धर्मेंद्र और रेखा का वो सदाबहार सावन गीत, जिसने चार दशकों से दिलों पर किया है राजअमेरिकी डॉलर पर मंडराया डिबेसमेंट का खतरा, अमेरिकी ट्रेजरी की चाल और ईरान प्रतिबंधों पर टिकी निवेशकों की नजरकोडरमा का अनोखा खरियोडीह बाबा धाम, जहां मन्नत पूरी होने पर दंडवत चलते हैं भक्त और आज भी खुली है मंदिर की छतइंडोनेशिया के वन्यजीव संरक्षण को मिला वनतारा का साथ, जकार्ता में हुआ ऐतिहासिक ऐलानघर बैठे ऐसे रद्द करें रेलवे काउंटर टिकट, जानिए रिफंड पाने का पूरा नियममलेशिया से डिपोर्ट किए गए बंबीहा गैंग के 3 खतरनाक गुर्गों को पंजाब पुलिस ने दबोचाऐल्फा रिव्यू (2025): थिएटर में फ्लॉप होने के बाद अब घर बैठे नेटफ्लिक्स पर देखिए आलिया भट्ट और शरवरी वाघ की स्पाई थ्रिलरउदयपुर का लखारा चौक: जहां कभी मेवाड़ की रानियां खरीदती थीं लाख की चूड़ियांरूसी ऑनलाइन रिटेलर ओजोन के गोदामों पर यूक्रेनी ड्रोन हमलों से भारी तबाही, शेयरों में बड़ी गिरावटगोल्ड में जोरदार तेजी जारी, लेकिन ओवरबॉट आरएसआई दे रहा सुस्ती का संकेत
अमेठी में चीनी राखियों को टक्कर देंगी इको-फ्रेंडली राखियां, स्वयं सहायता समूह की महिलाएं कर रही हैं तैयारव्यापार
24 अग॰ 2026, 2:56 pm (2 घंटे पहले)· 2

अमेठी में चीनी राखियों को टक्कर देंगी इको-फ्रेंडली राखियां, स्वयं सहायता समूह की महिलाएं कर रही हैं तैयार

अमेठी में इस बार रक्षाबंधन पर चाइनीज राखियों की बजाय पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल और स्वदेशी राखियां भाइयों की कलाई पर सजेंगी। आरसेटी संस्थान के जरिए स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को इनका प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे उन्हें आर्थिक मजबूती मिल रही है।

रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम और अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है। इस पावन अवसर को लेकर बहनों में खासा उत्साह देखने को मिलता है। इस बार बाजारों में मिलने वाली चीनी राखियों को दरकिनार करते हुए स्थानीय स्तर पर तैयार की जाने वाली पर्यावरण के अनुकूल और इको-फ्रेंडली राखियां भाइयों की कलाई की शोभा बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। खास बात यह है कि इन राखियों को किसी बड़ी फैक्ट्री में नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों में सक्रिय स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं द्वारा अपने हाथों से गढ़ा जा रहा है। अलग-अलग त्योहारों के मौकों पर इन महिलाओं को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है, जिससे उन्हें वर्षभर रोजगार के नए अवसर मिलते रहते हैं और उनकी आजीविका के साधन मजबूत होते हैं।

अमेठी में महिलाओं को मिल रहा है आत्मनिर्भरता का प्रशिक्षण

उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को रक्षा सूत्र यानी राखियां बनाने का विशेष प्रशिक्षण देकर आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाया जा रहा है। यह पूरा कार्य आरसेटी संस्थान की देखरेख में संचालित किया जा रहा है। यहां महिलाओं को विभिन्न और आकर्षक डिजाइनों में राखियां बनाने की कला सिखाई जा रही है, जो पूरी तरह शुद्ध और इको-फ्रेंडली सामग्री से बनाई जाती हैं। महिलाओं का मानना है कि इस तरह के कौशल विकास कार्यक्रमों से उन्हें न केवल नए उत्पाद बनाने की कला सीखने को मिलती है, बल्कि वे त्योहारों के दौरान बेहतर कमाई कर आर्थिक रूप से समृद्ध भी बन रही हैं। मास्टर ट्रेनरों का भी यही कहना है कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को घर बैठे रोजगार उपलब्ध कराना और उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र करना है।

