भविष्य की उन्नत तकनीकों, रक्षा साजो-सामान और स्वच्छ ऊर्जा के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों के मामले में विदेशी निर्भरता को समाप्त करने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को 2814 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग सपोर्ट स्कीम को अपनी आधिकारिक स्वीकृति दे दी। इस नीतिगत निर्णय की घोषणा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो टूक शब्दों में कहा कि देश के भविष्य को तय करने वाले अहम खनिजों की प्रोसेसिंग के लिए भारत को अन्य देशों पर आश्रित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने साफ किया कि भारत भविष्य की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए किसी भी विदेशी शक्ति के आगे हाथ नहीं फैलाएगा, बल्कि आवश्यक प्रसंस्करण क्षमताएं अपने ही देश में तैयार करेगा।
ईवी और रक्षा क्षेत्र के लिए रीढ़ हैं ये खनिज
आधुनिक औद्योगिक क्रांति के दौर में लिथियम, निकल और कोबाल्ट जैसे तत्वों को रणनीतिक संपत्ति और नए युग का सोना माना जाता है। इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी), ऊर्जा भंडारण बैटरियां, आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्र पूरी तरह से इन्हीं खनिजों पर टिके हुए हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि भारत कच्चे अयस्क से तैयार होने वाले रिफाइंड खनिजों के आयात पर अत्यधिक निर्भर बना हुआ है। प्रधानमंत्री ने इस पहलू को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि इस आयात निर्भरता को खत्म करने के लिए देश के भीतर ही आधुनिक प्रोसेसिंग संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। सरकार इन संयंत्रों की स्थापना के लिए वित्तीय प्रोत्साहन देगी, जिससे देश में घरेलू मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) बढ़ेगा और एक सुरक्षित आपूर्ति व्यवस्था कायम होगी।
ग्लोबल मोनोपॉली और आपूर्ति में रुकावट का जोखिम
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन महत्वपूर्ण खनिजों के खनन के बाद उनके शुद्धिकरण और रिफाइनिंग की पूरी प्रक्रिया पर चीन जैसे बहुत सीमित देशों का कड़ा नियंत्रण रहा है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव या कूटनीतिक गतिरोध के मौकों पर ऐसे देश आपूर्ति में व्यवधान डालकर अन्य देशों की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकट पैदा कर देते हैं। भारत में अब तक इन खनिजों को उपयोगी रसायनों और यौगिकों में बदलने वाले प्रोसेसिंग कारखानों की भारी कमी रही है। इसी बुनियादी कमजोरी को दूर करने के लिए यह नई पहल लाई गई है, ताकि देश को किसी भी अप्रत्याशित वैश्विक प्रतिबंध या झटके से सुरक्षित रखा जा सके।
पांच साल की योजना और 30 प्रतिशत की कैपिटल सब्सिडी
यह महत्वाकांक्षी परियोजना वित्त वर्ष 2026-27 से लेकर 2030-31 तक कुल पांच वर्षों की समयावधि में लागू की जाएगी। इस योजना के अंतर्गत निजी या संयुक्त क्षेत्र की जो भी कंपनियां देश में क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग यूनिट्स लगाएंगी, उन्हें कुल पूंजीगत निवेश का 30 प्रतिशत हिस्सा सरकारी सब्सिडी के रूप में प्रदान किया जाएगा। यह वित्तीय मदद तीन अलग-अलग किस्तों में वितरित की जाएगी, जिससे प्लांट निर्माण के हर चरण में कार्य की प्रगति सुनिश्चित की जा सकेगी।
देश में स्थापित होंगे 4 विशाल प्रोसेसिंग प्लांट
इस पूरी परियोजना के तहत देश भर में कुल 4 अत्याधुनिक रिफाइनिंग संयंत्र तैयार किए जाने की रूपरेखा बनाई गई है। इनमें से दो संयंत्र विशेष रूप से लिथियम प्रोसेसिंग के लिए होंगे, जिनकी न्यूनतम वार्षिक क्षमता 30 किलोटन निर्धारित की गई है। इसके अलावा दो अन्य संयंत्र निकल की प्रोसेसिंग के लिए स्थापित किए जाएंगे, जिनमें से प्रत्येक की न्यूनतम उत्पादन क्षमता 50 किलोटन होगी।
परियोजना के वित्तीय ढांचे के अनुसार, लिथियम प्लांट लगाने वाली कंपनियों को अधिकतम 500 करोड़ रुपये तक की सरकारी सहायता दी जाएगी। वहीं अधिक क्षमता वाले निकल प्लांट के लिए प्रत्येक इकाई को 900 करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। तकनीकी दृष्टिकोण से निकल संयंत्रों की एक प्रमुख विशेषता यह होगी कि निकल उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान ही उप-उत्पाद (बाय-प्रोडक्ट) के रूप में कोबाल्ट को भी अलग करके निकाला जा सकेगा, जिससे देश को कोबाल्ट के लिए अलग से बड़ा ढांचा नहीं खड़ा करना पड़ेगा।
कंपनियों के चयन का पारदर्शी द्वि-स्तरीय ढांचा
सार्वजनिक धन के उचित और पारदर्शी इस्तेमाल के लिए प्लांट स्थापित करने वाली कंपनियों का चयन दो चरणों में किया जाएगा। प्रारंभिक चरण में कंपनियों की तकनीकी दक्षता, अनुभव और प्लांट संचालन की व्यावहारिक क्षमता की जांच होगी। जो कंपनियां तकनीकी मानकों पर खरी उतरेंगी, वे दूसरे चरण में प्रवेश करेंगी। दूसरे चरण में न्यूनतम वित्तीय सहायता (लोएस्ट कॉस्ट) का सिद्धांत लागू होगा। यानी जो तकनीकी रूप से योग्य कंपनी सरकार से सबसे कम सब्सिडी या ग्रांट की मांग करेगी, उसे संयंत्र लगाने की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।
घरेलू रिफाइनिंग से होने वाले दूरगामी लाभ
देश के भीतर ही रिफाइनिंग क्षमताएं विकसित होने से भारतीय अर्थव्यवस्था को बहुआयामी लाभ प्राप्त होंगे। पहला, देश की विनिर्माण सप्लाई चेन किसी भी विदेशी दबाव से मुक्त और मजबूत होगी। दूसरा, विदेशों से महंगे परिष्कृत उत्पादों को न खरीदने के कारण भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा की बचत होगी। तीसरा, खदानों से प्राप्त कच्चे माल को घरेलू स्तर पर ही परिष्कृत करके उच्च गुणवत्ता वाले औद्योगिक यौगिकों में बदला जा सकेगा। चौथा, नए औद्योगिक संयंत्रों की स्थापना से तकनीकी क्षेत्र में उच्च कौशल वाले रोजगार के बड़े अवसर पैदा होंगे, जो भारत के आत्मनिर्भरता मिशन को ठोस धरातल प्रदान करेंगे।



















