हर महीने आता मोटा बिजली बिल और बीच-बीच में होने वाली कटौती अब घरों को छत पर सोलर पैनल लगाने की तरफ धकेल रही है। लेकिन सोलर लगवाने का फैसला सिर्फ पैनल खरीदने तक सीमित नहीं है, सबसे बड़ा सवाल यह है कि आपके घर की जरूरत के हिसाब से कौन-सा सिस्टम सही बैठेगा। सही चुनाव से न सिर्फ हर महीने का बिजली खर्च नीचे आता है, बल्कि कुछ सालों में अच्छी-खासी बचत भी जुड़ जाती है। साथ ही यह बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिजली बनाने का एक भरोसेमंद तरीका भी है।
बाजार में मुख्य रूप से तीन तरह के सोलर सिस्टम मिलते हैं, ऑन-ग्रिड, ऑफ-ग्रिड और हाइब्रिड। आपके घर की खपत के हिसाब से 1 kW से लेकर 10 kW या उससे ज्यादा क्षमता का सिस्टम लगाया जा सकता है। इसकी कुल लागत इसी क्षमता और इस्तेमाल हुई तकनीक पर टिकी होती है। इसके अलावा केंद्र सरकार की पीएम सूर्य घर योजना के तहत एलिजिबल उपभोक्ताओं को सब्सिडी मिलती है, जिससे जेब पर पड़ने वाला बोझ काफी हल्का हो जाता है।
ऑन-ग्रिड सिस्टम, सबसे सस्ता और सबसे चलन में
तीनों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला और किफायती विकल्प ऑन-ग्रिड है। इसमें छत पर लगे सोलर पैनल इन्वर्टर के जरिए सीधे बिजली ग्रिड से जुड़े रहते हैं। दिन में पैनल जो बिजली बनाते हैं, वह घर की जरूरतें पूरी करती है और जो बच जाती है उसे नेट मीटरिंग के जरिए ग्रिड में भेज दिया जाता है। इसी वजह से बिजली बिल काफी घट जाता है और कई बार तो लगभग जीरो तक पहुंच जाता है। हालांकि इसमें एक पेच है, इस सिस्टम में बैटरी नहीं होती, इसलिए जैसे ही बिजली कटती है, सुरक्षा कारणों से यह भी काम करना बंद कर देता है।
ऑफ-ग्रिड सिस्टम, जहां बिजली का भरोसा नहीं
जिन इलाकों में बिजली की सप्लाई नियमित नहीं रहती या घंटों कटौती चलती है, वहां के घरों के लिए ऑफ-ग्रिड सिस्टम ज्यादा काम का माना जाता है। यह पूरी तरह बिजली ग्रिड से अलग चलता है। छत के पैनल दिन में बिजली बनाते हैं और उसे बैटरी में जमा कर लिया जाता है, फिर रात में या बिजली न होने पर यही बैटरी घर को सप्लाई देती रहती है।
इसका एक नुकसान शुरुआती खर्च है। बैटरी बैंक लगाना जरूरी होने की वजह से इसकी लागत बाकी विकल्पों से ज्यादा बैठती है। ऊपर से बैटरियों की देखभाल और समय-समय पर उन्हें बदलवाने का अलग खर्च भी जुड़ता है। एक और बात, अगर बैटरी पूरी तरह चार्ज हो जाए और घर में खपत कम हो, तो बची हुई बिजली बेकार चली जाती है। इसीलिए यह सिस्टम खासतौर पर उन्हीं जगहों के लिए सही है जहां बिजली सीमित रहती है और बैकअप की जरूरत सबसे ज्यादा होती है।
हाइब्रिड सिस्टम, दोनों का मेल
हाइब्रिड सिस्टम ऑन-ग्रिड और ऑफ-ग्रिड दोनों तकनीकों को मिलाकर बनता है, इसलिए इसे सबसे एडवांस और सुविधाजनक माना जाता है। इसमें सोलर पैनल, बैटरी और बिजली ग्रिड तीनों आपस में जुड़े रहते हैं। दिन में बनी बिजली पहले घर में इस्तेमाल होती है, बची हुई बैटरी में जमा हो जाती है और बैटरी भरने के बाद जो बचता है वह ग्रिड में चला जाता है। बिजली कटने पर बैटरी बैकअप घर को चालू रखता है। यही वजह है कि इसमें न बिजली बर्बाद होती है और न ही पूरी तरह बैटरी या ग्रिड पर निर्भर रहना पड़ता है।
कितने किलोवाट का सिस्टम चाहिए
सिस्टम का साइज तय करने के लिए सबसे पहले अपना पिछले महीने का बिजली बिल देखिए। मान लीजिए 30 दिनों में 500 यूनिट का बिल आया है, तो इसका मतलब रोजाना औसतन 16 से 17 यूनिट खपत हो रही है, और इसी हिसाब से क्षमता तय की जाती है।
खर्च की बात करें तो 2 किलोवाट तक का सिस्टम लगवाने पर केंद्र सरकार 78000 रुपये की सब्सिडी देती है। हरियाणा जैसे कुछ राज्यों में इसके ऊपर अलग से स्टेट सब्सिडी भी मिलती है। 3 किलोवाट के सिस्टम का खर्च सब्सिडी के बाद करीब 120000 रुपये बैठ सकता है। आपके राज्य में कितनी सब्सिडी मिलेगी, इसकी सटीक जानकारी के लिए राज्य के बिजली विभाग की वेबसाइट जरूर चेक करें। लंबे समय में सोलर लगवाने पर बिजली बिल लगभग जीरो हो जाता है, बस इंस्टॉलेशन किसी सर्टिफाइड कंपनी से और पूरी प्लानिंग के साथ करवाएं। ध्यान रहे कि यह आधिकारिक जानकारी नहीं है, इसलिए और कौन-कौन से खर्च आ सकते हैं, यह उसी कंपनी से पूछ लें जिससे आप सोलर सिस्टम लगवा रहे हैं।













