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उदयपुर का लखारा चौक: जहां कभी मेवाड़ की रानियां खरीदती थीं लाख की चूड़ियांजीवनशैली
24 अग॰ 2026, 3:45 pm (57 मिनट पहले)· 3

उदयपुर का लखारा चौक: जहां कभी मेवाड़ की रानियां खरीदती थीं लाख की चूड़ियां

उदयपुर के ऐतिहासिक लखारा चौक की पुरानी विरासत आज भी जीवंत है, जहां कभी मेवाड़ की रानियां चूड़ियां खरीदने आती थीं और कारीगर परिवार पीढ़ियों से इस पारंपरिक कला को संभाल रहे हैं।

उदयपुर शहर के प्राचीन मार्ग और गलियां अपने भीतर मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास और समृद्ध परंपराओं के अनगिनत किस्में समेटे हुए हैं। इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों में से एक खास स्थान लखारा चौक का है, जो अपनी पारंपरिक लाख की चूड़ियों और पीढ़ियों से इस हुनर से जुड़े कारीगर परिवारों के कारण अपनी एक अलग पहचान रखता है।

मेवाड़ की रानियों का पसंदीदा ठिकाना

ऐतिहासिक कथाओं के अनुसार, बीते दौर में मेवाड़ घराने की रानियां और राजकुमारियां भी विशेष रूप से इस बाजार में चूड़ियां खरीदने के लिए आया करती थीं। यही वजह है कि यह इलाका आज भी उदयपुर की पुरानी सांस्कृतिक विरासत का एक बेहद अहम और जीवंत हिस्सा माना जाता है।

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पीढ़ियों से जारी हुनर का सफर

लखारा चौक की बसावट में रहने वाले अनेक परिवार पीढ़ियों से चूड़ी निर्माण और उसके व्यापार से अपनी आजीविका चलाते आ रहे हैं। एक समय था जब इन तंग गलियों में कच्ची लाख को आग पर पिघलाकर उसे मनचाहा आकार देने, चमकदार रंग-बिरंगी चूड़ियां गढ़ने और उन्हें पारंपरिक तौर पर सजाने का काम बड़े पैमाने पर किया जाता था। हालांकि वक्त के साथ बाजार के मिजाज में बदलाव आया है और मशीनों से बनी आधुनिक चूड़ियों का चलन काफी तेजी से बढ़ा है, लेकिन इस चौक के पुराने बाशिंदों और कारीगरों ने इस प्राचीन कला को पूरी तरह मिटने नहीं दिया है।

बदलते दौर में भी कायम है परंपरा

लखारा चौक स्थित हिमानी बैंगल्स की संचालिका बताती हैं कि उनका परिवार दशकों से इसी बाजार में आबाद है। पुराने समय में उनके खानदान की पहचान माहिर लाख कारीगरों के रूप में होती थी। आज भी उनके घर के सदस्य चूड़ी बनाने के काम से जुड़े हुए हैं, भले ही आधुनिक समय की मांग के साथ इस पारंपरिक कला के रूप में काफी बदलाव आ चुका है। आज के इस दौर में पारंपरिक लाख के अलावा बाजार में कांच, मेटल और विभिन्न प्रकार की डिजाइनर रंग-बिरंगी चूड़ियां भी ग्राहकों के लिए उपलब्ध रहती हैं।

विवाह और सामाजिक रस्मों का केंद्र

इस बाजार की सबसे बड़ी खासियत आज भी शादी-ब्याह के अवसरों पर खरीदी जाने वाली खास चूड़ियों से जुड़ी है। मेवाड़ क्षेत्र में विवाह के दौरान दुल्हन के लिए विशेष रूप से तैयार होने वाला चूड़ा यहीं से बनवाने की परंपरा बरसों से चली आ रही है। इसके अलावा, विवाह संपन्न होने के बाद जब दुल्हन का चूड़ा बदलवाने की रस्म निभाई जाती है, तब भी परिवार के लोग इसी बाजार का रुख करते हैं। इस प्रकार यह बाजार केवल खरीदारी का माध्यम भर नहीं है, बल्कि कई अहम पारिवारिक और सामाजिक संस्कारों की डोर से भी मजबूती से बंधा हुआ है।

त्योहारों पर सजती हैं रंग-बिरंगी गलियां

जब भी कोई बड़ा पर्व या त्योहार नजदीक आता है, तो लखारा चौक की संकरी गलियां अनगिनत रंग-बिरंगी चूड़ियों की चमक से जगमगा उठती हैं। सावन के महीने, हरियाली तीज और अन्य उत्सवों के मौके पर आसपास की महिलाएं बड़ी संख्या में चूड़ियां खरीदने के लिए यहां पहुंचती हैं। स्थानीय दुकानदारों का यह भी कहना है कि आधुनिक मॉल संस्कृति और ऑनलाइन शॉपिंग के बढ़ते क्रेज के कारण अब पहले जैसी रौनक में थोड़ी कमी जरूर आई है, लेकिन इस बाजार का आकर्षण कम नहीं हुआ है।

उदयपुर की संस्कृति की जीवंत मिसाल

तमाम आधुनिक बदलावों के बीच भी लखारा चौक ने अपनी मौलिक पहचान को सहेज कर रखा है। यहां की पुरानी दुकानें, पारंपरिक कारीगर परिवार और हाथों से बनी चूड़ियां पर्यटकों और स्थानीय लोगों को उदयपुर के पुराने शहर की सांस्कृतिक झलक बखूबी दिखाती हैं। यह बाजार सिर्फ चूड़ियों की खरीद-फरोख्त का अड्डा नहीं, बल्कि मेवाड़ की उस सांस्कृतिक विरासत का जीता-जाता सबूत है जिसे लखारा परिवार पीढ़ियों से अपने अथक हुनर के जरिए जीवित रखे हुए हैं।

सवाल-जवाब

उदयपुर के लखारा चौक की मुख्य विशेषता क्या है?
लखारा चौक अपनी पारंपरिक लाख की चूड़ियों और पीढ़ियों से इस काम में लगे कारीगर परिवारों के लिए प्रसिद्ध है।
इतिहास में इस बाजार से कौन जुड़ा रहा है?
पुराने समय में मेवाड़ की रानियां और राजकुमारियां इस बाजार में चूड़ियां खरीदने आती थीं।
लखारा चौक किस खास रस्म के लिए जाना जाता है?
यह बाजार मेवाड़ में शादियों के लिए दुल्हन का खास चूड़ा बनवाने और शादी के बाद चूड़ा बदलवाने की रस्म के लिए प्रसिद्ध है।
किन त्योहारों पर इस बाजार में विशेष रौनक रहती है?
सावन, तीज और अन्य प्रमुख त्योहारों के दौरान महिलाएं इस बाजार में चूड़ियां खरीदने पहुंचती हैं।
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