अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव थमने का नाम नहीं ले रहा है और इसका सीधा असर अब आने वाले त्योहारी सीजन पर पड़ता दिख रहा है। कच्चे तेल के बड़े उत्पादक देशों के गुट ओपेक और उसके सहयोगी देशों ने अक्टूबर तक उत्पादन का स्तर मौजूदा कोटे पर ही बनाए रखने का फैसला किया है, जिससे दिवाली तक तेल की कीमतों में राहत मिलने की संभावना कमजोर पड़ गई है।
रविवार को हुई बैठक में लिया गया फैसला
सऊदी अरब और रूस की अगुवाई वाले सात देशों के इस समूह ने रविवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बैठक की। बैठक में तय हुआ कि अक्टूबर महीने तक उत्पादन कोटा मौजूदा स्तर पर ही रहेगा, यानी सप्लाई में कोई नया इजाफा नहीं होगा। चूंकि त्योहारी सीजन भी अक्टूबर से ही शुरू हो रहा है, इसलिए इस फैसले का असर सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचने की आशंका है। सदस्य देशों का कहना है कि जब तक निर्यात की स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक जोखिम लेकर उत्पादन बढ़ाना ठीक नहीं होगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना बड़ी वजह
इस फैसले के पीछे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध है। इस लड़ाई के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल का निर्यात सामान्य स्तर पर नहीं हो पा रहा है, और फारस की खाड़ी से भी निर्यात में कमी आई है। यही देखते हुए ओपेक और सहयोगी देशों ने तय किया कि जब तक निर्यात के लिए कोई वैकल्पिक और भरोसेमंद रास्ता नहीं मिल जाता, तब तक उत्पादन नहीं बढ़ाया जाएगा। इससे साफ है कि इलाके में जारी सैन्य तनाव सीधे तौर पर वैश्विक तेल आपूर्ति की योजना को प्रभावित कर रहा है।
2023 की पाबंदियां हटाने की कोशिश जारी
सप्लाई घटने के बावजूद ओपेक और उसके सहयोगी देशों ने युद्ध के दौरान भी कोटा बढ़ाना जारी रखा था। मकसद था साल 2023 में लगाई गई उत्पादन पाबंदियों को पूरी तरह खत्म करना, ताकि लड़ाई थमने के बाद कुछ सदस्य देशों को अतिरिक्त उत्पादन बढ़ाने की छूट मिल सके। हालांकि गठबंधन को अभी भी सप्लाई का एक और हिस्सा बहाल करना बाकी है। यह काम आसान नहीं होगा क्योंकि पाबंदियों की घोषणा के बाद से कई सदस्य देशों की उत्पादन क्षमता खुद घट चुकी है। अमेरिका-ईरान युद्ध ने इस पूरी तस्वीर को और उलझा दिया है।
विशेषज्ञ ने बताया कीमतों में उतार-चढ़ाव का कारण
रिस्टैड एनर्जी में जियोपॉलिटिकल एनालिसिस के प्रमुख जॉर्ज लियोन ने बताया कि पिछले हफ्ते फिर से भड़की लड़ाई के चलते तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के ठिकानों पर नए हमले का आदेश दिया, जिसके जवाब में इस्लामिक रिपब्लिक ने इलाके में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर पलटवार किया। पहले ओपेक के सचिवालय में काम कर चुके लियोन के मुताबिक, असली असर तभी दिखेगा जब होर्मुज पूरी तरह से खुल जाएगा। उनका कहना है कि फिलहाल ओपेक और सहयोगी देश असल बाजार के बजाय कागजों पर ही तेल की सप्लाई मैनेज कर रहे हैं। जैसे ही होर्मुज से आवाजाही सामान्य होगी, यह गठबंधन सीमित निर्यात संभालने की स्थिति से हटकर अचानक बढ़ती सरप्लस यानी अतिरिक्त सप्लाई से निपटने की चुनौती में आ सकता है।
2027 के उत्पादन लक्ष्य पर टिकी नजरें
मौजूदा हालात में ओपेक और सहयोगी देशों की अगली बड़ी प्राथमिकता यह पता लगाना है कि हर सदस्य देश असल में कितना उत्पादन कर सकता है। इसी आकलन के आधार पर साल 2027 के लिए हर देश की उत्पादन सीमा तय होगी। यह समीक्षा इसी महीने के आखिर तक पूरी होने की उम्मीद है। इसके बाद नवंबर के आखिर में जब पूरा गठबंधन मिलेगा, तब तेल मंत्री इस पर अंतिम फैसला लेंगे। लियोन के मुताबिक, अब ध्यान महीने-दर-महीने होने वाले उत्पादन एडजस्टमेंट से हटकर 2027 को लेकर होने वाली बहस पर केंद्रित हो रहा है, जो कहीं ज्यादा मुश्किल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मानी जा रही है। ओपेक की अगली बैठक 4 अक्टूबर को होगी, तब तक उत्पादन सीमा मौजूदा स्तर पर ही बनी रहेगी।


