ये भी पढ़ें

रोजगार के जरिए बदल रही है महिलाओं की तकदीर

साई बाबा स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिला संतोषी देवी अपने अनुभव साझा करते हुए बताती हैं कि उन लोगों ने मिलकर समूह का गठन किया है और उसी के माध्यम से इन खूबसूरत राखियों का निर्माण किया जा रहा है। उन्हें हर त्योहार पर कुछ नया सीखने का अवसर मिलता है, जिससे समूह की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर वे विभिन्न प्रकार के उत्पाद तैयार करती हैं। उनका कहना है कि इस व्यवस्था से उनकी वित्तीय स्थिति में सुधार आ रहा है और उन्हें अब अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए किसी के आगे हाथ फैलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। उन्हें आसानी से रोजगार मिल गया है और उनकी किस्मत के द्वार खुल रहे हैं।

साम्प्रदायिक सद्भाव और हुनर की अनूठी मिसाल

इस हुनरमंद अभियान से केवल एक वर्ग की नहीं, बल्कि समाज के हर तबके की महिलाएं जुड़कर लाभान्वित हो रही हैं। एक अन्य समूह से जुड़ी मुस्लिम महिला नजरीन बताती हैं कि यह पहल उनके लिए अत्यंत लाभकारी साबित हो रही है। भाइयों की कलाई पर सजने वाली ये राखियां रक्षा के सूत्र के साथ-साथ आपसी प्रेम और भाईचारे के बंधन को और अधिक मजबूत करेंगी। उन्हें आरसेटी संस्थान की तरफ से विभिन्न प्रकार का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है, जिसके जरिए उन्हें साल के बारह महीने अलग-अलग कलाएं सीखकर आत्मनिर्भर बनने का अवसर प्राप्त होता है।

सामग्री और तकनीक की बारीकियां सिखा रही हैं मास्टर ट्रेनर

इन ग्रामीण महिलाओं को कुशल बनाने का जिम्मा संभाल रही मास्टर ट्रेनर श्वेता बरनवाल बताती हैं कि ये सभी राखियां पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल यानी इको-फ्रेंडली हैं। इन्हें तैयार करने में धागे, मोती, पमपम और कौड़ी जैसी प्राकृतिक और स्थानीय रूप से उपलब्ध चीजों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है। इन विभिन्न सामग्रियों के संयोजन से तरह-तरह के आकर्षक रक्षा सूत्र बनाए जा रहे हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग है। महिलाओं को एक ही मंच पर विभिन्न प्रकार के उत्पाद बनाने का उन्नत प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे उनका कौशल निखर रहा है और उन्हें निरंतर रोजगार मिल रहा है।

सवाल-जवाब

अमेठी में इस रक्षाबंधन पर किस तरह की राखियां तैयार की जा रही हैं?
अमेठी में इस बार चीनी राखियों के स्थान पर पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल और इको-फ्रेंडली राखियां तैयार की जा रही हैं।
इन राखियों को बनाने का कार्य कौन कर रहा है?
इन राखियों को स्वयं सहायता समूह से जुड़ी ग्रामीण महिलाएं अपने हाथों से तैयार कर रही हैं।
महिलाओं को यह प्रशिक्षण किस संस्थान द्वारा दिया जा रहा है?
महिलाओं को राखियां बनाने और आत्मनिर्भर बनने का यह प्रशिक्षण आरसेटी संस्थान की तरफ से दिया जा रहा है।
इको-फ्रेंडली राखियों को बनाने में किन सामग्रियों का उपयोग हो रहा है?
इन राखियों को बनाने के लिए धागे, मोती, पमपम और कौड़ी जैसी प्राकृतिक एवं सजावटी चीजों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
इस पहल से महिलाओं को क्या लाभ मिल रहा है?
इस पहल से महिलाओं को रोजगार मिल रहा है, जिससे वे आर्थिक रूप से समृद्ध और आत्मनिर्भर बन रही हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR