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कातरला में इंसानों के परिवार जैसे पले 125 से ज्यादा हिरण, चना और बाजरा खिलाने दूर-दूर से आते हैं लोगराजस्थान
29 सित॰ 2026, 9:24 am (42 मिनट पहले)· 0

कातरला में इंसानों के परिवार जैसे पले 125 से ज्यादा हिरण, चना और बाजरा खिलाने दूर-दूर से आते हैं लोग

बाड़मेर के कातरला गांव में ग्रामीण घायल हिरणों और पक्षियों का रेस्क्यू कर परिवार की तरह देखभाल करते हैं, जहां 125 से अधिक हिरण इंसानों से बेखौफ होकर घुलमिल जाते हैं।

राजस्थान के थार रेगिस्तान की तपती रेत और दूर तक फैले टीलों के बीच कुलांचे भरते हिरण मरुभूमि का चिरपरिचित नजारा पेश करते हैं। बाड़मेर जिले के कातरला गांव में इंसानों और वन्यजीवों का यह नाता केवल दूर से निहारने तक सीमित नहीं है। इस अनूठी बस्ती में कदम रखते ही वन्यजीवों के प्रति ग्रामीणों का अपनत्व साफ झलकता है, जहां हिरणों को महज बेजुबान जानवर न मानकर अपने सगे कुटुंब का सदस्य समझा जाता है। यहां इंसानों की आबादी से ज्यादा हिरणों की चहल-पहल आगंतुकों का ध्यान अपनी ओर खींचती है, और ये वन्यजीव इंसानों को देखते ही डरने के बजाय उनके साथ उछल-कूदकर अठखेलियां करने लगते हैं।

घायल जीवों के लिए सुरक्षित आशियाना बना कातरला

थार के विशाल मरुस्थल में इंसान और हिरण के इस आत्मीय रिश्ते की मिसाल आसपास के पूरे इलाके में दी जाती है। कातरला गांव के आसपास अगर कोई हिरण चोटिल, बीमार या लाचार हालत में मिल जाए, तो स्थानीय ग्रामीण उसे कभी जंगल में तड़पने के लिए नहीं छोड़ते। वे तुरंत उसे उठाकर अपने घर या संरक्षण स्थल पर लाते हैं, उसके घावों पर दवा-मरहम लगाते हैं और जब तक वह पूरी तरह तंदुरुस्त होकर दौड़ने लायक नहीं बन जाता, तब तक दिन-रात उसकी सेवा-टहल करते हैं। पशु-पक्षियों के प्रति इसी संवेदनशील माहौल का असर है कि बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, जालौर और प्रदेश के तमाम अन्य जिलों से लोग इन हिरणों के बीच समय बिताने और उनसे मिलने खिंचे चले आते हैं।

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अमृता देवी वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर में पल रहे 125 से अधिक हिरण

गांव में युवाओं के सामूहिक प्रयास से संचालित अमृता देवी वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर में इस समय 125 से अधिक हिरण रह रहे हैं। केंद्र से जुड़े सेवादार रामजीवन के अनुसार, यहां आने वाला कोई भी व्यक्ति इन हिरणों के एकदम पास बैठकर उनसे नजरें मिलाकर बातें कर सकता है। इंसानी दुलार के इतने अभ्यस्त हो चुके ये हिरण किसी से घबराते नहीं हैं, बल्कि प्यार से पुकारते ही खुद चलकर पास आ जाते हैं। आगंतुक जब अपनी हथेलियों पर चना और बाजरा रखकर आगे बढ़ाते हैं, तो हिरण बड़े चाव से दाना चुगते हैं और कई बार खुशी में उछलकर व्यक्ति की कमर तक आकर खड़े हो जाते हैं। स्थानीय युवाओं ने साल 2020 में संगठित होकर इस अमृता देवी वन्यजीव संस्थान की नींव रखी थी। इसका मुख्य उद्देश्य अवैध शिकारियों और आवारा श्वानों के हमलों से घायल होने वाले, सड़क दुर्घटनाओं का शिकार बनने वाले तथा बीमारियों से ग्रस्त हिरणों को बचाकर सुरक्षित इलाज मुहैया कराना था।

हिरणों के साथ पक्षी और अन्य बेजुबान भी पाते हैं नया जीवन

इस संरक्षण संस्थान में सिर्फ हिरण ही नहीं, बल्कि घायल नीलगाय, खरगोश, कछुए और मोर व कबूतर जैसे कई तरह के पक्षी भी उपचार के लिए लाए जाते हैं। यहां आने वाले तमाम पर्यटक और वन्यजीव प्रेमी इन दुर्लभ पलों को अपने कैमरों और मोबाइलों में सहेजते हैं। हालांकि, सेवादारों का कहना है कि असली सुकून स्क्रीन छोड़कर प्रकृति और इन बेजुबानों को अपनी खुली आंखों से देखने और महसूस करने में है। सेवादार रामजीवन बताते हैं कि उनके लिए ये केवल जंगली जीव नहीं हैं, बल्कि परिवार के अपने सदस्य हैं। जिस तरह घर के किसी सदस्य के बीमार या चोटिल होने पर चिंता होती है, ठीक उतनी ही फिक्र और तड़प गांव के हर बाशिंदे के दिल में इन हिरणों और पक्षियों के लिए हमेशा बनी रहती है।

सवाल-जवाब

कातरला गांव कहां स्थित है और यह किस बात के लिए जाना जाता है?
कातरला गांव राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित है, जहां ग्रामीण घायल हिरणों और पक्षियों का रेस्क्यू कर उन्हें अपने परिवार की तरह पालते हैं।
अमृता देवी वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर में इस समय कितने हिरण मौजूद हैं?
इस रेस्क्यू सेंटर में वर्तमान में 125 से ज्यादा हिरण सुरक्षित रूप से रह रहे हैं।
कातरला में इस वन्यजीव संस्थान की शुरुआत कब और किसने की थी?
इस संस्थान की शुरुआत साल 2020 में कातरला गांव के स्थानीय युवाओं ने मिलकर की थी।
रेस्क्यू सेंटर में हिरणों के अलावा और किन जीवों का इलाज किया जाता है?
यहां हिरणों के अलावा घायल नीलगाय, खरगोश, कछुए तथा मोर व कबूतर जैसे पक्षियों का भी इलाज किया जाता है।
यहां आने वाले लोग हिरणों को क्या खिलाते हैं?
आगंतुक हिरणों को अपने हाथों से चना और बाजरा खिलाते हैं, जिसे वे बहुत चाव से खाते हैं।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·16 मिनट पहले

बाड़मेर की इस यात्रा में जब एक हिरण ने मेरी हथेली से चना खाया, तो लगा ही नहीं कि वह कोई जंगली जीव है। यहाँ के लोगों का प्यार सचमुच अद्भुत है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·15 मिनट पहले

रोहन जी, वाकई वो अहसास बहुत खास होता है जब कोई बेजुबान बिना डरे आपके पास आ जाए।

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