड़ी धीमी पड़ जाती है। अगर संपादन के स्तर पर फिल्म को 10 से 15 मिनट छोटा कर दिया जाता, तो यह और अधिक चुस्त और प्रभावशाली बन सकती थी। इसके अलावा कुछ सहायक किरदारों को और अधिक स्क्रीन टाइम दिया जा सकता था ताकि मुख्य संघर्ष के बीच उनकी अहमियत और निखरकर आती।
अंतिम फैसला: सिनेमाघरों में देखने लायक अनुभव
कुल मिलाकर यह फिल्म बड़े पर्दे पर अनुभव किए जाने लायक एक बेहतरीन सस्पेंस थ्रिलर है। अक्षय कुमार और सैफ अली खान के बीच का मनोवैज्ञानिक द्वंद्व, अक्षय का अप्रत्याशित डार्क अवतार, सैफ का संवेदनशील अभिनय और प्रियदर्शन का कुशल निर्देशन इसे इस साल की प्रमुख थ्रिलर फिल्मों की कतार में खड़ा करता है। यदि आप दिमागी खेल, सस्पेंस और सधे हुए अभिनय के शौकीन हैं, तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी। इस रोमांचक सिनेमाई अनुभव को 5 में से 3.5 स्टार दिए जाते हैं।


















