चित्रकूट के पाठा इलाके में कभी खुशहाली और काम का बड़ा जरिया रही मानिकपुर की बॉक्साइट फैक्ट्री आज पूरी तरह बदहाली के आगोश में समा चुकी है। एक वक्त ऐसा था जब इस कारखाने की गूंज से पूरा इलाका आबाद रहता था और आसपास के तमाम परिवारों की आजीविका इसी से चलती थी। मशीनों की खड़खड़ाहट और कामगारों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाली यह जगह अब वीरान पड़ी है। वक्त के फेर ने इस औद्योगिक इकाई को ठप कर दिया और देखते ही देखते पाठा क्षेत्र से रोजगार का एक मुख्य आधार छिन गया। आज स्थिति यह है कि इस कारखाने की इमारतें मलबे और खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं, जिसके चलते यहां के युवाओं को पेट पालने के लिए दूसरे जिलों और महानगरों का रुख करना पड़ रहा है।
1980 के दशक में शुरू हुई थी फैक्ट्री
इतिहास के पन्नों को पलटें तो मानिकपुर की यह बॉक्साइट फैक्ट्री 1980 के दशक में गुलजार हुई थी। उस दौर में इस कारखाने का खुलना पाठा क्षेत्र के बाशिंदों के लिए किसी वरदान से कम नहीं माना जाता था। आसपास के जंगलों से निकलने वाले खनिज बॉक्साइट को यहां लाया जाता था और फिर मशीनों के जरिए इसे पीसा जाता था। इस कारखाने के सुचारू रूप से चलने की वजह से न केवल प्रत्यक्ष तौर पर दर्जनों लोगों को नौकरियां मिल रही थीं, बल्कि माल ढुलाई, लोडिंग-अनलोडिंग, मजदूरी और अन्य अनुषंगी कार्यों के जरिए भी स्थानीय लोगों की आमदनी का जरिया बना हुआ था। लोग अपनी आजीविका को लेकर आश्वस्त थे और उन्हें अपने घर-परिवार को छोड़कर कहीं और नहीं जाना पड़ता था।
खनन पर पाबंदी ने बदली तस्वीर
हालांकि वक्त के साथ हालात बदलते चले गए और इस कारखाने के बंद होने की मुख्य वजह बना वन क्षेत्र का दायरा। जिस इलाके से बॉक्साइट की कच्ची सामग्री की आपूर्ति होती थी, वहां बाद में वन विभाग की ओर से खनन गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। इस कानूनी और प्रशासनिक पाबंदी के कारण कारखाने के लिए कच्चे माल की उपलब्धता बेहद प्रभावित हुई, जिससे इसका संचालन चलाना प्रबंधकों के लिए लगातार मुश्किल होता चला गया। अंततः इस संकट के चलते फैक्ट्री को पूरी तरह बंद करना पड़ा। ताला लगते ही यहां काम करने वाले सैकड़ों कामगारों और उनके आश्रितों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट आन खड़ा हुआ, जो आज तक लाइलाज बना हुआ है।
स्थानीय लोगों का दर्द और पलायन की मजबूरी
इस पूरे हालात को लेकर स्थानीय निवासी ललित ने अपनी बात रखते हुए बताया कि जब यह कारखाना चालू हालत में था, तब पाठा क्षेत्र के निवासियों को अपने आशियाने के नजदीक ही रोजगार मिल जाता था। लोगों को आजीविका के लिए दूर-दराज के शहरों में भटकने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती थी। लेकिन इसके बंद होते ही इलाके में रोजगार के सारे विकल्प लगभग समाप्त हो गए। आज आलम यह है कि बड़ी संख्या में नौजवान नौकरी और दो वक्त की रोटी की तलाश में दूसरे जिलों और अन्य राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि मानिकपुर की इस वीरान पड़ी फैक्ट्री को किसी तरह दोबारा चालू किया जाए या फिर इसकी जगह पर कोई दूसरा नया उद्योग खड़ा किया जाए, तो इसका सीधा फायदा पाठा अंचल के लोगों को मिलेगा और युवाओं का हो रहा पलायन भी रुकेगा।
विकास की आस लगाए बैठे हैं ग्रामीण
चित्रकूट के एक अन्य निवासी सत्य प्रकाश द्विवेदी ने भी इस गंभीर मुद्दे पर अपनी राय साझा करते हुए बताया कि अपने सुनहरे दिनों में यह कारखाना पाठा क्षेत्र की रीढ़ हुआ करता था और रोजगार का एक बहुत बड़ा केंद्र था। बॉक्साइट के खनन पर कानूनी रोक लगने के बाद यह इकाई धीरे-धीरे मंदी की चपेट में आकर बंद हो गई और इसके साथ ही अनगिनत लोगों के हाथ से काम छिन गया। उनका कहना है कि पाठा क्षेत्र आज भी औद्योगिक और रोजगार के लिहाज से काफी पिछड़ा हुआ माना जाता है। यदि सरकार और क्षेत्र के चुने हुए जनप्रतिनिधि इस बंद पड़ी फैक्ट्री के परिसर में कोई नई फैक्ट्री या उद्योग लगवाने की दिशा में सार्थक पहल करें, तो एक बार फिर मानिकपुर समेत पूरे पाठा क्षेत्र की सूरत बदल सकती है और स्थानीय लोगों के दिन बहुर सकते हैं।



















