इंटरनेट प्लेटफॉर्म्स पर आतंकी नेटवर्क और हिंसक गतिविधियों पर लगाम कसने के मकसद से बने वैश्विक मंच ग्लोबल इंटरनेट फोरम टू काउंटर टेररिज्म (जीआईएफसीटी) में एक बड़ा आंतरिक संकट पैदा हो गया है। तकनीकी दिग्गज मेटा की अगुवाई में तैयार की गई एक नई कार्ययोजना के विरोध में इस संगठन की स्वतंत्र सलाहकार समिति के कई विशेषज्ञ सदस्यों ने एक साथ अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। इन विशेषज्ञों का आरोप है कि बड़ी टेक कंपनियों ने निष्पक्ष जांच और वास्तविक जवाबदेही से बचने के लिए निगरानी व्यवस्था को ही पंगु बनाने का रास्ता चुन लिया है।
जुलाई के संदेश से भड़का आंतरिक टकराव
इस बड़े गतिरोध की शुरुआत जुलाई महीने में उस समय हुई जब मेटा में कंटेंट पॉलिसी मामलों की उपाध्यक्ष नेल मैक्कार्थी ने स्वतंत्र सलाहकारों को एक विस्तृत ईमेल भेजा। वर्षों से आतंकवाद निरोध और अभिव्यक्ति की आजादी के क्षेत्र में काम कर रहे ये विशेषज्ञ संगठन को सलाह दे रहे थे कि कैसे विभिन्न सोशल मीडिया सेवाओं को हिंसक और चरमपंथी संगठनों का सुरक्षित ठिकाना बनने से रोका जाए। इस साल जीआईएफसीटी के ऑपरेटिंग बोर्ड की कमान मेटा के हाथों में है, जिसके चलते उसके पास नीतिगत बदलावों को आगे बढ़ाने का बहुत बड़ा प्रभाव है, हालांकि ऐसे फैसलों पर पैनल में शामिल अन्य साझीदार कंपनियों की अंतिम सहमति जरूरी होती है।
नेल मैक्कार्थी ने अपने ईमेल में स्पष्ट संकेत दिया कि यह मंच चरमपंथ और हिंसा के बदलते तौर-तरीकों पर विशेषज्ञों के सुझावों का तो स्वागत करता रहेगा, लेकिन बड़ी तकनीकी कंपनियों द्वारा हिंसा रोकने के लिए उठाए जा रहे कदमों के असर की बारीक जांच अब उसे स्वीकार्य नहीं है। मेटा और समूह के अन्य बड़े अगुआ लगभग छह साल पुरानी इस स्वतंत्र सलाहकार समिति के ढांचे को पूरी तरह बदलना चाहते थे। इस बदलाव का सीधा मतलब यह निकाला गया कि टेक मंचों के प्रदर्शन पर बाहरी विशेषज्ञों की नजर रखने की व्यवस्था को खत्म कर दिया जाए।
संरचना में बदलाव और अधिकार छीनने की तैयारी
सलाहकार समिति के सदस्यों की नाराजगी की मुख्य वजह चयन प्रक्रिया और उसके कार्यक्षेत्र में किए जा रहे बदलाव हैं। इससे पहले तक इस रोटेटिंग समिति में नए सदस्यों का चुनाव मौजूदा सदस्य ही वोटिंग या सहमति के आधार पर करते आए थे। लेकिन जुलाई की योजना के तहत नई व्यवस्था यह बनाई गई कि अब नए सदस्यों का चयन खुद तकनीकी कंपनियां करेंगी। इसके अलावा समिति के स्वतंत्र अधिकारों पर कई नई पाबंदियां लगाने की बात कही गई।
प्रस्तावित नियमों के तहत इस निकाय को गठबंधन के कामकाज के मूल्यांकन, बजट, संचालन व्यवस्था या किसी विशिष्ट कंपनी की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करने से रोक दिया जाएगा। समिति को सामूहिक रूप से एक मंच के तौर पर औपचारिक सिफारिशें जारी करने की अनुमति भी नहीं होगी। सलाहकारों का मानना है कि इन बदलावों के बाद यह समूह एक निष्पक्ष वॉचडॉग की जगह केवल नाममात्र का मंच बनकर रह जाएगा। योजना में इस निकाय का नाम 'कमेटी' से बदलकर केवल एक ढीला-ढाला 'कम्युनिटी' करने की भी बात कही गई है।
इस्तीफे की चिट्ठी में कड़ा विरोध और अविश्वास
