तेलंगाना के सूखे मौसम और पथरीली जमीन में इन दिनों एक ऐसा फल किसानों की किस्मत चमका रहा है, जिसे कभी सिर्फ जंगलों या खेतों की मेड़ों की उपज माना जाता था। हम बात कर रहे हैं सीताफल यानी कस्टर्ड एप्पल की। देश में महाराष्ट्र के बाद अब तेलंगाना के अन्नदाता भी इसकी कमर्शियल खेती की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। इस फसल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें लागत बहुत कम आती है, पानी की जरूरत न के बराबर होती है और बंदर या आवारा मवेशी भी इसे नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। यही वजह है कि यह राज्य के सूखे इलाकों के लिए सबसे सही फसल बन गई है।
किन जिलों में होती है सबसे ज्यादा पैदावार
तेलंगाना के महबूबनगर, रंगारेड्डी, विकराबाद, नलगोंडा, मेंडक और नागरकुरनूल ऐसे जिले हैं जहां सीताफल का बंपर उत्पादन होता है। खासकर महबूबनगर और विकराबाद के पहाड़ी और सूखे क्षेत्रों में यह पौधे प्राकृतिक रूप से भी बहुतायत में उगते हैं। अब यहां के किसान पुरानी देसी किस्मों को छोड़कर बालानगर, एनएमके-1 यानी गोल्डन और आर्का सहन जैसी आधुनिक किस्मों की घनी बागवानी कर रहे हैं जिससे उनकी आमदनी में काफी इजाफा हुआ है।
खेती का सही तरीका और समय
तेलंगाना में सीताफल के बाग लगाने के लिए जून से सितंबर का महीना सबसे उत्तम माना जाता है। यह फसल लाल बलुई, पथरीली या हल्की दोमट मिट्टी में आसानी से पनप जाती है, बशर्ते खेत में पानी न जमे। हमेशा सितंबर के महीने में नर्सरी से तैयार किए गए मजबूत ग्राफ्टेड पौधे या पॉलीबैग वाले पौधे ही खेत में उतारने चाहिए, सीधे बीज बोने से हमेशा बचना चाहिए। खेत की तैयारी के दौरान पांच गुणा पांच मीटर या फिर घनी बागवानी के तहत चार गुणा चार मीटर की दूरी पर दो गुणा दो फीट के गड्ढे खोदे जाते हैं और उनमें गोबर की खाद डाली जाती है। अगस्त की मानसूनी बारिश के साथ ही कलमी पौधों को जमीन में रोपा जाता है। यह पौधा सूखा झेलने में पूरी तरह सक्षम है और ड्रिप इरिगेशन के जरिए बेहद कम पानी में भी बेहतरीन पैदावार दे देता है।
लागत कम और मुनाफा बंपर
पौधे लगाने के ठीक दो से तीन साल के भीतर ही फल आने शुरू हो जाते हैं। मानसून के मौसम में फूलों के आने के बाद नवंबर से दिसंबर के बीच फल पूरी तरह पककर कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं। इस सीजन के दौरान हैदराबाद की प्रमुख फल मंडियों और मोअज्जम जाही मार्केट में विकराबाद और महबूबनगर के मीठे सीताफल की जबरदस्त डिमांड रहती है। आइसक्रीम और पल्प बनाने वाले उद्योगों में इसकी लगातार बढ़ती मांग के चलते किसानों को एक एकड़ की खेती से दो से तीन लाख रुपये तक का शुद्ध फायदा मिल रहा है।



















