इंफोसिस में बड़े बदलाव की तैयारी, 2027 से आशीष कुमार डैश होंगे कंपनी के नए CEOलाइव: जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बीच कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में सरकार के साथ बैठक करेगी CJPकच्चे तेल में तेजी और नए टैरिफ के खतरों से थमी बिटकॉइन की रफ्तार, जानिए क्या कहते हैं तकनीकी संकेतयूरो ज़ोन मैन्युफैक्चरिंग PMI में अप्रत्याशित उछाल, भू-राजनीतिक संकट से करेंसी और क्रिप्टो की तेजी पर ब्रेकमूलांक 6 दैनिक अंकज्योतिष: कार्यक्षेत्र में बढ़ाएं अपना फोकस और फिजूलखर्ची पर लगाएं लगाममूलांक 6 का रहस्य: जानिए क्यों 6, 15 और 24 तारीख को जन्मे लोगों को मिलती है अपार दौलत, प्यार और लग्जरी लाइफलाइव: जहाजों के मार्ग पर बढ़ते टकराव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच तेज हुए सैन्य हमलेअखिलेश यादव ने 'जड़' और 'फल' के रूपक से भाजपा पर साधा निशाना, देश की समस्याओं के लिए ठहराया जिम्मेदारमूलांक 4 और 7 वाले लोगों के जीवन में क्यों आती हैं अचानक मुसीबतें? जानिए राहु-केतु के प्रभाव और बचने के उपाययूरोज़ोन में शानदार PMI आंकड़ों के बावजूद यूरो पर दबाव, ट्रंप के टैरिफ और मध्य पूर्व संकट से डॉलर मजबूत
भारत की ओर विदेशी निवेशकों का भारी रुख: जापान, सिंगापुर और मॉरीशस से आया सबसे ज्यादा निवेशव्यापार
23 जुल॰ 2026, 1:31 pm (2 दिन पहले)· 0

भारत की ओर विदेशी निवेशकों का भारी रुख: जापान, सिंगापुर और मॉरीशस से आया सबसे ज्यादा निवेश

वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच विदेशी निवेशकों ने एक बार फिर भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरा भरोसा जताया है। रिज़र्व बैंक (RBI) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) 6.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग, रिटेल और बैंकिंग जैसे प्रमुख सेक्टर्स में जमकर पूंजी लगाई जा रही है।

पिछले कुछ समय से वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण विदेशी निवेशकों ने एक बेहद सतर्क रवैया अपना लिया था, जिसके चलते वे भारतीय बाजारों से अपना पैसा बाहर निकाल रहे थे। हालांकि, अब इस परिदृश्य में एक बहुत बड़ा और सकारात्मक बदलाव आ गया है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा जारी किए गए नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशक पूरी ताकत के साथ भारतीय बाजार में लौट आए हैं। सबसे खास बात यह है कि यह नया निवेश केवल शेयर बाजार में मुनाफा कमाने के उद्देश्य से नहीं आ रहा है, बल्कि देश की वास्तविक अर्थव्यवस्था के मुख्य स्तंभों जैसे कि बैंकिंग, मैन्युफैक्चरिंग, रिटेल और अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी सेक्टर्स में किया जा रहा है। भारत के आम नागरिकों और देश की अर्थव्यवस्था के लिए, जापान, सिंगापुर और मॉरीशस जैसे देशों से आ रही यह भारी भरकम पूंजी एक बहुत बड़े आर्थिक अवसर और लंबी अवधि के मजबूत भरोसे का प्रतीक है।

विदेशी निवेश (FDI) में 6.5 अरब डॉलर का शानदार उछाल

विदेशी निवेशकों के इस सुधरे हुए नजरिए की स्पष्ट झलक भारतीय रिज़र्व बैंक के जुलाई बुलेटिन में प्रकाशित 'स्टेट ऑफ द इकॉनमी' रिपोर्ट के आंकड़ों में देखी जा सकती है। इस रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा वित्तीय वर्ष 2026-27 के बेहद महत्वपूर्ण अप्रैल और मई महीनों के दौरान, भारत में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) 6.5 अरब डॉलर के प्रभावशाली आंकड़े तक पहुंच गया। इस वृद्धि की असल अहमियत को समझने के लिए पिछले वित्तीय वर्ष की इसी समान अवधि के आंकड़ों को देखना होगा, जब शुद्ध FDI मात्र 2.47 अरब डॉलर पर था। इसका सीधा अर्थ यह है कि महज एक साल के छोटे से अंतराल में, देश में आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में लगभग ढाई गुना की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