समिति छोड़ने वाले सदस्यों ने अपने संयुक्त त्यागपत्र में तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया है। उन्होंने लिखा कि संगठन के शीर्ष नेतृत्व ने उनकी आपत्तियों और दलीलों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। इसी कारण वे जीआईएफसीटी के उस मूल मिशन पर से अपना भरोसा खो चुके हैं, जिसके तहत आतंकी तत्वों को ऑनलाइन सेवाओं का दुरुपयोग करने से रोकने का संकल्प लिया गया था।
इस्तीफा देने वाले विशेषज्ञों ने अपनी चिट्ठी में साफ तौर पर कहा कि जो संस्था किसी नीति की पड़ताल नहीं कर सकती, कोई साझा रुख तय नहीं कर सकती या असर का निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं कर सकती, उसे किसी भी सूरत में सलाहकार संस्था नहीं माना जा सकता। सदस्यों के मुताबिक ऐसा ढांचा केवल एक सजावटी व्यवस्था और जवाबदेही का दिखावा बनकर रह जाता है।
जीआईएफसीटी का पक्ष और बड़े साझेदार
इस विवाद पर मेटा ने किसी सीधी टिप्पणी से परहेज करते हुए मामला जीआईएफसीटी प्रबंधन के पाले में डाल दिया। संगठन के नेतृत्व और मेटा की अध्यक्षता वाले ऑपरेटिंग बोर्ड की तरफ से जारी एक अनाम बयान में दावा किया गया कि प्रस्तावित बदलाव अभी अंतिम रूप से लागू नहीं हुए हैं और इन पर कई दौर का फीडबैक लिया जा चुका है। बयान के अनुसार यह पूरी कवायद नागरिक समाज और विभिन्न सरकारों से ज्यादा प्रभावी ढंग से सुझाव हासिल करने के इरादे से की जा रही है, क्योंकि अलग-अलग पक्षों की भागीदारी इस संगठन का बुनियादी सिद्धांत रही है।
जीआईएफसीटी की स्थापना इंटरनेट से आतंकी प्रचार सामग्री हटाने के तालमेल के लिए हुई थी और आज इसमें लगभग 35 तकनीकी कंपनियां शामिल हैं। मेटा के अलावा माइक्रोसॉफ्ट और यूट्यूब जैसी दिग्गज कंपनियां लंबे समय से इसके बोर्ड में बनी हुई हैं। एक छोटा आंतरिक स्टाफ चरमपंथी और हिंसक सामग्री को लेकर सदस्यों को अलर्ट भेजता है, सुरक्षा खतरों से जुड़े डेटा का आदान-प्रदान सुगम बनाता है और चरमपंथ से निपटने के तौर-तरीकों पर शोध कराता है। हालांकि जानकारों का कहना है कि यह गठबंधन अपनी वास्तविक क्षमताओं और वादों पर पूरी तरह खरा नहीं उतर सका है।
तकनीकी खामियां और एआई के नए खतरे
इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि में वर्ष 2024 के दौरान सामने आई वे कमियां भी हैं, जिनमें जीआईएफसीटी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हुए थे। उस समय यह बात सामने आई थी कि मेटा ने टिकटॉक की सदस्यता की अर्जी को लटकाए रखा था और संचालन कंपनियों व बिना वेतन काम करने वाली स्वतंत्र सलाहकार संस्था के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हो चुके थे। साथ ही कंपनियों के बीच संदिग्ध सामग्री हटाने के लिए बनाए गए टिप-शेयरिंग डेटाबेस में भी कई तरह की नाकामी उजागर हुई थी।
