पश्चिम एशिया में गहराते भू-राजनीतिक संकट और रणनीतिक आपूर्ति चिंताओं के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भूचाल आ गया है। वैश्विक मानक माना जाने वाला ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के अहम आंकड़े को पार कर गया है। कच्चे तेल की लागत में इस अचानक उछाल ने भारत की सरकारी तेल विपणन कंपनियों के वित्तीय संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। वैश्विक स्तर पर कच्चा तेल बेहद महंगा होने के बावजूद घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की खुदरा दरों में बदलाव नहीं किया गया है। इसके परिणामस्वरूप, सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की प्रत्येक लीटर बिक्री पर भारी मार्केटिंग नुकसान उठाना पड़ रहा है।
वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल
ऊर्जा बाजारों में यह तेज उछाल मुख्य रूप से अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य व कूटनीतिक तनाव के कारण देखने को मिला है। इसके साथ ही पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक क्षेत्रों से आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। बुधवार के कारोबारी सत्र में ब्रेंट क्रूड का भाव लगभग 2.5 फीसदी की मजबूती के साथ 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से ऊपर निकल गया। वहीं, अमेरिकी WTI क्रूड में भी करीब 2 फीसदी की तेजी दर्ज की गई और यह लगभग 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह भू-राजनीतिक गतिरोध लंबा खींचता है, तो आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें और ऊंचे स्तर को छू सकती हैं।
पेट्रोल, डीजल और एलपीजी पर बढ़ता घाटा
कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण तेल कंपनियों का घाटा लगातार चौड़ा होता जा रहा है। रेटिंग एजेंसी ICRA के वरिष्ठ अधिकारी प्रशांत वशिष्ठ द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, सितंबर महीने में अब तक रहे कच्चे तेल के औसत भाव के आधार पर कंपनियों का पेट्रोल पर मार्केटिंग मार्जिन लगभग ₹5 प्रति लीटर नकारात्मक हो चुका है। इससे भी अधिक दबाव डीजल की बिक्री पर है, जहां कंपनियों को प्रति लीटर करीब ₹23 का नुकसान झेलना पड़ रहा है। केवल वाहन ईंधन ही नहीं, बल्कि घरेलू एलपीजी की बिक्री पर भी कंपनियों की अंडर-रिकवरी लगभग ₹200 प्रति सिलेंडर पहुंच गई है। इस वित्तीय घाटे की मुख्य वजह यही है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल रिकॉर्ड स्तर पर महंगा हुआ है, लेकिन घरेलू उपभोक्ताओं के लिए ईंधन के दाम उसी अनुपात में नहीं बढ़ाए गए हैं।
तीन महीनों से अधिक समय से स्थिर हैं खुदरा कीमतें
भारतीय बाजार में आम उपभोक्ताओं को राहत देने के उद्देश्य से पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को पिछले तीन महीनों से अधिक समय से स्थिर रखा गया है। देश में ईंधन दरों में अंतिम संशोधन 25 मई को हुआ था, जब पेट्रोल की कीमत में ₹2.61 प्रति लीटर और डीजल में ₹2.71 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी। उल्लेख है कि मई के दूसरे पखवाड़े के दौरान चार अलग-अलग चरणों में ईंधन के दाम बढ़ाए गए थे। उन चार चरणों को मिलाकर पेट्रोल कुल ₹7.35 प्रति लीटर और डीजल ₹7.53 प्रति लीटर महंगा हुआ था। तब से लेकर अब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था और आयात बिल पर गंभीर दबाव
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल का महंगा होना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती खड़ा करता है, क्योंकि देश अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का 88 फीसदी से ज्यादा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। इस वजह से वैश्विक कीमतों में होने वाली किसी भी बढ़ोतरी का सीधा और त्वरित असर देश के कुल आयात बिल पर पड़ता है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से जुलाई के दौरान भारत का कच्चा तेल आयात बिल 56 फीसदी से ज्यादा बढ़कर 63.4 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो बीते वर्ष की इसी समान अवधि में केवल 40.5 अरब डॉलर था। यदि कच्चा तेल उच्च स्तरों पर बना रहता है और साथ ही भारतीय रुपया भी दबाव में रहता है, तो देश में दोहरी आर्थिक चुनौती पैदा हो सकती है, जिससे मुद्रास्फीति दर बढ़कर आम लोगों के बजट को प्रभावित कर सकती है।



