ये भी पढ़ें

अर्थव्यवस्था को समझने के लिए FDI और सामान्य निवेश के बीच का अंतर जानना जरूरी है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) तब होता है जब कोई विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनी भारत में अपनी कोई भौतिक फैक्टरी स्थापित करती है, किसी स्थानीय भारतीय कंपनी में रणनीतिक रूप से बड़ी हिस्सेदारी खरीदती है, या फिर लंबी अवधि के व्यापार विस्तार के लिए अपनी पूंजी लगाती है। यह शेयर बाजार में होने वाली रोजमर्रा की खरीद-बिक्री से पूरी तरह अलग है, जिसे निवेशक जब चाहें मिनटों में बाहर निकाल सकते हैं। चूंकि FDI के तहत पैसा भौतिक संपत्तियों, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और दीर्घकालिक व्यापारिक ऑपरेशंस में लगाया जाता है, इसलिए अर्थशास्त्री इसे किसी भी देश की आर्थिक स्थिरता और भविष्य के विकास पर विदेशी निवेशकों के सबसे गहरे और स्थायी भरोसे का सूचक मानते हैं।

दुनिया भर के निवेशक भारत पर क्यों जता रहे हैं भरोसा?

RBI की इस विस्तृत रिपोर्ट में उन प्रमुख कारणों पर भी प्रकाश डाला गया है, जिनकी वजह से वैश्विक निवेशक भारत की विकास गाथा पर एक बार फिर से भारी दांव लगा रहे हैं। इनमें सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत आज भी वैश्विक मंच पर दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूती से बनाए हुए है। देश का औद्योगिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और सर्विस सेक्टर दोनों ही लगातार बेहतरीन और स्थिर प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, देश के भीतर उपभोक्ताओं की मांग बहुत मजबूत बनी हुई है और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी एक बेहद आरामदायक और सुरक्षित स्थिति में है, जो किसी भी बाहरी आर्थिक संकट से निपटने के लिए एक ढाल का काम करता है।

आज जब दुनिया का एक बड़ा हिस्सा गंभीर भू-राजनीतिक तनावों, बढ़ती महंगाई और आर्थिक सुस्ती का सामना कर रहा है, तब भी भारत के भीतर आर्थिक गतिविधियां पूरी रफ्तार से चल रही हैं और वे इन वैश्विक परेशानियों से काफी हद तक अछूती रही हैं। इस सकारात्मक माहौल को और बढ़ावा देने का काम भारत सरकार की वह आक्रामक रणनीति कर रही है, जिसके तहत दुनिया के कई देशों के साथ लगातार नए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं। ये व्यापारिक समझौते वैश्विक निवेशकों को एक मजबूत संदेश दे रहे हैं कि भारत वैश्विक सप्लाई चेन का एक अहम हिस्सा बनने और एक पारदर्शी व्यापारिक माहौल देने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।

जापान, सिंगापुर और मॉरीशस से निवेश की बारिश

जब इस भारी भरकम पूंजी के स्रोत का विश्लेषण किया जाता है, तो RBI के आंकड़े मुख्य रूप से तीन देशों की ओर इशारा करते हैं। भारत में विदेशी निवेश लाने के मामले में जापान, सिंगापुर और मॉरीशस ने बाकी सभी को पीछे छोड़ दिया है। केंद्रीय बैंक के विश्लेषण के मुताबिक, समीक्षाधीन अवधि के दौरान भारत में आए कुल इक्विटी निवेश का 74 प्रतिशत हिस्सा केवल इन्हीं तीन देशों से प्राप्त हुआ है।

