80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की आर्थिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण ब्योरा प्रस्तुत किया। अपने संबोधन में उन्होंने पिछले 12 सालों के दौरान देश के आर्थिक ढाचें में आए बुनियादी बदलावों को रेखांकित करते हुए कहा कि एक समय था जब वैश्विक स्तर पर भारत की गिनती दुनिया की बेहद नाजुक यानी ‘फ्रेजाइल फाइव’ (कमजोर 5) अर्थव्यवस्थाओं में की जाती थी। प्रधानमंत्री के अनुसार, देशवासियों के निरंतर प्रयासों और रणनीतिक कदमों के बदौलत ही भारत उस वित्तीय संकट से बाहर निकलकर आज दुनिया की प्रमुख और तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित हो चुका है।
फ्रेजाइल फाइव का इतिहास और इसमें शामिल देश
वैश्विक वित्तीय बाजार में 'फ्रेजाइल फाइव' शब्द का इस्तेमाल पहली बार साल 2013 में देखने को मिला था। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था मॉर्गन स्टेनली ने दुनिया की 5 उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के एक समूह को यह नाम दिया था। इस समूह में भारत के साथ इंडोनेशिया, तुर्की, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे। वित्तीय विश्लेषण रिपोर्टों में इन्हें 'फ्रेजाइल फोर' या 'फ्रेजाइल फाइव' की श्रेणी में रखकर वैश्विक निवेशकों को सचेत किया गया था कि इन देशों के बाजार उस समय अत्यधिक जोखिम भरे मोड़ पर खड़े थे।
किन कारणों से इन 5 देशों को माना गया था कमजोर?
साल 2013 के दौर में इन पांचों देशों की आर्थिक स्थिति काफी चिंताजनक बनी हुई थी। मॉर्गन स्टेनली ने जिन मुख्य कमजोरियों की पहचान की थी, उनमें सबसे पहला कारण बढ़ता हुआ चालू खाता घाटा (CAD) था। ये देश अपनी कुल निर्यात कमाई की तुलना में विदेशी मुद्रा का खर्च बहुत अधिक कर रहे थे। दूसरा बड़ा कारण विदेशी पूंजी पर अत्यधिक निर्भरता था। इन अर्थव्यवस्थाओं की रफ्तार काफी हद तक विदेशी संस्थागत निवेशकों के अल्पकालिक पैसों पर टिकी हुई थी। इसके अलावा, राष्ट्रीय मुद्राओं का अवमूल्यन भी एक गंभीर समस्या थी। उस दौरान भारतीय रुपया समेत इन सभी पांचों देशों की करेंसी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले तेजी से गिर रही थी। साथ ही, घरेलू बाजारों में ऊंची मुद्रास्फीति यानी महंगाई दर ने इन अर्थव्यवस्थाओं को और अधिक संवेदनशील बना दिया था।
टेपर टैंट्रम का असर और वैश्विक चेतावनी का मकसद
मॉर्गन स्टेनली और अन्य वैश्विक वित्तीय विश्लेषकों द्वारा यह नाम देने का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के निवेशकों को संभावित वित्तीय जोखिमों के प्रति आगाह करना था। साल 2013 में जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने संकेत दिया कि वह अपनी अर्थव्यवस्था में तरलता बढ़ाने वाले डॉलर के प्रवाह को धीरे-धीरे कम करेगा, तो वित्तीय बाजारों में खलबली मच गई। इस घटनाक्रम को आर्थिक इतिहास में ‘टेपर टैंट्रम’ के नाम से जाना गया। अमेरिकी नीति में बदलाव की भनक लगते ही विदेशी निवेशकों ने इन पांचों नाजुक देशों से अपने पैसे तेजी से निकालने शुरू कर दिए थे। इस लेबल का मकसद यही दर्शाना था कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व के किसी भी कदम का सबसे पहला और नकारात्मक प्रभाव इन्हीं देशों पर पड़ेगा।
भारत ने कैसे हासिल की आर्थिक मजबूती?
वर्तमान समय में भारत इस कमजोर स्थिति से पूरी तरह बाहर निकल चुका है। साल 2013 के संकट के बाद भारत ने अपनी आर्थिक नीतियों में कई कड़े और दूरदर्शी सुधार लागू किए। देश ने सबसे पहले अपने विदेशी मुद्रा भंडार को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचाने पर ध्यान केंद्रित किया। इसके साथ ही सरकार और केंद्रीय बैंक ने मिलकर महंगाई और चालू खाता घाटे पर कड़ा नियंत्रण स्थापित किया। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए नीतियां बनाई गईं। इन लगातार प्रयासों का नतीजा यह रहा कि भारत आज वैश्विक स्तर पर सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है और 2013 के उस दौर को केवल एक बीता हुआ वित्तीय संकट माना जाता है।
समूह के अन्य चार देशों की मौजूदा स्थिति
फ्रेजाइल फाइव में शामिल अन्य देशों की बात करें तो इंडोनेशिया ने भी खुद को इस नाजुक स्थिति से बाहर निकालने में सफलता पाई है। इंडोनेशिया ने अपने व्यापार संतुलन में उल्लेखनीय सुधार किया, राजकोषीय अनुशासन लागू किया और बाहरी आर्थिक झटकों से निपटने के लिए अपनी नीतियों को मजबूत बनाया। इसके विपरीत, तुर्की और ब्राजील की राह पिछले एक दशक में काफी कठिन रही है। ये दोनों देश बीते दस सालों से लगातार उच्च मुद्रास्फीति, राजनीतिक अस्थिरता और अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं की भारी अनिश्चितता से जूझते रहे हैं।



















