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मुख्तारनामा से नहीं मिलता मालिकाना हक, जानिए रजिस्ट्री और वसीयत के सामने कितनी है इसकी कानूनी ताकतव्यापार
30 अक्तू॰ 2026, 1:36 am (2 घंटे पहले)· 0

मुख्तारनामा से नहीं मिलता मालिकाना हक, जानिए रजिस्ट्री और वसीयत के सामने कितनी है इसकी कानूनी ताकत

सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट रुख के अनुसार पॉवर ऑफ अटॉर्नी केवल काम करने का अधिकार सौंपती है, संपत्ति का मालिकाना हक नहीं। जानिए सेल डीड, गिफ्ट डीड और वसीयत के मुकाबले यह कानूनी रूप से कहां टिकती है।

अक्सर लोग दूसरे शहरों में मौजूद अपनी अचल संपत्ति की देखभाल करने या उसका सौदा तय करने के लिए किसी विश्वस्त व्यक्ति को कानूनी अधिकार सौंप देते हैं। एनसीआर में रहने वाले उमाकांत झा की मिसाल लें, जिनकी पटना में काफी जमीन, कुछ मकान और फ्लैट मौजूद हैं। नोएडा में अपना निजी मकान बनवाकर परिवार सहित बस जाने और दिल्ली-एनसीआर में कारोबार फैलने की वजह से उनका पटना आना-जाना बेहद सीमित हो गया। ऐसे हालात में वहां मौजूद रहे बिना जमीन-मकान बेचने या कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए पॉवर ऑफ अटॉर्नी यानी मुख्तारनामा ही एक सुगम कानूनी रास्ता बचता है। आम बोलचाल में मुख्तारनामा को लेकर कई भ्रांतियां प्रचलित हैं, इसलिए यह समझना आवश्यक है कि यह दस्तावेज कब काम आता है और क्या यह बाकी कागजातों से ऊपर है।

मुख्तारनामा का दायरा और सुप्रीम कोर्ट का नजरिया

पॉवर ऑफ अटॉर्नी मूल रूप से एक अधिकृत कानूनी दस्तावेज है, जिसके जरिए कोई व्यक्ति अपनी गैरमौजूदगी में किसी दूसरे व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि नियुक्त करता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कर रखा है कि यह दस्तावेज किसी भी सूरत में किसी को अपने आप मालिकाना हक प्रदान नहीं करता। इसका सीधा अर्थ यह है कि इस प्रपत्र से सिर्फ अधिकार ट्रांसफर किए जाते हैं, न कि प्रॉपर्टी का टाइटल या ओनरशिप। जैसे उमाकांत झा नोएडा में बैठकर पटना के किसी परिचित के नाम यह कानूनी पत्र तैयार करा सकते हैं, जिससे उन्हें संपत्ति का सौदा तय करने का अधिकार मिल जाता है। इसके अलावा संपत्ति की देखरेख करने, किराएदारों से किराया वसूलने या संबंधित रजिस्ट्री दफ्तर के काम निपटाने की शक्ति भी इसी दस्तावेज के तहत दी जा सकती है।

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रजिस्ट्री के मुकाबले पॉवर ऑफ अटॉर्नी की हैसियत

सुप्रीम कोर्ट ने सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज वर्सेज स्टेट ऑफ हरियाणा के ऐतिहासिक मामले में स्थिति पूरी तरह साफ कर दी थी। अदालत ने माना कि पॉवर ऑफ अटॉर्नी के जरिए संपत्ति का मालिकाना हक अपने आप किसी दूसरे के नाम अंतरित नहीं हो सकता। यह सिर्फ कार्य करने का अधिकार सौंपने का जरिया है, संपत्ति की सीधी बिक्री या हस्तांतरण का कोई वैध विकल्प नहीं हो सकता। कानून की नजर में पक्की रजिस्ट्री यानी सेल डीड के सामने पॉवर ऑफ अटॉर्नी का कोई जोर नहीं चलता। संपत्ति का वास्तविक और कानूनी मालिकाना हक किसी को ट्रांसफर करने के लिए रजिस्ट्री को ही अंतिम और अनिवार्य माध्यम माना गया है।

गिफ्ट डीड और वसीयत के सामने कितनी है मजबूती

जब बात गिफ्ट डीड या वसीयत से तुलना की आती है, तब भी पॉवर ऑफ अटॉर्नी की शक्तियां बेहद कमजोर साबित होती हैं। क्योंकि मुख्तारनामा केवल अधिकारों का हस्तांतरण भर है, इसलिए यह मालिकाना हक के निर्धारण में गिफ्ट डीड और वसीयत की बराबरी नहीं कर सकता। गिफ्ट डीड एक तरह से सेल डीड के समान ही पक्का दस्तावेज होती है, जिसका इस्तेमाल अमूमन खून के रिश्तों के बीच संपत्ति हस्तांतरित करने के लिए किया जाता है। दूसरी तरफ, वसीयत भी संपत्ति ट्रांसफर करने का एक वैध दस्तावेज है, फर्क सिर्फ इतना है कि यह किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद ही प्रभावी होती है और जीवनकाल में लागू नहीं होती। इन दोनों ही व्यवस्थाओं में मालिकाना हक वास्तव में ट्रांसफर होता है, जबकि पॉवर ऑफ अटॉर्नी में ऐसा बिल्कुल नहीं होता।

सवाल-जवाब

क्या पॉवर ऑफ अटॉर्नी से संपत्ति का मालिकाना हक मिल जाता है?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट के अनुसार पॉवर ऑफ अटॉर्नी से संपत्ति का मालिकाना हक ट्रांसफर नहीं होता, यह सिर्फ काम करने का अधिकार सौंपता है।
सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज मामले में अदालत ने क्या फैसला दिया था?
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि पॉवर ऑफ अटॉर्नी संपत्ति बेचने या मालिकाना हक ट्रांसफर करने का विकल्प नहीं हो सकती।
रजिस्ट्री और पॉवर ऑफ अटॉर्नी में कौन सा दस्तावेज अधिक मजबूत है?
रजिस्ट्री यानी सेल डीड अधिक मजबूत है, क्योंकि कानून के तहत संपत्ति का मालिकाना हक केवल रजिस्ट्री के माध्यम से ही ट्रांसफर माना जाता है।
पॉवर ऑफ अटॉर्नी का मुख्य रूप से क्या उपयोग होता है?
इसका उपयोग दूर रहकर अपनी संपत्ति की देखरेख कराने, किराया वसूलने, सौदा करने या रजिस्ट्री से जुड़े काम के लिए प्रतिनिधि नियुक्त करने में होता है।
गिफ्ट डीड और वसीयत के सामने पॉवर ऑफ अटॉर्नी की क्या स्थिति है?
गिफ्ट डीड और वसीयत से वास्तव में मालिकाना हक तय होता है, जबकि पॉवर ऑफ अटॉर्नी सिर्फ काम करने के अधिकार देती है इसलिए उनके सामने कमजोर है।
वसीयत कानूनी रूप से कब प्रभावी होती है?
वसीयत व्यक्ति के जीते जी लागू नहीं होती है, यह संबंधित व्यक्ति की मृत्यु के बाद ही कानूनी तौर पर लागू होती है।
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