सलाहकारों का हटना ऐसे संवेदनशील समय में हुआ है जब जनरेटिव एआई के उभार ने इंटरनेट सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन साधना बहुत कठिन बना दिया है। नए एआई टूल्स ने खतरनाक सामग्री बनाने का काम बेहद आसान कर दिया है, जबकि उनके दुरुपयोग को रोकने के सुरक्षा घेरे अभी बहुत सीमित हैं। इस्लामिक स्टेट जैसे संगठनों का प्रचार अब एआई निर्मित स्वरूप में भी फैल रहा है, जो एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। इसके साथ ही नए संकीर्ण अराजक समूह युवाओं को हिंसक ब्लैकमेल और सेक्सप्लॉयटेशन जैसे अपराधों में फंसाने के लिए एआई का सहारा ले रहे हैं, और कई एआई चैटबॉट्स पर भी हिंसा भड़काने में मददगार होने के आरोप लगे हैं।
राजनीतिक दबाव और भविष्य की दिशा
इस्तीफा देने वाले विशेषज्ञों में कई प्रमुख विश्वविद्यालयों के शोधकर्ता और नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हैं। उन्होंने यह स्वीकार किया कि लगभग एक दशक पुराने इस गठबंधन के नतीजों को बेहतर बनाने के लिए बदलाव जरूरी थे, लेकिन मेटा की अगुवाई वाला वर्तमान प्रस्ताव स्थिति को सुधारने के बजाय पीछे ले जाने वाला कदम है। इस मसले पर बाहर आए एक विशेषज्ञ ने कहा कि जीआईएफसीटी क्या कर रहा है और क्या नहीं, इस पर टोकने वाली आलोचनात्मक आवाजें अब संगठन से गायब हो जाएंगी। तात्कालिक रूप से स्वतंत्र समिति को खत्म करना राजनीतिक रूप से सुविधाजनक लग सकता है, लेकिन लंबी अवधि में इसका पछतावा होगा।
एक अन्य सदस्य ने अफसोस जताते हुए कहा कि टेक कंपनियों को मूल्यांकन और पारदर्शिता को मजबूत करने पर काम करना चाहिए था, लेकिन इसके उलट उन्होंने पहले से कमजोर आजादी को भी खत्म करने का रास्ता चुन लिया। इन विशेषज्ञों ने नाम न छापने की शर्त पर अपनी बात रखी, क्योंकि उन्हें राजनीतिक बदले की कार्रवाई का डर है। ट्रंप प्रशासन ऐसे लोगों के वीजा रद्द करने जैसे कड़े कदम उठा चुका है जिन पर ऑनलाइन अभिव्यक्ति को अनुचित ढंग से दबाने का संदेह जताया गया था, वहीं अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन सदस्य तथाकथित सेंसरशिप समूहों की जांच कर रहे हैं। हालांकि जीआईएफसीटी को सीधे निशाना नहीं बनाया गया था, लेकिन हाउस ज्यूडिशियरी कमेटी की फरवरी की एक रिपोर्ट में इस गठबंधन और एक सलाहकार के संगठन का नाम दर्ज था।
उस रिपोर्ट के कुछ ही समय बाद आयोजित एक बैठक में सलाहकार समिति ने मेटा सहित अन्य शीर्ष टेक अधिकारियों से पूछा था कि सामग्री नियंत्रण को लेकर बने इस तनावपूर्ण राजनीतिक माहौल में गठबंधन की क्या रणनीति होगी। उपस्थित लोगों के अनुसार समिति को कोई सीधा जवाब नहीं मिला, बल्कि उनके सवालों को उनके दायरे से बाहर बताकर दबा दिया गया। इसके करीब तीन महीने बाद ही जुलाई में मेटा की तरफ से अधिकारों में कटौती वाला ईमेल भेजा गया। समिति में कुल 17 सदस्य थे, जिनमें संयुक्त राष्ट्र और कनाडा व यूरोपीय संघ जैसी सरकारों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। हालांकि चार विशेषज्ञों ने इस्तीफे में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन समिति के सभी 17 सदस्यों ने पहले ही एक साझा पत्र लिखकर मेटा की इस योजना का कड़ा विरोध किया था। विशेषज्ञों का मानना है कि नई व्यवस्था में जो भी लोग आएंगे, वे भी जल्दी ही इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि जीआईएफसीटी का वर्तमान मॉडल अब अपनी प्रासंगिकता खो चुका है।


















