डिजिटल दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बने फर्जी और भ्रामक कंटेंट की पहचान को आसान बनाने के लिए गूगल ने मंगलवार को एक नई वेबसाइट की शुरुआत की है। इस सार्वजनिक ऑनलाइन टूल की मदद से अब कोई भी सामान्य यूजर किसी भी फोटो, वीडियो या ऑडियो क्लिप को अपलोड करके यह जान सकता है कि उसे एआई टूल्स की मदद से तैयार किया गया है अथवा नहीं। पिछले साल गूगल आई/ओ सम्मेलन के दौरान कंपनी ने इस तकनीक को परीक्षण के तौर पर केवल चुनिंदा पत्रकारों, मीडिया पेशेवरों और शोधकर्ताओं को उपलब्ध कराया था, लेकिन अब इस डिटेक्शन टूल को पूरी दुनिया के आम लोगों के लिए खोल दिया गया है।
विभिन्न फाइल फॉर्मेट्स की जांच करने की क्षमता
जांच प्रक्रिया को व्यापक और सुलभ बनाने के लिए इस वेब पोर्टल पर मल्टीमीडिया फॉर्मेट्स की एक लंबी सूची का समर्थन दिया गया है। तस्वीरों की बात करें तो यूजर जेपीजी, जेपीईजी, पीएनजी, बीएमपी, वेबपी, एवीआईएफ, एचईआईसी, एचईआईएफ, टीआईएफएफ, टीआईएफ और जीआईएफ फॉर्मेट वाली फाइलों की जांच कर सकते हैं। वहीं वीडियो श्रेणी में यह टूल एमपी4, एमओवी और वेबएम फाइलों का विश्लेषण करने में सक्षम है। इसके अतिरिक्त ऑडियो क्लिप्स की प्रामाणिकता जांचने के लिए पोर्टल वेव, एमपी3, ओजीजी, फ्लैक, एएसी और एम4ए जैसे प्रमुख फॉर्मेट्स को सपोर्ट करता है, जिससे लगभग हर तरह का डिजिटल कंटेंट आसानी से परखा जा सकता है।
सिन्थआईडी तकनीक और तकनीकी कंपनियों का सहयोग
कंटेंट की पहचान करने के लिए गूगल अपनी सिन्थआईडी वाटरमार्किंग तकनीक का उपयोग कर रहा है, जिसे कंपनी ने पहली बार साल 2023 में पेश किया था। गूगल के कई प्रमुख जेनेरेटिव मॉडल जैसे नैनो बनाना, वेओ और लिरिया, तथा जेमिनी, फ्लो, प्रोड्यूसरएआई और विड्स जैसे डिजिटल निर्माण उपकरण अपने बनाए हर मीडिया कंटेंट पर सिन्थआईडी वाटरमार्क दर्ज करते हैं। सिर्फ गूगल ही नहीं, बल्कि ओपनएआई, एनवीडिया और काकाओ जैसी कंपनियां भी सिन्थआईडी तकनीक का समर्थन करती हैं, जिसमें ओपनएआई कंटेंट की पड़ताल के लिए अपनी अलग साइट भी संचालित करता है। इसके अलावा एप्पल द्वारा भी जल्द ही इस तकनीक का समर्थन जोड़ने की बात सामने आई है।
ब्राउजर इंटीग्रेशन और मौजूदा चुनौतियां
गूगल ने कंटेंट वेरिफिकेशन की इस सुविधा को सीधे अपने जेमिनी ऐप और गूगल क्रोम ब्राउजर के अंदर भी एकीकृत कर दिया है। आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में लोग सामग्री की सत्यता परखने के लिए प्रतिदिन 10 लाख वेरिफिकेशन रिक्वेस्ट भेज रहे हैं। तकनीक जगत में माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी अन्य दिग्गज कंपनियों ने भी डिजिटल वाटरमार्किंग और कंटेंट वेरिफिकेशन के अपने अलग मानक तैयार किए हैं। हालांकि, ये सभी डिटेक्शन टूल पूरी तरह अचूक नहीं हैं और अक्सर खुद अपने ही मॉडल्स द्वारा तैयार की गई सामग्री की सही पहचान करने में चूक जाते हैं।



















