झारखंड के देवघर जिले में हर साल आयोजित होने वाला प्रसिद्ध श्रावणी मेला केवल लाखों शिवभक्तों की अगाध आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा दे रहा है। बाबा बैद्यनाथ धाम और निकटवर्ती बासुकीनाथ धाम में भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए देश भर से रोजाना पहुंचने वाले श्रद्धालु बड़ी मात्रा में ताजे फूल और मालाएं खरीदते हैं। श्रद्धालुओं की इस निरंतर बनी रहने वाली मांग ने देवघर के आसपास स्थित गांवों के किसानों की तकदीर बदल दी है, जहां पारंपरिक खाद्यान्न फसलों पर निर्भर रहने वाले किसान अब बड़े पैमाने पर व्यावसायिक फूलों की खेती की ओर रुख कर रहे हैं।
पारंपरिक खेती से फूलों की खेती की ओर बदलाव
देवघर के ग्रामीण इलाकों, खासकर मोहनपुर प्रखंड के कनिया पोखर, मल्हारा और जरिया जैसे गांवों के खेतों का परिदृश्य अब पूरी तरह बदल चुका है। जिन खेतों में पहले केवल धान, अनाज और सामान्य मौसमी फसलें उगाई जाती थीं, वहां अब चारों तरफ रंग-बिरंगे फूल मुस्कुराते हुए दिखाई देते हैं। स्थानीय किसानों ने बाजार की मांग को समझते हुए सिर्फ खेत से फूल तोड़कर बेचने तक खुद को सीमित नहीं रखा है, बल्कि उन्होंने मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) का एक अनूठा मॉडल अपनाया है।
किसान परिवार खेत से उपज प्राप्त करने के साथ-साथ घर पर खुद ही फूलों की सुंदर मालाएं तैयार कर रहे हैं। इससे एक ही फसल के जरिए कमाई के दो अलग-अलग रास्ते खुल गए हैं। एक तरफ जहां सीधे खुले फूलों की बिक्री से तुरंत नकद आय होती है, वहीं दूसरी तरफ घर में तैयार की गई मालाओं को बाजार में बेचकर अतिरिक्त मुनाफा कमाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में परिवार के सभी सदस्य मिलकर हाथ बंटाते हैं। घर की महिलाएं विशेष रूप से माला बनाने का काम संभालती हैं, जिससे खेती-किसानी के साथ-साथ घरेलू स्तर पर ही महिलाओं के लिए स्वरोजगार और सीधी भागीदारी के अवसर पैदा हो रहे हैं।
स्थानीय बाजार से बढ़ा मुनाफा और घटा परिवहन खर्च
श्रावणी मेले के दौरान देवघर में फूलों और मालाओं की मांग आम दिनों के मुकाबले कई गुना बढ़ जाती है। दूर-दराज के राज्यों और जिलों से आने वाले कांवड़िये और श्रद्धालु तड़के सुबह से ही मंदिर परिसर और आसपास के बाजारों में पूजन सामग्री खरीदने लगते हैं। सूर्योदय से पहले ही दुकानें सज जाती हैं और दिन चढ़ने के साथ-साथ बिक्री में तेजी आती है।
इस भारी मांग का सबसे बड़ा फायदा स्थानीय किसानों को यह मिल रहा है कि उन्हें अपनी फसल बेचने के लिए किसी दूर-दराज की बड़ी मंडी में नहीं जाना पड़ता। बाबा बैद्यनाथ मंदिर और बासुकीनाथ धाम के आसपास के स्थानीय बाजारों में ही पूरी उपज की खपत आसानी से हो जाती है। इससे किसानों का मंडी तक जाने वाला भारी परिवहन खर्च बच जाता है और समय की भी बचत होती है। बिचौलियों के बिना सीधे स्थानीय स्तर पर मजबूत बाजार मिलने से किसानों को अपनी मेहनत का पूरा और उचित मूल्य मिल पा रहा है।
अग्रिम योजना और पारिवारिक भागीदारी का मॉडल
श्रावणी मेले के समय फूलों की मांग में होने वाली बढ़ोतरी का अनुमान किसानों को पहले से होता है, इसलिए वे महीनों पहले से ही इसकी योजना बनाना शुरू कर देते हैं। बुवाई से लेकर सिंचाई और पौधों की देखरेख इस तरह तय की जाती है कि मेले के दौरान खेतों में फूलों की बंपर पैदावार तैयार रहे। सही समय पर सही उपज बाजार में पहुंचने से किसानों को अधिकतम दाम मिलते हैं।
खेती के इस मॉडल में पूरे परिवार का श्रम जुड़ा हुआ है, जिससे लागत बेहद कम आती है। स्थानीय किसान प्रमोद पुजहर के अनुसार, "श्रावणी मेले में फूलों की बढ़ती मांग को देखते हुए किसान पहले से तैयारी करते हैं, जिससे पूरे परिवार को अतिरिक्त कमाई का अवसर मिलता है।" खेत की तैयारी से लेकर फूल तोड़ने और माला गूंथने तक घर के सभी उम्र के सदस्य योगदान देते हैं। इस एकजुटता से परिवार की कुल आमदनी में सुधार हुआ है और खेती अब एक लाभदायक पारिवारिक व्यवसाय का रूप ले रही है।
मौसमी आय से कुटीर उद्योग की ओर बढ़ता कदम
श्रावणी मेला समाप्त होने के बाद भी देवघर में फूलों की मांग खत्म नहीं होती। बाबा की नगरी में साल भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है और नित्य पूजा-पाठ के लिए ताजे फूलों की आवश्यकता बनी रहती है। यही कारण है कि स्थानीय किसानों के लिए फूलों की खेती केवल किसी एक महीने या मेले तक सीमित मौसमी आय का जरिया नहीं रही, बल्कि यह साल भर चलने वाली एक स्थायी अतिरिक्त आमदनी का आधार बन चुकी है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को फूलों की वैज्ञानिक खेती, बेहतर बीज, शीत भंडारण और व्यवस्थित बाजार संपर्क सुविधाएं मुहैया कराई जाएं, तो यह गतिविधि आने वाले समय में एक संगठित ग्रामीण कुटीर उद्योग का आकार ले सकती है। बाबा बैद्यनाथ की इस पवित्र नगरी में उमड़ने वाली आस्था ग्रामीण परिवारों के जीवन में समृद्धि के नए रंग भर रही है और किसानों को आत्मनिर्भरता की एक नई दिशा दिखा रही है।



















