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आजमगढ़ के एक्सपर्ट राजेश पांडे ने बताया फॉर्मूला, प्राकृतिक खेती से आधा होगा खर्च और चार गुना बढ़ेगा मुनाफाव्यापार
20 जून 2026, 10:16 am (130 दिन पहले)· 2

आजमगढ़ के एक्सपर्ट राजेश पांडे ने बताया फॉर्मूला, प्राकृतिक खेती से आधा होगा खर्च और चार गुना बढ़ेगा मुनाफा

आजमगढ़ के प्राकृतिक खेती विशेषज्ञ राजेश पांडे ने बताया कि कैसे देसी गाय के गोबर और प्राकृतिक तरीकों से खेती की लागत को आधा करके बंपर मुनाफा कमाया जा सकता है।

आज के समय में मिलावट मुक्त और सेहतमंद खानपान को लेकर लोगों की जागरूकता तेजी से बढ़ रही है। यही वजह है कि बाजार में ऑर्गेनिक यानी जैविक तरीके से उगाए गए अनाजों, फलों और सब्जियों की मांग काफी बढ़ चुकी है। इस बदलते दौर में पारंपरिक रासायनिक खेती को छोड़कर प्राकृतिक कृषि का रास्ता चुनना किसानों के लिए एक बड़ा गेम चेंजर साबित हो सकता है। प्राकृतिक तरीकों से तैयार की गई फसलों में हानिकारक केमिकल नहीं होते, जिससे बाजार में इन्हें न केवल हाथों-हाथ लिया जाता है बल्कि इनके दाम भी काफी बेहतर मिलते हैं। इस खेती को अपनाकर किसान अपनी कुल लागत को आधा कर सकते हैं और मुनाफे को चार गुना तक बढ़ा सकते हैं।

प्रकृति के संसाधनों से ही तैयार करें खाद और बीज

आजमगढ़ के रहने वाले प्राकृतिक खेती के विशेषज्ञ राजेश पांडे का मानना है कि प्राकृतिक खेती वास्तव में प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर की जाने वाली एक बेहद संतुलित कृषि प्रणाली है। इस पद्धति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बाहर से कुछ भी खरीदने की आवश्यकता नहीं होती। खाद से लेकर फसलों के बीज तक, हर एक चीज को पूरी तरह से प्राकृतिक और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से ही तैयार किया जाता है। राजेश पांडे के अनुसार, इस खेती को सफल बनाने के लिए पशुपालन और जैव विविधता का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। किसान अपनी फसलों को सुरक्षित रखने और बेहतर पैदावार हासिल करने के लिए हर स्तर पर केवल प्राकृतिक उपायों का ही सहारा लेते हैं।

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देसी गाय का गोबर और जीवामृत का कमाल

आजकल रासायनिक खादों के बढ़ते इस्तेमाल से जहां मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है, वहीं किसान जैविक खाद अपनाकर अपनी जमीन की उर्वरक क्षमता को फिर से जीवित कर सकते हैं। प्राकृतिक खेती में देशी गोवंश यानी देसी गाय के गोबर और गोमूत्र की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। इसका उपयोग करके किसान अपने घर पर ही जीवामृत और घन जीवामृत जैसी बेहद असरदार प्राकृतिक खाद तैयार कर सकते हैं। यह प्राकृतिक खाद न केवल फसलों की गुणवत्ता में सुधार लाती है, बल्कि मिट्टी के मित्र बैक्टीरिया और केंचुओं को सक्रिय कर उसकी उपजाऊ शक्ति को भी बढ़ाती है। इसके इस्तेमाल से फसलें स्वस्थ होती हैं और पैदावार में भारी बढ़ोतरी देखी जाती है।

बिना केमिकल के कीट नियंत्रण और सुरक्षा

फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों से बचाने के लिए किसी भी तरह के जहरीले रासायनिक कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए खेतों के चारों तरफ बायो फेंसिंग यानी प्राकृतिक बाड़ लगाई जाती है। बायो फेंसिंग के जरिए न केवल हानिकारक कीटों को खेतों से दूर रखा जाता है, बल्कि किसान इस फेंसिंग के रूप में अतिरिक्त पौधे लगाकर एक्स्ट्रा आमदनी भी हासिल कर सकते हैं। इस तरह बिना किसी अतिरिक्त खर्च के फसलों की सुरक्षा सुनिश्चित हो जाती है।

किसानों के लिए मुफ्त प्रशिक्षण की पहल

राजेश पांडे का लक्ष्य अधिक से अधिक किसानों को इस पर्यावरण अनुकूल और मुनाफे वाली खेती से जोड़ना है। इसके लिए वे लगातार ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर किसानों को प्रेरित कर रहे हैं। सबसे खास बात यह है कि वे किसानों को इस तकनीक को बारीकी से सिखाने के लिए मुफ्त में ट्रेनिंग और व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। उनका मानना है कि जब किसान आत्मनिर्भर होकर प्राकृतिक तरीकों को अपनाएंगे, तभी देश के लोगों को जहर मुक्त भोजन मिलेगा और किसानों की आर्थिक स्थिति में भी बड़ा सुधार आएगा।

सवाल-जवाब

प्राकृतिक खेती से लागत और मुनाफे पर क्या असर पड़ता है?
इससे खेती की लागत घटकर आधी हो जाती है और मुनाफा चार गुना तक बढ़ सकता है।
प्राकृतिक खाद तैयार करने के लिए मुख्य रूप से किसका उपयोग किया जाता है?
इसके लिए मुख्य रूप से देसी गाय के गोबर और गोमूत्र का उपयोग करके जीवामृत और घन जीवामृत तैयार किया जाता है।
कीट नियंत्रण के लिए रसायनों के स्थान पर क्या उपाय किया जाता है?
कीट नियंत्रण और खेतों की सुरक्षा के लिए रसायनों के बजाय बायो फेंसिंग का इस्तेमाल किया जाता है।
आजमगढ़ में किसानों को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण कौन दे रहा है?
प्राकृतिक खेती के एक्सपर्ट राजेश पांडे किसानों को इसके लिए मुफ्त ट्रेनिंग और प्रशिक्षण दे रहे हैं।
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