फरीदाबाद के खेतों में दिन-रात पसीना बहाने वाले किसानों की राह कभी आसान नहीं होती। जब फसल पककर तैयार होती है और बाजार में पहुंचती है, तो कई बार किसानों को उनकी कड़ी मेहनत का उचित मेहनताना नहीं मिल पाता है। कभी बेमौसम बारिश और प्राकृतिक आपदाएं फसल को बर्बाद कर देती हैं, तो कभी स्थानीय मंडियों में उपज के भाव इतने गिर जाते हैं कि लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है। कुछ ऐसी ही संघर्षपूर्ण दास्तान फरीदाबाद के डीग गांव की एक महिला किसान की है, जिन्होंने अपनी फसलों को बचाने और आमदनी बढ़ाने के लिए खेती के पारंपरिक तरीकों में बदलाव किया, लेकिन इसके बावजूद उनकी आर्थिक चिंताएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। इस महिला किसान ने अपनी फसल को बरसात के मौसम की मार से बचाने के लिए एक नया तरीका अपनाया, लेकिन इसके बाद भी उनके परिवार के सामने जीवनयापन का संकट बना हुआ है और बच्चों के भविष्य को लेकर चिंताएं गहरी हैं।
मचान और जाल पर खेती का नया प्रयोग
डीग गांव की रहने वाली किसान सुनीता ने एक एकड़ जमीन पर घीया की खेती की है। पारंपरिक तरीके से किसान घीया को जमीन पर ही फैला देते हैं, लेकिन सुनीता ने इस बार फसल को जमीन पर फैलाने के बजाय उसे विशेष रूप से तैयार किए गए जाल और मचान पर चढ़ाने का फैसला किया। जमीन पर घीया की बेलें फैलने से बरसात के मौसम में जलभराव और कीचड़ के कारण फसल के सड़ने तथा खराब होने का खतरा बहुत ज्यादा रहता है। मचान या जाल पर खेती करने से घीया की बेलें जमीन से ऊपर सुरक्षित रहती हैं, जिससे बारिश के दिनों में भी फसल को होने वाला नुकसान काफी हद तक कम हो जाता है। अपनी फसल को मौसम की मार से महफूज रखने के लिए ही उन्होंने खेती के इस आधुनिक और उन्नत तरीके को अपनाया है, ताकि पैदावार की गुणवत्ता बेहतर बनी रहे।
लागत और मेहनत ज्यादा, पर मुनाफा कम
मचान पर खेती करने की वजह से घीया की पैदावार तो ठीक-ठाक हो रही है, लेकिन बाजार में इस फसल का उचित मूल्य अभी भी किसानों को नहीं मिल पा रहा है। बल्लभगढ़ मंडी में वर्तमान में घीया मात्र 15 रुपये प्रति किलो के भाव बिक रहा है। किसानों का मानना है कि यदि यही रेट बढ़कर 30 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाए, तो खेती करने वालों को कुछ वास्तविक मुनाफा हो सकता है। मौजूदा बाजार दरों का फायदा मुख्य रूप से बिचौलियों और आढ़तियों को मिल रहा है, जबकि असली मेहनत करने वाले किसान को उसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। इतनी अधिक मेहनत और जद्दोजहद के बाद भी परिवार का गुजारा करना बेहद कठिन हो रहा है। सुनीता के अनुसार, जाल पर घीया उगाने में लागत भी काफी ज्यादा आती है और शारीरिक श्रम भी बहुत अधिक करना पड़ता है। केवल एक एकड़ जमीन पर खेती करने में ही करीब 60 से 70 हजार रुपये की लागत बैठ जाती है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान लगभग 50 मजदूरों की सहायता लेनी पड़ी है। इसके अलावा, जाल पर फसल उगाने के बाद भी कीड़े और कीटों के लगने की समस्या बनी रहती है, जिससे बचाव के लिए लगातार कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करना जरूरी हो जाता है। इस पूरी खेती में जमीन की पांच बार जुताई करवानी पड़ती है और एक एकड़ क्षेत्र में लगभग 3 किलो बीज की आवश्यकता होती है।
डॉक्टर बनने का सपना क्यों रह गया अधूरा
सुनीता बताती हैं कि वह पिछले कई वर्षों से लगातार खेती-किसानी से जुड़ी हुई हैं, लेकिन आज तक उन्हें खेती से ऐसा कोई बड़ा मुनाफा हाथ नहीं लगा जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आ सके। कभी मौसम की बेरुखी उनकी पूरी फसल को चौपट कर देती है, तो कभी बाजार में मिलने वाले भाव इतने कम होते हैं कि लागत भी पूरी नहीं हो पाती। हाल ही में उनके परिवार को तब एक और बड़ा झटका लगा जब बेमौसम ओलावृष्टि की वजह से उनकी गेहूं की फसल भी पूरी तरह बर्बाद हो गई। सुनीता के परिवार में उनके दो बेटे हैं। उनका बड़ा बेटा बारहवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी कर चुका है और छोटा बेटा भी बारहवीं कक्षा में ही अध्ययनरत है। बड़ा बेटा पढ़ाई में होनहार था और वह डॉक्टर बनना चाहता था। अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उसने मेडिकल प्रवेश परीक्षा यानी नीट की परीक्षा में भी हिस्सा लिया था। उसने कुल तीन बार यह परीक्षा दी, लेकिन परिवार की अत्यंत कमजोर आर्थिक स्थिति आड़े आ गई और उसका डॉक्टर बनने का अरमान अधूरा रह गया। एक बार तो नीट की परीक्षा भी किन्हीं कारणों से रद्द हो गई थी, जिसके चलते बेटे की पढ़ाई का बहुमूल्य समय हाथ से निकलता चला गया और उम्र की सीमा व संसाधनों के अभाव ने सारे रास्ते बंद कर दिए।
खेती से जुड़ी उम्मीदें और भविष्य की चुनौतियां
सुनीता का कहना है कि उनके परिवार के पास इतने वित्तीय संसाधन नहीं हैं कि वे किसी निजी मेडिकल कॉलेज की भारी-भरकम फीस का भुगतान कर सकें। अब उनके परिवार की सारी उम्मीदें केवल इसी खेती-किसानी से जुड़ी हुई हैं। यदि उनकी घीया की फसल को बाजार में सही और वाजिब दाम मिल जाए, तो उनकी आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार हो सकता है और परिवार को राहत मिल सकती है। उनकी बस यही इच्छा है कि खेती से उन्हें इतना पर्याप्त मुनाफा हो सके जिससे उनके घर का दैनिक खर्च आसानी से चल सके और उनके छोटे बेटे की पढ़ाई भी सुचारू रूप से पूरी हो पाए। किसानों की मेहनत का सही और पूरा मूल्य मिलना बेहद जरूरी है, क्योंकि एक किसान केवल खेत में कोई साधारण फसल नहीं उगाता, बल्कि वह अपने पूरे परिवार के सुनहरे भविष्य के सपनों को भी अपनी माटी में बोता है।



















