अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई हालिया तेज गिरावट भारतीय शेयर बाजार और देश की प्रमुख निर्माण एवं विपणन कंपनियों के लिए एक नए समीकरण तैयार कर रही है। वैश्विक स्तर पर ब्रेंट क्रूड अपने 52 हफ्तों के 98 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर से करीब 26 प्रतिशत तक फिसलकर 72 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के आसपास पहुंच चुका है, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI क्रूड 70 डॉलर प्रति बैरल से नीचे चला गया है। कच्चे तेल के भाव में इस तरह का सतत दबाव भारत जैसे विशाल आयातक देश के लिए लागत घटाने और कई औद्योगिक क्षेत्रों के वित्तीय मार्जिन को दुरुस्त करने का बड़ा मौका माना जा रहा है। घरेलू बाजार में खासकर तेल वितरण कंपनियों के साथ-साथ कच्चे माल के रूप में पेट्रोकेमिकल्स का इस्तेमाल करने वाले पेंट और ऑटोमोटिव टायर उत्पादक इस स्थिति का सीधा लाभ उठाने की स्थिति में दिख रहे हैं।
तेल विपणन कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन पर अनुकूल असर
भारत सरकार के स्वामित्व वाली तेल विपणन कंपनियां कच्चे तेल के निचले स्तरों का सीधा लाभ रिफाइनिंग और मार्केटिंग मार्जिन के विस्तार के रूप में देखती हैं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होता है, तो कंपनियों की खरीद लागत घटती है जबकि खुदरा बिक्री से मिलने वाला नकदी प्रवाह मजबूत बना रहता है। बीते एक साल के दौरान सरकारी तेल उपक्रमों के शेयरों ने निवेशकों को पहले ही शानदार रिटर्न दिया है। हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी HPCL ने पिछले एक साल में 245 प्रतिशत का जोरदार रिटर्न दिया है। ठीक इसी तरह ऑयल इंडिया ने 240 प्रतिशत, चेन्नई पेट्रोलियम ने 76 प्रतिशत और ONGC ने 63 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की है।
इसी कड़ी में भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी BPCL ने 99 प्रतिशत और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन यानी IOC ने 84 प्रतिशत का रिटर्न दर्ज कराया है। ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें मौजूदा स्तरों के इर्द-गिर्द बनी रहती हैं और इनमें तत्काल किसी तेज उछाल के संकेत नहीं दिखते, तो इन तेल विपणन कंपनियों की बैलेंस शीट और रिफाइनिंग मार्जिन में आने वाले समय में लगातार स्थिरता बनी रहेगी, जिससे उनके शेयरों में चल रही तेजी को आगे भी सहारा मिल सकता है।
पेंट और टायर निर्माण कंपनियों के लिए कच्चा माल सस्ता होने की राहत
कच्चे तेल की नरमी का लाभ केवल तेल कंपनियों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उन उद्योगों के लिए भी राहत लेकर आता है जो पेट्रोलियम आधारित उत्पादों को अपने प्रमुख कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करते हैं। पेंट और टायर उद्योग इस बदलाव के सबसे बड़े लाभार्थी माने जाते हैं, क्योंकि उनकी उत्पादन लागत का एक बड़ा हिस्सा क्रूड डेरिवेटिव्स पर निर्भर करता है। जब कच्चे तेल के भाव घटते हैं, तो इन कंपनियों की इनपुट कॉस्ट कम हो जाती है, जिससे इनके ऑपरेटिंग मार्जिन में सुधार होता है और परिचालन दक्षता बढ़ती है।
