इतिहास के पन्नों को पलटें तो एक ऐसा वस्त्र नजर आता है जिसने करीब दो सौ वर्षों तक पूरी दुनिया को अपना मुरीद बनाए रखा था और जिसे धरती का सबसे महंगा कपड़ा होने का गौरव प्राप्त था। प्राचीन ग्रीस के दौर में इस विशेष कपड़े को इतनी पवित्रता दी जाती थी कि वहां की देवियों की मूर्तियों को सजाने के लिए केवल इसी मलमल का प्रयोग किया जाता था। दुनिया भर के तमाम देशों की महारानियां अपने शाही पहनावे में ढाका की इस नायाब मलमल को शामिल करना अपनी शान का बड़ा प्रतीक मानती थीं।
बुनी हुई हवा और उसकी अद्भुत महीनी
ढाका की मलमल किसी आम सूती कपड़े की श्रेणी में नहीं आती थी। यह वस्त्र इतना अधिक बारीक, हल्का और कोमल होता था कि राजदरबार के कवियों ने इसे पहली बार देखते ही इसे बफ्त हवा की संज्ञा दी थी, जिसका शाब्दिक अर्थ बुनी हुई हवा होता था। इसे देखकर ऐसा आभास होता था मानो हवा के ठंडे झोंकों को ही धागे में पिरोकर कोई वस्त्र गढ़ दिया गया हो। इसकी बारीकी का पैमाना इतना हैरान करने वाला था कि तीन सौ फीट लंबा मलमल का वस्त्र भी एक छोटी सी अंगूठी के बीच से आसानी से आर-पार निकल जाता था। उस कालखंड के एक विदेशी यात्री ने अपने यात्रा वृत्तांत में जिक्र किया था कि साठ फीट लंबा यह कपड़ा इतना सूक्ष्म होता था कि उसे तह करके तंबाकू या इत्र रखने वाली एक बेहद छोटी सी डिबिया के भीतर आसानी से समेटा जा सकता था।
ब्रिटिश राजघरानों से लेकर शाही दरबारों तक का सफर
भारत के भीतर इस मलमल का उपयोग मुख्य रूप से शाही कुर्ते और साड़ियां तैयार करने में किया जाता था, लेकिन जब यह कपड़ा ब्रिटेन और यूरोप के बाजारों में पहुंचा तो वहां के उच्च वर्ग का प्रमुख पहनावा बन गया। यह वस्त्र अपनी अत्यधिक पारदर्शिता के कारण कई बार अपने पहनने वाले को लोगों की हंसी का पात्र भी बना देता था, इसके बावजूद इसकी लोकप्रियता में कभी कोई गिरावट नहीं आई। वर्ष 1851 के आसपास जब इसकी मांग अपने चरम पर थी, तब एक गज मलमल का मूल्य पचास पाउंड से लेकर चार सौ पाउंड तक आंका जाता था। आज के समय की महंगाई के लिहाज से यह राशि लाखों रुपये बैठती है। फ्रांस की महारानी मैरी एंटोनेट, नेपोलियन की अर्धांगिनी साम्राज्ञी बोनापार्ट और प्रख्यात लेखिका जेन ऑस्टिन जैसी शख्सियतें ढाका की इस मलमल की मुग्ध प्रशंसक थीं।
सिर्फ बंगाल की मिट्टी में उगने वाला फुटी करपास
ढाका की मलमल को तैयार करने वाली कपास कोई साधारण उपज नहीं थी। इसका वैज्ञानिक नाम गोसिपियम आर्बरियम था, जिसे स्थानीय बोलचाल में फुटी करपास कहा जाता था। इस विशिष्ट पौधे की कृषि केवल और केवल तत्कालीन भारतीय बंगाल यानी मौजूदा बांग्लादेश की मेघना नदी के तटीय इलाकों में ही संभव थी। वहां की भौगोलिक आबोहवा और भूमि की तासीर में कुछ ऐसा अनोखापन था कि साल में दो मर्तबा इस पौधे पर नरगिस जैसे मनमोहक पीले पुष्प खिलते थे। इन फूलों से निकलने वाली अत्यंत श्वेत और हल्की कपास से ही मलमल के धागे का निर्माण होता था। दुनिया के किसी अन्य भूभाग पर इस कपास को उगाना नामुमकिन था और आज यह प्रजाति इस पृथ्वी से पूरी तरह विलुप्त हो चुकी है।
सोलह कठिन चरणों से गुजरकर तैयार होता था धागा
ढाका की मलमल का निर्माण कार्य किसी एक अकेले इंसान के बस का नहीं था। यह पूरी प्रक्रिया सोलह प्रकार के जटिल चरणों से गुजरने के बाद मुकम्मल होती थी। ढाका के आसपास बसे अनेक गांवों में इस कार्य के अलग-अलग पड़ाव पूरे किए जाते थे। सबसे पहले खेतों से संग्रहित कपास के नन्हे गोलों की सफाई का जिम्मा होता था। यह सफाई बोआल नामक मछली के तीखे दांतों से निर्मित विशेष कंघों की सहायता से की जाती थी ताकि इसके रेशे किसी भी प्रकार सुरक्षित रहें। इसके पश्चात इसे धुनने और कातने का थका देने वाला सिलसिला शुरू होता था जिसमें अत्यधिक परिश्रम की आवश्यकता पड़ती थी।
नदियों की लहरों पर नौकाओं के भीतर कताई
मलमल के सूत की कताई को संसार का सबसे कठिन कार्य माना जाता था। इस नाजुक धागे को बनाने के वास्ते बहुत अधिक नमी की दरकार होती थी। यदि हवा में सूखापन रहता था तो सूत खिंचने से पहले ही टूट जाता था। यही वजह थी कि बुनकर यह काम जमीन पर किसी बंद कमरे में करने के बजाय मेघना नदी के प्रवाह के बीच नौकाओं पर बैठकर अंजाम देते थे। सूत कातने का समय भी पूरी तरह निर्धारित था। यह कार्य या तो भोर के वक्त किया जाता था अथवा ढलती हुई दोपहर में, क्योंकि उस अंतराल में हवा के भीतर आर्द्रता अपने उच्चतम स्तर पर होती थी। इस पेचीदा काम के लिए केवल युवा स्त्री और पुरुषों को ही लगाया जाता था। वृद्ध लोग सूत नहीं कातते थे क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ उनकी दृष्टि कमजोर हो जाती थी और मलमल का धागा इतना महीन होता था कि क्षीण नजरों से उसे संभालना असंभव सा था।
मशीनों की पहुंच से दूर रहने वाली धागे की खासियत
फुटी कपास के रेशे लंबाई में छोटे होते थे और उनसे बना हुआ धागा थोड़ा नाजुक होने के साथ जगह-जगह गांठदार भी होता था। धागे के मध्य पाई जाने वाली ये सूक्ष्म गांठें पूरे रेशे को मजबूती के साथ बांधे रखती थीं। इसी विशेषता की वजह से कपड़े की सतह पर एक हल्का सा प्राकृतिक खुरदरापन रहता था जो त्वचा को बेहद शानदार और रेशमी अहसास कराता था। चूँकि इसके रेशे छोटे आकार के थे, इसलिए इसे कभी भी मशीनों के माध्यम से नहीं बुना जा सकता था।
जलपरियों के करिश्मे का भ्रम और हैरान करने वाला थ्रेड काउंट
इस अद्भुत वस्त्र को देखने वाले लोगों को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होता था कि इसे इंसानी हाथों ने गढ़ा होगा। उस दौर में अनेक विदेशी व्यापारी और पर्यटक यह धारणा बना चुके थे कि रात्रि के सन्नाटे में परियां, जलपरियां या अलौकिक शक्तियां आकर इस कपड़े को बुनती हैं। वर्तमान समय में बाजार में उपलब्ध सर्वोत्तम मलमल का थ्रेड काउंट चालीस से अस्सी के बीच होता है, परंतु यह जानकर आश्चर्य होगा कि सैकड़ों वर्ष पूर्व मानव हाथों द्वारा बुनी गई ढाका की मलमल का थ्रेड काउंट आठ सौ से बारह सौ के मध्य हुआ करता था।



