इन तीनों देशों से आने वाले निवेश के पीछे अलग-अलग रणनीतिक कारण हैं। पिछले कुछ वर्षों से, जापानी बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन पर अपनी सप्लाई चेन की भारी निर्भरता को कम करने की एक सोची-समझी रणनीति पर काम कर रही हैं। इस बड़े रणनीतिक बदलाव में, भारत उनके लिए सबसे बेहतरीन और विशाल विकल्प के रूप में उभरकर सामने आया है। भारत के ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, भारी मशीनरी, लॉजिस्टिक्स और क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे अहम सेक्टर्स में जापानी कंपनियों की पहले से ही बहुत मजबूत पकड़ है। भारत सरकार के हालिया नीतिगत सुधारों से उत्साहित होकर, अब ये जापानी कंपनियां अपने मौजूदा ऑपरेशंस को बड़े पैमाने पर बढ़ा रही हैं और नई पूंजी निवेश कर रही हैं।

इस निवेश बूम में सिंगापुर की भूमिका उसके एशिया के सबसे बड़े फाइनेंशियल हब होने के कारण है। सिंगापुर से आने वाला सारा पैसा वहां का अपना नहीं होता, बल्कि यह देश एक बेहद कुशल फाइनेंशियल गेटवे के रूप में काम करता है। दुनिया भर की कई बड़ी ग्लोबल इन्वेस्टमेंट फर्म और बहुराष्ट्रीय कंपनियां कारोबार में आसानी और अनुकूल नियमों के कारण सिंगापुर स्थित संस्थाओं के जरिए भारत में अपना पैसा लगाती हैं। यही कारण है कि सिंगापुर हर साल भारत में विदेशी निवेश के सबसे बड़े स्रोतों में अपनी जगह पक्की रखता है।

इसी तरह, भारत के विदेशी निवेश परिदृश्य में मॉरीशस का ऐतिहासिक महत्व अब भी बरकरार है। भारत और मॉरीशस के बीच लंबे समय से चली आ रही टैक्स व्यवस्था और द्विपक्षीय निवेश समझौतों की बदौलत, बड़ी संख्या में विदेशी संस्थागत फंड पारंपरिक रूप से भारत में निवेश करने के लिए इस द्वीप राष्ट्र का इस्तेमाल एक रूटिंग हब के रूप में करते आए हैं। हालांकि हाल के वर्षों में टैक्स नियमों में कई तरह के बदलाव किए गए हैं, फिर भी विदेशी पूंजी को भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रवेश कराने के लिए मॉरीशस का रास्ता अभी भी निवेशकों की प्रमुख पसंद बना हुआ है।

इन चार सेक्टर्स में जा रहा है सबसे ज्यादा विदेशी पैसा

विदेशी निवेशकों द्वारा लाई जा रही यह पूंजी कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में बहुत अधिक केंद्रित है, जहां चार प्रमुख सेक्टर्स ने इस फंड का सबसे बड़ा हिस्सा अपनी ओर खींचा है। भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार, समीक्षाधीन अवधि में प्राप्त कुल विदेशी निवेश का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा केवल इन चार सेक्टर्स में ही गया है।

विदेशी पूंजी को आकर्षित करने में फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर निर्विवाद रूप से पहले स्थान पर रहा। ग्लोबल इन्वेस्टर्स ने भारत के घरेलू बैंकों, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFC), डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम, वेल्थ मैनेजमेंट फर्मों और इनोवेटिव फिनटेक स्टार्टअप्स में आक्रामक रूप से पैसा लगाया है। इस भारी निवेश के पीछे निवेशकों का यह विश्वास है कि भारत की तेजी से फैलती डिजिटल अर्थव्यवस्था और ग्रामीण तथा अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बढ़ती औपचारिक बैंकिंग सेवाओं की पहुंच आने वाले वर्षों में भारी वित्तीय मुनाफा दिलाएगी।

निवेशकों की दूसरी सबसे बड़ी पसंद मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर बनकर उभरा है। अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत में मोबाइल फोन, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, रक्षा उपकरणों और भारी औद्योगिक मशीनरी के उत्पादन में लगातार अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताएं बढ़ा रही हैं। विदेशी पूंजी को आकर्षित करने और घरेलू विनिर्माण को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में केंद्र सरकार की प्रमुख पहलों, विशेष रूप से 'मेक इन इंडिया' अभियान और बेहद सफल प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाओं ने एक निर्णायक भूमिका निभाई है।

