केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों में लंबे अंतराल के बाद की गई ताजा वृद्धि के तुरंत बाद कर्जदारों पर आगे और बड़ा बोझ पड़ने के संकेत सामने आने लगे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने बुधवार को रेपो दर में 0.25 प्रतिशत का इजाफा किया, जिससे यह प्रमुख नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत से बढ़कर सीधे 5.50 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। यह कदम देश में करीब 4 साल की अवधि में पहली बार दरें बढ़ाने के रूप में सामने आया है, जिसका सीधा असर सभी प्रकार के खुदरा और व्यावसायिक ऋणों की ब्याज दरों पर पड़ेगा। रिजर्व बैंक ने मौजूदा महंगाई की चुनौतियों को देखते हुए यह फैसला लिया है, लेकिन बाजार विश्लेषकों का कहना है कि यह सख्ती यहीं नहीं रुकने वाली है।
फरवरी 2023 के बाद का पहला सख्त कदम
इस फैसले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि देखें तो इससे पहले रिजर्व बैंक ने फरवरी 2023 में रेपो दर को 0.25 प्रतिशत बढ़ाया था, जिसके बाद यह दर 6.50 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। उस दौर के बाद से दरों में स्थिरता या ढील का रुख बना हुआ था, जो अब खत्म होता दिखाई दे रहा है। बुधवार के ताजा फैसले के बाद अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आने वाली मौद्रिक समीक्षाओं में केंद्रीय बैंक महंगाई पर लगाम लगाने के लिए और भी कड़े कदम उठा सकता है। ताजा वृद्धि केवल एक शुरुआती चरण हो सकती है, जिसके बाद ब्याज दरों का चक्र तेजी से ऊपर की तरफ घूम सकता है।
दिसंबर की समीक्षा में आधी फीसदी की बड़ी बढ़ोतरी का अनुमान
भारतीय स्टेट बैंक के अर्थशास्त्रियों ने अपने ताजा विश्लेषण में रेखांकित किया है कि रिजर्व बैंक दिसंबर में आयोजित होने वाली अगली मौद्रिक नीति बैठक में रेपो दर में 0.50 प्रतिशत की भारी वृद्धि का ऐलान कर सकता है। एसबीआई के अर्थशास्त्रियों के अनुसार, ताजा 0.25 प्रतिशत की वृद्धि के साथ नीतिगत रुख को सूझ-बूझ भरी सख्ती की दिशा में ले जाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि केंद्रीय बैंक आगे चलकर और अधिक आक्रामक रुख अपनाने के लिए जमीन तैयार कर रहा है। मौद्रिक समिति की प्राथमिक चिंता बढ़ती महंगाई को थामने की है, जिसके चलते आने वाले महीनों में उधार लेना काफी महंगा हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय आर्थिक अस्थिरता बन सकती है दर वृद्धि की बड़ी वजह
एसबीआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि घरेलू मुद्रास्फीति का दबाव बना रहता है, तो दिसंबर में 0.50 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि पूरी तरह संभव है। हालांकि रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि यह अंतिम निर्णय उस समय उभरने वाली वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर काफी हद तक निर्भर करेगा। विश्लेषण के अनुसार, आने वाले समय में दुनिया भर के आर्थिक हालात और अधिक अस्थिर तथा चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। ऐसी जटिल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का सामना करने के लिए रेपो दर को मौजूदा 5.50 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.00 प्रतिशत पर ले जाना नीति निर्माताओं के लिए एक बेहतर और सुरक्षित विकल्प साबित हो सकता है।
पहले से लग रहे थे कयास, पूंजी प्रवाह के लिए एआई नीति पर बल
बुधवार को हुई बैठक से पूर्व ही कई अर्थशास्त्री यह अनुमान लगा रहे थे कि केंद्रीय बैंक अक्टूबर और दिसंबर की बैठकों में 0.25-0.25 प्रतिशत की दो क्रमिक वृद्धियां कर सकता है। हालांकि अब परिस्थितियों को देखते हुए दिसंबर में एकमुश्त बड़ी वृद्धि की संभावना प्रबल मानी जा रही है। इसके साथ ही एसबीआई की रिपोर्ट में देश की मुद्रा को मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से एक स्पष्ट एआई नीति तैयार करने की आवश्यकता पर भी विशेष जोर दिया गया है। रिपोर्ट का आकलन है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर एक सुविचारित राष्ट्रीय नीति भारत में विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है, जिससे रुपये को भी आंतरिक और बाहरी समर्थन मिलेगा।

