बीते एक वर्ष के दौरान पेंट क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों जैसे एशियन पेंट्स और बर्जर पेंट्स के शेयरों का प्रदर्शन लगभग सपाट रहा है, जबकि कंसाई नेरोलैक के शेयर मूल्य में करीब 9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इस पृष्ठभूमि में वित्तीय सेवा प्रदाता मास्टर कैपिटल का मानना है कि कच्चे तेल की लागत घटने से पेंट निर्माताओं के खर्चों में उल्लेखनीय कमी आएगी, जो आने वाली तिमाहियों में कंपनियों को अपना मुनाफा बढ़ाने और शेयर बाजार में अपने पिछले कमजोर प्रदर्शन से उबरने में मदद कर सकती है।
दूसरी ओर, टायर निर्माता पहले से ही बाजार में सकारात्मक गति बनाए हुए हैं। पिछले एक साल में बालकृष्ण इंडस्ट्रीज, सिएट, अपोलो टायर्स और जेके टायर एंड इंडस्ट्रीज के शेयरों में 22 प्रतिशत से लेकर 62 प्रतिशत तक की बढ़त देखी गई है। सिंथेटिक रबर और कार्बन ब्लैक जैसे कच्चे माल की कीमतों में नरमी आने से इन कंपनियों के मार्जिन में अतिरिक्त विस्तार देखने को मिल सकता है, जो उनके सकारात्मक स्टॉक प्रदर्शन को और मजबूती प्रदान करेगा।
वैश्विक मांग में कमजोरी और चीन की घटती खपत का दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में आई यह भारी गिरावट मुख्य रूप से दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं, अमेरिका और चीन, से आए कमजोर आर्थिक आंकड़ों और सुस्त पड़ती मांग की चिंताओं के कारण देखने को मिली है। तेल व्यापारियों और वैश्विक निवेशकों में इस बात को लेकर चिंता बढ़ रही है कि बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति की स्थिति बन सकती है। दुनिया में कच्चे तेल के सबसे बड़े आयातकों में शामिल चीन की मांग में स्पष्ट कमी आई है। हालांकि जुलाई की तुलना में वहां के आयात में मामूली सुधार हुआ था, लेकिन सालाना आधार पर चीन का कच्चा तेल आयात 7 प्रतिशत घटकर 49.1 मिलियन टन पर आ गया।
चीन में तेल की मांग घटने की एक बड़ी वजह वहां इलेक्ट्रिक वाहनों और स्वच्छ ईंधन का तेजी से बढ़ता उपयोग भी है। इसके अलावा, कम मार्जिन के चलते चीन की छोटी रिफाइनरियों में परिचालन क्षमता का कम इस्तेमाल हुआ है, जिसने तेल की खपत को और धीमा कर दिया है। इन तमाम कारकों के कारण उत्पन्न बिकवाली के दबाव ने ब्रेंट क्रूड को दो साल से अधिक समय में पहली बार 70 डॉलर प्रति बैरल के नीचे धकेल दिया था।
ओपेक के उत्पादन संबंधी फैसले और अंतरराष्ट्रीय अनुमान
मोतीलाल ओसवाल की एक रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में यह तीव्र गिरावट उस समय आई है जब ओपेक ने उत्पादन बढ़ाने की अपनी पूर्व निर्धारित योजना को दो महीने के लिए टालने का निर्णय लिया था। पेट्रोलियम निर्यातक देशों का यह संगठन मांग को लेकर आशान्वित तो बना हुआ है, लेकिन उसने चीन में कमजोर मांग का हवाला देते हुए वर्ष 2024 के लिए वैश्विक मांग वृद्धि के अनुमान को 2.11 मिलियन बैरल प्रतिदिन से घटाकर 2.03 मिलियन बैरल प्रतिदिन कर दिया है। वर्ष 2025 के लिए संगठन का मांग वृद्धि अनुमान 1.74 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर स्थिर बना हुआ है।
अपनी नवीनतम बाजार रिपोर्ट में ओपेक ने मजबूत उपभोक्ता खर्च के दम पर वैश्विक आर्थिक वृद्धि के अनुमान को 2.9 प्रतिशत से बढ़ाकर 3.0 प्रतिशत किया है। हालांकि, संगठन ने यह भी दर्ज किया कि अगस्त में कुल कच्चे तेल के उत्पादन में 1,97,000 बैरल प्रतिदिन की गिरावट आई, जिससे कुल दैनिक उत्पादन 26.59 मिलियन बैरल रह गया। इसके बावजूद इराक और कजाकिस्तान जैसे उत्पादक देशों द्वारा तय कोटे से अधिक उत्पादन किए जाने के कारण आपूर्ति को संतुलित रखने का प्रयास जटिल बना हुआ है।