इसके अलावा रिटेल सेक्टर में भी विदेशी फंड्स की भारी आवक देखी जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत बहुत तेजी से दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। देश के बढ़ते मध्यम वर्ग की अपार क्रय शक्ति को पहचानते हुए, विदेशी कॉर्पोरेशन्स संगठित रिटेल नेटवर्क, तेजी से फैलते ऑनलाइन शॉपिंग इकोसिस्टम और सप्लाई चेन इंफ्रास्ट्रक्चर के आधुनिकीकरण में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे हैं।

अंत में, टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत का पारंपरिक दबदबा आज भी ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए एक बहुत बड़ा आकर्षण बना हुआ है। IT सर्विसेज, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, क्लाउड कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल सेवाओं में भारत की बढ़ती विशेषज्ञता ने यह सुनिश्चित किया है कि टेक्नोलॉजी सेक्टर में विदेशी पूंजी का प्रवाह बिना किसी रुकावट के जारी रहे।

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की भी जोरदार वापसी

जहां एक ओर दीर्घकालिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बेहद सकारात्मक संरचनात्मक संकेत है, वहीं दूसरी ओर भारतीय बाजार में अल्पकालिक पूंजी प्रवाह में भी एक मजबूत पुनरुत्थान देखा जा रहा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI), जो मुख्य रूप से शेयर और बॉन्ड जैसी वित्तीय संपत्तियों में निवेश करते हैं, पूरी आक्रामकता के साथ भारतीय बाजारों में वापस लौट आए हैं। कुछ समय तक लगातार बिकवाली करने के बाद, जून 2026 के दौरान FPI भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार दोनों में शुद्ध खरीदार बन गए।

बाजार में खरीदारी की यह गति आगे भी बनी रही और तेज हुई है। 20 जुलाई तक, भारतीय बाजारों में FPI द्वारा किए गए कुल निवेश का आंकड़ा 3.1 अरब डॉलर के प्रभावशाली स्तर तक पहुंच गया। भारतीय रिज़र्व बैंक ने पोर्टफोलियो निवेशकों की इस शानदार वापसी के पीछे दो प्रमुख उत्प्रेरकों की पहचान की है। पहला, केंद्र सरकार और RBI द्वारा विशेष रूप से घरेलू डेट मार्केट (Debt Market) को मजबूत करने के लिए लाई गई नई और अनुकूल नीतियां, जिन्होंने फिक्स्ड-इनकम वाले विदेशी निवेश को भारी मात्रा में आकर्षित किया है। दूसरा, व्यापक वैश्विक बाजार में तनाव में आई कुछ कमी, जिसने विदेशी निवेशकों को भारत जैसे उच्च-विकास वाले उभरते बाजारों की ओर फिर से अपनी पूंजी लगाने के लिए प्रोत्साहित किया है।

सवाल-जवाब

अप्रैल-मई 2026 में भारत में कितना FDI आया?
वित्तीय वर्ष 2026-27 के अप्रैल और मई महीने में भारत में शुद्ध FDI 6.5 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि के 2.47 अरब डॉलर के मुकाबले लगभग ढाई गुना ज्यादा है।
भारत में सबसे ज्यादा निवेश किन तीन देशों ने किया?
इस दौरान भारत में आए कुल विदेशी इक्विटी निवेश का लगभग 74 प्रतिशत हिस्सा केवल जापान, सिंगापुर और मॉरीशस से आया है।
किस सेक्टर को सबसे ज्यादा विदेशी निवेश मिला?
सबसे ज्यादा निवेश फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर में आया है, जिसमें विदेशी कंपनियों ने बैंकों, NBFCs, फिनटेक और डिजिटल पेमेंट कंपनियों में भारी पूंजी लगाई है।
जापानी कंपनियां भारत में इतना निवेश क्यों कर रही हैं?
जापानी कंपनियां अपनी व्यापारिक रणनीति के तहत चीन पर अपनी निर्भरता कम कर रही हैं, जिससे भारत उनके लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स में एक बहुत बड़ा विकल्प बन गया है।
क्या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भी भारत में लौट रहे हैं?
हां, FPI भी भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार में शुद्ध खरीदार बनकर लौटे हैं, और उन्होंने 20 जुलाई 2026 तक 3.1 अरब डॉलर का निवेश किया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR