पश्चिम चम्पारण में एक ऐसा कारोबार चल रहा है जो लोगों को हैरान कर सकता है। जिस स्नेल यानी घोंघे को दुनिया के कई देशों में एक बेहद महंगी और खास एग्ज़ोटिक नॉन वेज डिश के तौर पर परोसा और खाया जाता है, उसकी खरीद-फरोख्त पश्चिम चम्पारण समेत बिहार के तमाम जिलों में खुलेआम सड़क के किनारे पत्तों पर रखकर की जाती है। वायरल वीडियो और जमीनी हकीकत बयां करती है कि कैसे सड़क किनारे लंबी कतारों में विक्रेता बोरियों और पत्तों पर घोंघे सजाकर बैठते हैं और शौकीन खरीदार बड़े चाव से इन्हें खरीदते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि दुनिया भर में जिसे सी फूड की श्रेणी में रखा जाता है, उसे बिहार के स्थानीय तालाबों, पोखरों और छोटी नदियों से चुनकर सीधे बाजारों तक पहुंचाया जाता है।
गांव के 70 परिवार चलाते हैं यह अनूठा व्यवसाय
बेतिया के हरदिया पंचायत के रहने वाले हीरा लाल मांझी का कहना है कि उनके गांव के लगभग 70 परिवार इसी स्नेल के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। इस कारोबार की सबसे दिलचस्प बात यह है कि ये लोग केवल पारंपरिक व्यापारी नहीं हैं, बल्कि खुद कुशल फार्मर भी हैं। ये ग्रामीण खुद ही घोंघे की फार्मिंग करने के साथ-साथ आसपास के पोखरों, तालाबों और छोटी नदियों से इन्हें बड़ी मेहनत से इकट्ठा करते हैं। इसके बाद इन्हें स्थानीय बाजारों में लाया जाता है, जहां इनका थोक और खुदरा व्यापार बड़े पैमाने पर होता है।
स्थानीय भाषा में अइठा और निकालने का खास तरीका
आपको बता दें कि इस जीव को हिंदी में घोंघा और बिहार की स्थानीय बोलियों में अइठा के नाम से जाना जाता है। ये जीव आमतौर पर जलीय स्रोतों के आसपास की नम मिट्टी में रहना पसंद करते हैं। इन्हें पकड़ने के लिए बांस से बने एक विशेष और पारंपरिक यंत्र का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी मदद से इन्हें आसानी से फंसाया जाता है। बाजार में बेचने से पहले व्यापारी इसके कड़े बाहरी कवच को अलग कर देते हैं और उसके भीतर मौजूद नरम जीव को पानी से अच्छी तरह साफ करने के बाद ही ग्राहकों को बेचते हैं।
पोषण से भरपूर और बंपर बिक्री के आंकड़े
हीरा लाल मांझी के मुताबिक, खुले बाजार में इस घोंघे का भाव 200 रुपए प्रति किलो चल रहा है। इस जीव के भीतर आयरन, प्रोटीन और ओमेगा 3 फैटी एसिड जैसे दर्जनों जरूरी पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, यही वजह है कि लोग इसे खाने के लिए काफी उत्सुक रहते हैं। इस भारी मांग के चलते स्थानीय बाजार में हर दिन औसतन दो क्विंटल तक घोंघे की खपत हो जाती है। वहीं, अगस्त से अक्टूबर के बीच का समय इसके लिए पीक सीजन माना जाता है, जब इसकी बिक्री बढ़कर प्रतिदिन तीन क्विंटल तक पहुंच जाती है।

















