उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में गांव की महिलाओं के लिए कमाई का एक नया रास्ता खुलने जा रहा है। रेशम विभाग ने जिले की 200 महिलाओं को सेरीकल्चर यानी रेशम कीट पालन से जोड़ने की योजना बनाई है, जिसे साल 2026-27 तक पूरा किया जाना है। मकसद साफ है, महिलाओं को घर बैठे कमाई का जरिया मिले और उन्हें रोजी-रोटी के लिए शहर का रुख न करना पड़े।
यह पहल इसलिए खास मानी जा रही है क्योंकि सेरीकल्चर का काम बहुत ज्यादा पूंजी या बड़े संसाधनों के बिना भी शुरू किया जा सकता है। सीमित लागत में शुरू होने वाला यह व्यवसाय उन महिलाओं के लिए मुफीद है, जिनके पास बड़ी जमीन या भारी निवेश की क्षमता नहीं है। यही वजह है कि सरकार और रेशम विभाग दोनों इस क्षेत्र पर खास जोर दे रहे हैं। जिले में पहले से कई किसान रेशम उत्पादन के काम से जुड़े हुए हैं, अब विभाग महिलाओं को भी इस दायरे में लाकर इसे एक बड़े जन-आंदोलन का रूप देना चाहता है।
प्रशिक्षण से लेकर बाजार तक मिलेगी मदद
योजना के तहत चुनी गई महिलाओं को सबसे पहले कीट पालन की बारीकियों की ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके साथ ही उन्हें तकनीकी जानकारी भी दी जाएगी और यह भी सिखाया जाएगा कि तैयार माल को बाजार तक कैसे पहुंचाया जाए। विभाग की कोशिश है कि उत्पादन से लेकर बिक्री तक की पूरी प्रक्रिया में महिलाओं को किसी तरह की दिक्कत न आए, ताकि वे बिना किसी बिचौलिए के अपनी मेहनत का पूरा मुनाफा खुद हासिल कर सकें।
अब तक 130 महिलाएं जुड़ीं, लक्ष्य 200 महिलाओं का
उप निदेशक रेशम अरविंद कुमार के मुताबिक विभाग ने 2026-27 के लिए कुछ स्पष्ट लक्ष्य तय कर रखे हैं। इनमें सबसे अहम लक्ष्य 200 नई महिलाओं को रेशम उत्पादन के काम से जोड़ना है। इसके अलावा जिले में 200 नए कोकून उत्पादकों को भी इस दायरे में शामिल करने की योजना है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक अब तक 130 नई लाभार्थी महिलाएं इस योजना का हिस्सा बन चुकी हैं, जबकि बाकी बची महिलाओं का चयन आने वाले महीनों में किया जाएगा और उन्हें भी प्रशिक्षण व जरूरी सुविधाएं दी जाएंगी।
अरविंद कुमार के अनुसार सरकार की कोशिश है कि ग्रामीण महिलाओं को उनके घर के पास ही रोजगार का साधन मिल जाए, जिससे उन्हें कमाई की तलाश में दूसरे शहरों का रुख न करना पड़े। विभाग की पूरी योजना का केंद्र बिंदु यही है कि महिलाएं अपने गांव में रहकर ही परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकें।
2.5 एकड़ में शहतूत की नर्सरी, ढाई लाख पौधों का लक्ष्य
रेशम उत्पादन की पूरी प्रक्रिया शहतूत के पौधों पर टिकी होती है, क्योंकि यही रेशम कीटों का मुख्य आहार है। इसी वजह से जिले में 2.5 एकड़ जमीन पर शहतूत की नर्सरी तैयार की गई है। विभाग का लक्ष्य है कि इस नर्सरी से करीब 2.50 लाख पौधे तैयार किए जाएं। तैयार होने के बाद ये पौधे जिले के किसानों और नई जुड़ी लाभार्थी महिलाओं के बीच बांटे जाएंगे, ताकि रेशम उत्पादन के लिए जरूरी आधार मजबूत बना रहे। शहतूत की पैदावार जितनी भरपूर होगी, कीट पालन का काम उतना ही सफल और मुनाफे वाला साबित होगा, यही वजह है कि नर्सरी को इस पूरी योजना की नींव माना जा रहा है।




















