स्वच्छ ऊर्जा की तरफ बढ़ते कदमों के बीच भारत अपने नेट-जीरो संकल्प को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा का विस्तार कर रहा है। इसी दिशा में केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री सर्वोदय योजना की शुरुआत की है, जिसका मुख्य मकसद देश भर में एक करोड़ घरों की छतों पर रूफटॉप सोलर पैनल लगाकर बिजली तैयार करना है। इस पहल का सीधा लाभ गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों को मिलना तय है, जिससे उनका मासिक बिजली बिल काफी हद तक घट जाएगा। लेकिन बड़े स्तर पर स्थापित हो रहे इन संयंत्रों के साथ एक नई पर्यावरणीय और औद्योगिक चुनौती भी सामने आ रही है, जो आने वाले वर्षों में सौर पैनलों से निकलने वाले कचरे के प्रबंधन से जुड़ी है।
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) की ओर से जारी विशेष अध्ययन ‘इनेबलिंग अ सर्कुलर इकोनॉमी इन इंडियाज सोलर इंडस्ट्री: असेसिंग द सोलर वेस्ट क्वांटम’ में इस संबंध में बेहद अहम आंकड़े पेश किए गए हैं। इस शोध पत्र के अनुसार, देश के मौजूदा सोलर प्लांट्स और वित्त वर्ष 2023-24 से लेकर वित्त वर्ष 2029-30 के बीच स्थापित होने वाली नई सौर ऊर्जा परियोजनाओं से पैदा होने वाला सौर कचरा वर्ष 2030 तक 600 किलोटन के स्तर को छू सकता है। इस कचरे के भारी-भरकम आकार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह मात्रा 720 ओलंपिक आकार के विशाल स्विमिंग पूलों को पूरी तरह भरने के बराबर होगी।
पाँच राज्यों पर रहेगा कचरा प्रबंधन का मुख्य भार
अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि देश में उत्पन्न होने वाले कुल सोलर वेस्ट का एक बहुत बड़ा हिस्सा मुख्य रूप से पाँच राज्यों से सामने आएगा। इनमें राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु शामिल हैं, जहाँ बड़े सोलर पार्क और रूफटॉप परियोजनाएँ तेजी से लगाई गई हैं। भारत की मौजूदा सौर ऊर्जा क्षमता से निकलने वाला कचरा ही 2030 तक बढ़कर 340 किलोटन हो जाएगा। इस कचरे में लगभग 10 किलोटन सिलिकॉन, 12 से 18 टन मूल्यवान चांदी तथा 16 टन कैडमियम और टेल्यूरियम जैसे तत्व मौजूद होंगे। ये सभी भारत के विनिर्माण और तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण खनिज माने जाते हैं।
इसके अलावा, शेष 260 किलोटन सौर कचरा चालू दशक में स्थापित होने वाली नई परियोजनाओं के संचालन और रखरखाव के दौरान पैदा होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि कचरे का यह बड़ा अंबार केवल एक समस्या नहीं है, बल्कि भारत के पास सौर ऊर्जा के क्षेत्र में सर्कुलर इकोनॉमी का वैश्विक केंद्र बनने का एक बेहतरीन मौका भी है। यदि समय रहते इन कीमती खनिजों को सुरक्षित तरीके से रीसायकल कर लिया जाए, तो इससे देश की घरेलू सौर सप्लाई चेन को बाहरी दबावों से बचाया जा सकेगा और आयात पर निर्भरता भी कम होगी।
292 गीगावॉट का लक्ष्य और ई-वेस्ट नियमों का ढांचा
भारत ने वर्ष 2030 तक लगभग 292 गीगावॉट सौर ऊर्जा क्षमता हासिल करने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। मार्च 2015 में देश की सौर क्षमता महज 4 गीगावॉट थी, जो दिसंबर 2023 तक उछलकर 73 गीगावॉट के आंकड़े पर पहुंच गई। इस तीव्र विकास के मद्देनजर सौर पीवी कचरे का सुरक्षित निपटारा पर्यावरणीय संतुलन, आर्थिक लाभ और सामाजिक सुरक्षा तीनों ही दृष्टिकोणों से अपरिहार्य हो चुका है। सीईईडब्ल्यू का यह अध्ययन इसलिए भी खास है क्योंकि इसने विनिर्माण इकाइयों के अलावा अन्य सभी जमीनी स्रोतों से पैदा होने वाले सौर कचरे का पहली बार विस्तृत आकलन पेश किया है, जो भविष्य की नीतियां तय करने में बुनियादी आधार बनेगा।
इस दिशा में नीतिगत स्तर पर पहले ही कुछ ठोस कदम उठाए जा चुके हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने सोलर पीवी सेल्स और मॉड्यूल कचरे को नियंत्रित करने के लिए ई-वेस्ट (मैनेजमेंट) रूल्स-2022 अधिसूचित किए थे। इन नियमों के तहत विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी यानी ईपीआर की व्यवस्था लागू की गई है। इसके अंतर्गत सोलर पीवी सेल और मॉड्यूल बनाने वाली कंपनियों पर ही उनके द्वारा बेचे गए उपकरणों से पैदा होने वाले कचरे को वापस जुटाने और उसके सुरक्षित निपटारे की वैधानिक जिम्मेदारी सौंपी गई है।
उद्योग के दिग्गजों की राय और सर्कुलर इकोनॉमी की दरकार
सीईईडब्ल्यू के सीईओ डॉ. अरुणाभा घोष ने इस चुनौती पर अपनी बात रखते हुए कहा कि सौर कचरे के सुरक्षित समाधान को केवल एक पर्यावरणीय दायित्व के रूप में नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और सर्कुलर इकोनॉमी के रणनीतिक साधन के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने रेखांकित किया कि जिस तरह सौर क्षमता में ऐतिहासिक उछाल आया है, उसी तरह मजबूत रीसाइक्लिंग नेटवर्क खड़ा करना जरूरी है। यह प्रक्रिया सौर ऊर्जा तंत्र को टिकाऊ बनाएगी, देश में नए ग्रीन जॉब्स पैदा करेगी और मूल्यवान खनिजों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए नवाचार को गति देगी।
इसी तरह सीईईडब्ल्यू के सीनियर प्रोग्राम लीड नीरज कुलदीप ने ध्यान दिलाया कि भारत की जी20 अध्यक्षता के दौरान सर्कुलर इकोनॉमी को सतत विकास के एक बुनियादी स्तंभ के रूप में चिन्हित किया गया था। उनका मानना है कि एक जिम्मेदार सौर रीसाइक्लिंग उद्योग से संसाधनों का अधिकतम सदुपयोग होगा और स्थानीय आपूर्ति शृंखला लचीली बनेगी। हालांकि, उन्होंने सचेत किया कि भारत में सोलर रीसाइक्लिंग की तकनीक और इसका औद्योगिक ढांचा अभी शुरुआती पायदान पर है, जिसे आगे बढ़ाने के लिए वित्तीय और नीतिगत मदद की तत्काल दरकार है।
25 साल की मियाद से पहले खराब होते मॉड्यूल और आगे की राह
आमतौर पर एक सोलर मॉड्यूल की निर्धारित डिजाइन लाइफ 25 वर्ष मानी जाती है। लेकिन वास्तविक धरातल पर कई बार परिवहन के दौरान लगने वाले झटके, फील्ड में रखरखाव की लापरवाही और परियोजनाओं के संचालन में आने वाली तकनीकी खामियों के चलते मॉड्यूल इस मियाद से बहुत पहले ही अनुपयोगी हो जाते हैं। इसलिए 25 साल पूरे होने का इंतजार किए बिना तत्काल रीसाइक्लिंग तंत्र खड़ा करना आवश्यक है।
अध्ययन में सिफारिश की गई है कि भारतीय सौर उद्योग को खराब पैनलों को वापस लाने के लिए रिवर्स लॉजिस्टिक्स, सुरक्षित भंडारण, पुर्जों को अलग करने वाले डिस्मेंटलिंग केंद्रों और उच्च स्तरीय रीसाइक्लिंग प्लांट्स के निर्माण में तेजी लानी चाहिए। इसके साथ ही नए बिजनेस मॉडल और वित्तीय व्यवस्थाएं भी विकसित करनी होंगी। कचरा प्रबंधन के ढांचे को रणनीतिक स्थानों पर स्थापित करने के लिए एक ऐसा केंद्रीय डेटाबेस तैयार किया जाना चाहिए जिसे समय-समय पर अपडेट किया जाए। इस डेटाबेस में सोलर पैनलों की तकनीक, उनके निर्माता का नाम और परियोजना के चालू होने की तारीख जैसी सटीक जानकारियां दर्ज होनी चाहिए, ताकि यह साफ रहे कि किस इलाके से कब और कितना सौर कचरा निकलने वाला है।


















