अमेरिकी प्रशासन द्वारा विदेशी कर्मियों के लिए स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम से कई दिग्गज प्रौद्योगिकी कंपनियों को निलंबित किए जाने के बाद भारतीय तकनीकी क्षेत्र में इस कदम के संभावित प्रभाव को लेकर गहन पड़ताल शुरू हो गई है। बाजार के शुरुआती विश्लेषणों से स्पष्ट संकेत मिलता है कि भारतीय आईटी फर्मों के दैनिक कामकाज और संगठनात्मक ढांचे पर इस प्रतिबंध की गाज बहुत सीमित दायरे में ही गिरेगी। इसका बुनियादी कारण यह है कि भारतीय सॉफ्टवेयर सेवा प्रदाताओं ने अमेरिकी वित्त वर्ष 2026 में ग्रीन कार्ड प्रायोजन के नए आवेदनों की रफ्तार पहले ही बेहद सुस्त कर दी थी, जिसके चलते इस प्रशासनिक कार्रवाई का जमीनी असर मामूली रहने की उम्मीद है।
आठ प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों के खिलाफ वॉशिंगटन का सख्त फैसला
अमेरिकी अधिकारियों ने गुरुवार को एक कड़ा कदम उठाते हुए भारत के शीर्ष सॉफ्टवेयर निर्यातकों समेत आठ बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों पर कार्रवाई की। इस निलंबन सूची में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), इन्फोसिस, विप्रो और एचसीएल टेक जैसी अग्रणी भारतीय आईटी फर्मों के साथ-साथ कैपजेमिनी, कॉग्निजेंट, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी शामिल हैं। ये सभी प्रतिष्ठान दुनिया भर में और विशेष रूप से अमेरिका में बड़े पैमाने पर भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को रोजगार मुहैया कराते हैं। अमेरिकी प्रशासन ने इस निलंबन के पीछे तर्क दिया है कि कंपनियों द्वारा इस विदेशी नियुक्ति कार्यक्रम का व्यापक इस्तेमाल किए जाने से स्थानीय अमेरिकी नागरिकों के लिए उपलब्ध रोजगार के अवसरों में गिरावट आ रही है।
टीसीएस और अन्य भारतीय फर्मों के आवेदनों में अभूतपूर्व गिरावट
स्थायी श्रम प्रमाणन यानी पीईआरएम (PERM) व्यवस्था के आधिकारिक आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि भारतीय आईटी दिग्गजों की ग्रीन कार्ड पर निर्भरता बहुत तेजी से घटी है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) ने अमेरिकी वित्त वर्ष 2026 में ग्रीन कार्ड हासिल करने के लिए महज 2 आवेदन दाखिल किए हैं। यह आंकड़ा पिछले वर्षों की तुलना में भारी गिरावट को दर्शाता है, क्योंकि कंपनी ने वित्त वर्ष 2025 में 513 आवेदन और वर्ष 2024 में 1804 आवेदन प्रस्तुत किए थे।
इसी तरह की प्रवृत्ति एचसीएल टेक के मामलों में भी साफ देखी जा सकती है। एचसीएल टेक ने वर्ष 2026 में केवल 59 आवेदन किए, जबकि ठीक एक साल पहले वित्त वर्ष 2025 में इसकी संख्या 323 दर्ज की गई थी। विप्रो की स्थिति को देखें तो कंपनी ने वर्ष 2024 में 257 आवेदन दाखिल किए थे, जिनमें से 169 आवेदनों को खारिज कर दिया गया था और कंपनी ने स्वयं 88 आवेदन वापस खींच लिए थे। इसके बाद वर्ष 2025 में विप्रो ने 523 आवेदन किए। इन्फोसिस ने वर्ष 2024 में इस कार्यक्रम के तहत 87 आवेदन जमा किए थे, हालांकि उसके 2025 और 2026 के आवेदन संबंधी आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हो सके हैं।
कुल पीईआरएम प्रमाणपत्रों में भारतीय फर्मों की बेहद सीमित हिस्सेदारी
एचसीएल टेक के पूर्व सीईओ विनीत नायर ने इस प्रशासनिक कदम के जमीनी प्रभाव पर रोशनी डालते हुए एक सोशल मीडिया मंच पर अपने विचार साझा किए। विनीत नायर ने लिखा, "पिछले साल जारी किए गए 1,17,849 PERM सर्टिफिकेट में भारतीय आईटी कंपनियों की हिस्सेदारी 1400 से भी कम थी। ये 2 प्रतिशत से कम है। इसलिए इसका प्रत्यक्ष प्रभाव शुरुआती अनुमान से कम हो सकता है।" उनके इस विश्लेषण से यह साफ होता है कि वैश्विक स्तर पर स्वीकृत होने वाले कार्य प्रमाण पत्रों की विशाल संख्या के सामने भारतीय तकनीकी फर्मों का कोटा नगण्य स्तर पर सिमट चुका था।
वैश्विक तकनीकी कंपनियों के आंकड़े और प्रमाणन प्रक्रिया का महत्व
पीईआरएम ट्रैकर वेबसाइट द्वारा दर्ज किए गए रिकॉर्ड के अनुसार बहुराष्ट्रीय आईटी फर्म कैपजेमिनी ने वित्त वर्ष 2026 में 98 आवेदन दिए, जबकि वर्ष 2025 में 361 और वर्ष 2024 में 300 आवेदन किए गए थे। दूसरी तरफ कॉग्निजेंट ने वर्ष 2024 के दौरान 1236 आवेदन दाखिल किए थे, जिसके बाद वर्ष 2025 और 2026 के लिए उसका डेटा उपलब्ध नहीं है।
अमेरिका के श्रम विभाग की निगरानी में चलने वाला स्थायी श्रम प्रमाणन दरअसल वह कानूनी दस्तावेज है जो किसी भी नियोक्ता को किसी विदेशी नागरिक को अमेरिका में स्थायी नौकरी पर रखने का वैधानिक अधिकार प्रदान करता है। जो तकनीकी पेशेवर विभिन्न वर्क वीजा श्रेणियों के तहत अमेरिका में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उनके लिए ग्रीन कार्ड अर्थात स्थायी निवास का दर्जा पाने की लंबी कानूनी यात्रा का यह पीईआरएम आवेदन पहला अनिवार्य चरण होता है।

