ओपेक ने वर्ष 2024 के दौरान चीन की तेल मांग वृद्धि के अपने अनुमान को भी पहले के 7,00,000 बैरल प्रतिदिन से घटाकर 6,50,000 बैरल प्रतिदिन कर दिया है, क्योंकि वहां तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी LNG से चलने वाले ट्रकों और इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। वित्तीय सलाहकार फर्म केडिया एडवाइजरी ने भी रेखांकित किया है कि हरित ईंधन की ओर झुकाव और चीन के रियल एस्टेट क्षेत्र के संकट ने वैश्विक मांग को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है, जिससे ब्रेंट क्रूड मार्च 2023 के बाद के निचले स्तरों यानी 71 डॉलर से नीचे के दायरे में कारोबार करता दिखा है।
भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की खपत का मजबूत घरेलू परिदृश्य
वैश्विक स्तर पर छाई सुस्ती के विपरीत भारतीय घरेलू बाजार में ऊर्जा की मांग काफी मजबूत स्थिति में दर्ज की गई है। जुलाई 2024 में देश के भीतर कुल पेट्रोलियम उत्पादों की खपत में सालाना आधार पर 7.2 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। वित्तीय वर्ष 2024-25 के पहले चार महीनों के आंकड़ों को देखें तो कुल पेट्रोलियम उत्पाद खपत 40.6 मिलियन मीट्रिक टन रही, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 3 प्रतिशत अधिक है।
इस अवधि में प्रमुख ईंधनों की खपत के आंकड़े देश के भीतर औद्योगिक और व्यक्तिगत गतिशीलता की पुष्टि करते हैं। डीजल की खपत 2.1 प्रतिशत बढ़कर 31.5 मिलियन मीट्रिक टन पर पहुंच गई, जबकि पेट्रोल की मांग में 7.8 प्रतिशत का उछाल आया और यह 6.7 मिलियन मीट्रिक टन रही। यात्रा और विमानन क्षेत्र में लौटी रौनक के चलते एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी ATF की खपत में 11.9 प्रतिशत की तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे यह 1.5 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच गया। इसके साथ ही लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस यानी LPG की खपत 5.6 प्रतिशत बढ़कर 4.75 मिलियन मीट्रिक टन दर्ज की गई।
भारतीय अर्थव्यवस्था और इक्विटी बाजारों के लिए दीर्घकालिक चुनौतियां
यद्यपि कच्चे तेल की सस्ती कीमतें भारतीय कंपनियों के लिए तत्काल राहत लेकर आती हैं, लेकिन अमेरिकी ब्रोकरेज फर्म मॉर्गन स्टेनली ने इस संदर्भ में सतर्कता बरतने की सलाह दी है। ब्रोकरेज का मानना है कि कच्चे तेल में गिरावट की अवधि और उसके पीछे के वास्तविक कारणों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। यदि तेल के दामों में यह कमी व्यापक वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते हो रही है, तो भारत को मिलने वाला सकारात्मक लाभ सीमित हो सकता है। अमेरिका और चीन जैसे प्रमुख बाजारों में मंदी अंततः वैश्विक व्यापार को प्रभावित करेगी, जिसका अप्रत्यक्ष असर भारत के विकास परिदृश्य पर भी पड़ सकता है।
मॉर्गन स्टेनली के विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि तेल बाजार का नकारात्मक रुख वैश्विक मांग में कमी से उपजा है। यह परिस्थिति अल्पावधि में भारत के व्यापार संतुलन को सुधारने में मददगार साबित हो सकती है, लेकिन दीर्घकालिक नजरिए से भारतीय शेयर बाजारों का प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करेगा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था आने वाले समय में किस दिशा में आगे बढ़ती है। इस प्रकार, निवेशकों के लिए मौजूदा बाजार परिदृश्य लागत घटने के तात्कालिक अवसरों और वैश्विक मंदी के जोखिमों का एक मिला-जुला संतुलन प्रस्तुत कर रहा है।
















